जलवायु परिवर्तन ने उन महिलाओं की मुश्किलें बढ़ाईं जिनका सुहाग बाघ के हमले में उजड़ा

जलवायु परिवर्तन ने उन महिलाओं की मुश्किलें बढ़ाईं जिनका सुहाग बाघ के हमले में उजड़ा

जलवायु परिवर्तन ने उन महिलाओं की मुश्किलें बढ़ाईं जिनका सुहाग बाघ के हमले में उजड़ा
Modified Date: February 21, 2026 / 07:04 pm IST
Published Date: February 21, 2026 7:04 pm IST

(अलिंद चौहान)

गोसाबा (सुंदरवन), 21 फरवरी (भाषा) घुटनों तक गहरे गंदे पानी में भी रीना सरकार सुंदरबन के सतजालिया द्वीप पर स्थित चारघेरी गांव के फिसलन भरे कीचड़ भरे किनारों पर फुर्ती से चलती है। वह उन 150 स्थानीय महिलाओं में से एक हैं जो एक हरित पहल के तहत 2,000 मैंग्रोव के पौधे(एक झाड़ी या वृक्ष है जो मुख्य रूप से तटीय खारे या नमकीन पानी में उगते हैं) लगाने के लिए घने जंगल से होते हुए तटबंध पर आई हैं।

रीना के पति की मौत बाघ के हमले में हो चुकी है। उनके साथ मौजूद कई अन्य महिलाओं के पति भी बाघ के शिकार हो चुके हैं ।

रीना ने कहा, “2022 में, मेरे पति सुदीप्तो सरकार मछली और केकड़े पकड़ने गए थे और कभी वापस नहीं लौटे। एक बाघ ने उन्हें मार डाला।”

स्थानीय लोगों के अनुसार, विशाल सुंदरवन क्षेत्र में हजारों ऐसी महिलाएं हैं जिनके पति की जान बाघ ने ले ली। अब उनका जीवन सामाजिक बहिष्कार, आर्थिक अस्थिरता और मनोवैज्ञानिक संकट से ग्रस्त है।

वन्यजीवों से संबंधित मौतों के लिए मुआवजा प्रदान करने के लिए कानूनी प्रावधान हैं, और बाघों के हमलों में अपने पतियों को खोने वाली महिलाओं की मदद के लिए कई गैर-सरकारी संगठन (एनजीओ) और समुदाय-आधारित पहलें भी हैं, फिर भी इन महिलाओं को चुनौतियों का सामना करना पड़ा है।

सुंदरबन स्थित गैर सरकारी संगठन पुरबाशा इको हेल्पलाइन सोसाइटी (पीईएचएस) में काम करने वाली देव्रती दास कहती हैं, “मनुष्य के जीवित रहने के लिए तीन मूलभूत आवश्यकताएं हैं: भोजन, वस्त्र और आश्रय। हालांकि, सुंदरबन में आय के स्रोत बहुत कम हैं; यहां गुणवत्तापूर्ण जीवन जीना लगभग असंभव है। अगर लोग किसी तरह घर बना भी लेते हैं, तो क्षेत्र में आने वाले लगातार चक्रवात उन्हें नष्ट कर देते हैं।”

चारघेरी गांव की निवासी अनिमा मंडल के पति की लगभग 20 साल पहले एक बाघ के हमले में मौत हो गई थी, जब वह केकड़े पकड़ने गए थे – जो इस क्षेत्र में आय के कुछ गिने-चुने स्रोतों में से एक है, और 800 रुपये प्रति किलोग्राम तक बिकते हैं।

इस हमले ने अनिमा को न सिर्फ विधवा कर दिया, बल्कि उसे समाज से बहिष्कृत भी कर दिया। उसे अपशकुनी माना जाता था और उसे “स्वामी-खेजो” कहकर पुकारा जाता था, जो उस क्षेत्र में प्रचलित एक अपमानजनक शब्द है, जिसका अर्थ है “पति को खाने वाली”।

वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 के तहत वन्यजीवों से संबंधित मौतों के मामले में पीड़िताओं को वित्तीय मुआवजे से वंचित कर दिया जाता है।

पीईएचएस के संस्थापक उमाशंकर मंडल कहते हैं, “क्योंकि कई पुरुष बिना आधिकारिक परमिट के जंगलों में प्रवेश करते हैं, इसलिए उनकी मृत्यु को अक्सर अवैध माना जाता है, जिससे उनके परिवार सरकारी मुआवजे प्राप्त करने के लिए अयोग्य हो जाते हैं।”

जलवायु परिवर्तन ने मुश्किलें और बढ़ा दीं।

हाल के वर्षों में, दुनिया के सबसे बड़े मैंग्रोव वन सुंदरवन, जहां लगभग 45 लाख लोग रहते हैं, जलवायु परिवर्तन का केंद्र बन गया है। बढ़ते समुद्री जलस्तर, लगातार और तीव्र चक्रवातों तथा पानी में बढ़ते खारेपन के कारण इसके अस्तित्व का खतरा मंडरा रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार, इन कारणों से मानव-बाघ संघर्षों की आवृत्ति में भी वृद्धि हुई है।

जलवायु परिवर्तन के कारण जल में खारापन बढ़ गया है, जिससे मैंग्रोव वनों का स्वास्थ्य और मिट्टी तथा फसलों की गुणवत्ता खतरे में पड़ गई है। इसके परिणामस्वरूप क्षेत्र में मछलियों की संख्या भी प्रभावित हुई है, जिससे उन निवासियों की आजीविका प्रभावित हुई है जो आय के लिए मछलियों पर निर्भर हैं।

दास कहती हैं, “मछलियों और केकड़ों की तलाश में, गांव के लोग अवैध रूप से जंगलों में प्रवेश करने के लिए मजबूर होते हैं, और बाघों के हमलों का शिकार हो जाते हैं।”

एशियन जर्नल ऑफ आर्ट्स, ह्यूमैनिटीज एंड सोशल स्टडीज में मार्च 2025 में प्रकाशित एक लेख के अनुसार, इस क्षेत्र में हर साल लगभग 40 लोग बाघों के हमले का शिकार होते हैं।

जलवायु परिवर्तन के प्रतिकूल प्रभावों को कम करने के लिए, मंडल और उनका संगठन, पीईएचएस, 2009 से सुंदरबन में मैंग्रोव के पौधे लगा रहे हैं।

भाषा प्रशांत रंजन

रंजन


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