सिनेमा अब भी दक्षिण भारत की राजनीति को दे रहा आकार

सिनेमा अब भी दक्षिण भारत की राजनीति को दे रहा आकार

सिनेमा अब भी दक्षिण भारत की राजनीति को दे रहा आकार
Modified Date: May 10, 2026 / 06:48 pm IST
Published Date: May 10, 2026 6:48 pm IST

चेन्नई, 10 मई (भाषा) दक्षिण भारत के सियासी पटल पर सिल्वर स्क्रीन से सत्ता की कुर्सी तक के सफर की एक सांस्कृतिक रवायत रही है। दशकों से, फिल्मी नायकों और विधायी नेतृत्व के बीच बहुत महीन सी रेखा रही है, जो करिश्माई स्टारडम और गहरी क्षेत्रीय पहचान के अनूठे मिश्रण से प्रेरित है।

इस बदलाव की आधारशिला 20वीं शताब्दी के मध्य में तमिलनाडु में एम. करुणानिधि (उर्फ कलाइग्नार), एम. जी. रामचंद्रन (एमजीआर) और आंध्र प्रदेश में एन. टी. रामाराव (एनटीआर) ने रखी थी।

राजनीति के दिग्गज रहे करुणानिधि ने सबसे पहले एक क्रांतिकारी पटकथा लेखक के रूप में सिनेमा जगत में अपनी पहचान बनाई। पांच दशकों से अधिक समय में, उन्होंने पटकथा लेखक से तमिलनाडु के पांच बार मुख्यमंत्री बनने तक का सफर तय किया।

एमजीआर भी स्लिवर स्क्रिन से राजनीति के ‘जननेता’ के रूप में उभरे और 1977 में मुख्यमंत्री बने। उन्होंने कल्याणकारी कार्यों की एक ऐसी नींव रखी जो दशकों तक कायम रही। उनके बाद, उनकी शिष्या जे जयललिता एक प्रसिद्ध अभिनेत्री से ‘अम्मा’ के नाम से जानी जाने वाली एक सशक्त राजनीतिक शक्ति के रूप में उभरीं।

आंध्र प्रदेश में एनटीआर ने लगभग असंभव को संभव कर दिखाया। अक्सर स्क्रीन पर कृष्ण या राम की भूमिका निभाने वाले एनटीआर ने 1982 में तेलुगु देशम पार्टी (तेदेपा)की स्थापना की और ‘तेलुगु अस्मिता’ की लहर पर सवार होकर नौ महीने के भीतर मुख्यमंत्री बन गए।

दशकों तक दबदबा रखने वाले दलों के बीच विजयकांत ने तमिलनाडु में एक अलग पहचान बनाई। उन्हें प्यार से ‘कैप्टन’ कहा जाता था। विजयकांत ने 2005 में पूर्व में स्थापित द्रविड़ मुनेत्र कषगम (द्रमुक) और ऑल इंडिया अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कषगम (अन्नाद्रमुक)के सीधे विकल्प के रूप में देसिया मुरपोक्कु द्रविड़ कषगम (डीएमडीके) की स्थापना की।

पड़ोसी राज्य आंध्र प्रदेश में चिरंजीवी और पवन कल्याण दोनों भाइयों ने राजनीति में प्रवेश किया, लेकिन ‘पावर स्टार’ कल्याण ने लगभग एक दशक तक चुनावी झटकों के बावजूद अपनी दृढ़ता साबित की। उन्होंने 2024 में शानदार सफलता हासिल की और आंध्र प्रदेश के उपमुख्यमंत्री बने।

इसी बीच, ‘मेगास्टार’ चिरंजीवी ने 2008 में प्रजा राजयम पार्टी (पीआरपी) की स्थापना की और बाद के चुनावों में करीब 18 प्रतिशत मत प्राप्त करने में सफल रहे, लेकिन बाद में पूर्णकालिक राजनीति से दूरी बना ली।

अन्य उल्लेखनीय तेलुगु सितारों में हिंदुपुर से मौजूदा विधायक नंदामुरी बालकृष्ण हैं, जो अपने पिता एनटीआर की विरासत को क्षेत्रीय निष्ठा के साथ आगे बढ़ा रहे हैं।

अभिनेत्री जयप्रदा भी दो बार सांसद रहीं और राज्यसभा में कार्यकाल के बाद उत्तर प्रदेश से जीत हासिल की।

कर्नाटक में भी अभिनेताओं के राजनीति में आने का लंबा इतिहास रहा है। इनमें से एक हैं अनंत नाग, जिन्हें अक्सर ‘‘भद्र नेता’’ कहा जाता है। कई सितारों के विपरीत, जो दिखावटी वीरता पर निर्भर रहते हैं, नाग की राजनीतिक यात्रा बौद्धिक गहराई और जमीनी स्तर के शासन पर आधारित थी। उन्होंने कहा था कि राजनीति में एक स्तर का समझौता आवश्यक होता है जो कभी-कभी उनकी कलात्मक संवेदनाओं से टकराता है।

कर्नाटक के एक और दिग्गज डॉ.राजकुमार थे, जिन्हें अक्सर ‘किंगमेकर’ कहा जाता था। पड़ोसी राज्यों के अपने कई समकालीनों के विपरीत, ‘अन्नावरु’ (बड़े भाई) से लोकप्रिय राजकुमार ने कभी चुनाव नहीं लड़ा और न ही कोई राजनीतिक दल बनाया, फिर भी उनका राजनीतिक और सामाजिक प्रभाव बहुत अधिक था। उनका सांस्कृतिक नेतृत्व इतना गहरा था कि उनके समर्थन से कर्नाटक का राजनीतिक माहौल बदल सकता था, भले ही वे कभी चुनाव में उम्मीदवार के रूप में खड़े न हुए हों।

केरल के राजनीतिक परिदृश्य के संदर्भ में, मलयालम सिनेमा के ‘एक्शन हीरो’ सुरेश गोपी ने वह उपलब्धि हासिल की, जिसे कभी केरल में उनकी पार्टी के लिए असंभव माना जाता था। वर्ष 2024 के आम चुनावों में, गोपी केरल में लोकसभा सीट जीतने वाले पहले भाजपा उम्मीदवार बने और राज्य के पारंपरिक दो ध्रुवीय वर्चस्व को तोड़ दिया।

दक्षिण भारत के राजनीतिक मंच पर शिवाजी गणेशन और रजनीकांत भी दो अलग-अलग धाराओं का प्रतिनिधित्व करते हैं। एक ने पूरी ताकत से मैदान में कदम रखा, लेकिन चुनावी गणित की कठोर वास्तविकता का सामना किया, और दूसरे ने एक अलग रास्ता चुनने से पहले दशकों तक दुनिया को अनुमान लगाने पर मजबूर कर दिया।

‘नदिगर थिलागम’ शिवाजी गणेशन रूपहले पर्दे के दिग्गज थे, लेकिन उनका राजनीतिक सफर जटिल और संघर्षपूर्ण रहा। अपने समकालीन एमजीआर के विपरीत शिवाजी का राजनीतिक करियर बदलते गठबंधनों से भरा रहा।

गणेशन ने 1988 में अपनी खुद की पार्टी, थमिझगा मुन्नेत्र मुन्नानी पार्टी की स्थापना की। गणेशन की दिग्गज छवि के बावजूद,उनकी पार्टी 1989 के चुनावों में एक भी सीट जीतने में असफल रही, जिसके चलते उन्होंने पार्टी को भंग कर दिया और जनता दल में विलय कर दिया।

भारतीय इतिहास में रजनीकांत के राजनीति से संबंध शायद सबसे अधिक जांचे-परखे गए हैं। रजनीकांत द्वारा 1996 में दिये बयान, ‘‘अगर जयललिता फिर से सत्ता में आ गईं तो भगवान भी तमिलनाडु को नहीं बचा सकते’’ने उस चुनाव का रुख बदल दिया था और उनका राजनीति में प्रवेश अपरिहार्य माना गया।

उन्होंने 2017 में आखिरकार रजनी मक्कल मंड्रम नाम से एक पार्टी गठित करने की घोषणा की। हालांकि, अपने विशाल प्रशंसक वर्ग को चौंकाते हुए, उन्होंने स्वास्थ्य संबंधी चिंताओं का हवाला देते हुए 2021 के अंत में आधिकारिक तौर पर अपने कदम पीछे खींच लिये।

कर्नाटक के उपेंद्र (जिन्होंने 2018 में उत्तम प्रजाकीय पार्टी (यूपीपी) की स्थापना की) को अक्सर ‘रियल स्टार’ कहा जाता है, उनकी राजनीतिक यात्रा धीमी और स्थिर रही है। इसका मुख्य कारण यह है कि उन्होंने ‘सेलिब्रिटी राजनीति’ की मूल संरचना को ध्वस्त करने का प्रयास किया और उसकी जगह ‘प्रजाकीय’ नामक एक अवधारणा को बढ़ावा दिया।

फिल्म सितारों के राजनीति में सहज प्रवेश की परंपरा विजय के साथ जारी है, जिनकी पार्टी, तमिलगा वेत्री कषगम (टीवीके), ने आधिकारिक तौर पर 2024 की शुरुआत में राजनीति में प्रवेश किया। मई 2026 तक, विजय ने भारत के सबसे बड़े प्रशंसक आधारों में से एक को सफलतापूर्वक एक अनुशासित राजनीतिक कार्यकर्ता समूह में परिवर्तित कर दिया है।

भाषा धीरज नरेश

नरेश


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