कोयला घोटाला : अदालत ने पूर्व सांसद विजय दर्डा और अन्य के खिलाफ ईडी के मामले को खारिज किया
कोयला घोटाला : अदालत ने पूर्व सांसद विजय दर्डा और अन्य के खिलाफ ईडी के मामले को खारिज किया
नयी दिल्ली, 13 जुलाई (भाषा) दिल्ली की एक अदालत ने महाराष्ट्र के बांदर कोयला खदान आवंटन में कथित अनियमितताओं से जुड़े धनशोधन के मामलों में पूर्व सांसद विजय दर्डा, उनके बेटे देवेंद्र दर्डा और अन्य के खिलाफ दर्ज शिकायत सोमवार को खारिज कर दी।
विशेष न्यायाधीश सुनैना शर्मा ने यह फैसला पूर्व सांसद विजय जवाहरलाल दर्डा, उनके बेटे देवेंद्र कुमार दर्डा , एएमआर आयरन एंड स्टील प्राइवेट लिमिटेड, मनोज कुमार जायसवाल और अन्य लोगों की उन अर्जियों पर सुनाया, जिसमें उनके खिलाफ चल रही प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की कार्यवाही को ‘समाप्त’ करने का अनुरोध किया गया था।
अदालत ने रेखांकित किया कि केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) ने आरोप लगाया था कि एएमआर की ओर से जायसवाल ने विजय दर्डा को 24.60 करोड़ रुपये गैर-कानूनी तौर पर दिए थे, जिसे ईडी ने इस मामले में ‘अपराध से हुई कमाई’ माना।
फैसले में कहा गया कि सीबीआई के आरोपों को अदालत ने इस साल 27 मार्च को खारिज कर दिया था और कोयला खदान आवंटन के सबसे पुराने लंबित मामले में पूर्व सांसद और अन्य लोगों को बरी कर दिया था।
अदालत ने कहा कि भले ही धनशोधन का अपराध मूल अपराध से स्वतंत्र और अलग है, लेकिन इस अपराध का अस्तित्व उक्त मूल अपराध और उससे कमाई के होने पर ही निर्भर करता है।
इसमें कहा गया, ‘‘एक बार जब आरोपी को तय अपराध के मामले में बरी कर दिया जाता है, तो अपराध से हुई किसी भी कमाई के अस्तित्व का सवाल ही नहीं उठता।’’
अदालत ने उच्चतम न्यायालय के उस आदेश का संदर्भ दिया, जिसके अनुसार मुख्य अपराध में आरोपी के बरी होने या आरोप से मुक्त होने के बाद, धनशोधन निवारण अधिनियम (पीएमएलए) के तहत धनशोधन मामले में कोई कार्यवाही आगे नहीं बढ़ाई जा सकती।
अदालत ने कहा कि कई मामलों में उच्चतम न्यायालय ने पीएमएलए के तहत अभियोजन और कुर्की की कार्रवाई को रद्द कर दिया, क्योंकि मुख्य अपराध में आरोपी को बरी कर दिया गया था।
अदालत ने कहा, ‘‘इसमें कोई शक नहीं कि मौजूदा कार्यवाही की बुनियाद ही यानी सीबीआई द्वारा दर्ज किए गए वे अपराध और उस मामले में दर्ज आरोप पत्र थे, जो तब खत्म हो गई, जब इस अदालत ने 27 मार्च, 2026 के अपने फैसले में विजय दर्डा, देवेंद्र दर्डा, एएमआर और मनोज कुमार जायसवाल समेत सभी आरोपियों को बरी कर दिया…।’’
इसमें कहा गया कि बरी करने के फ़ैसले के खिलाफ अपील दायर करने की तय समय-सीमा समाप्त हो चुकी थी और ईडी के सरकारी वकील ने सीबीआई द्वारा किसी ऊपरी अदालत में दायर की गई अपील (अगर कोई हो) की जानकारी नहीं दी।
अदालत ने कहा, ‘‘मौजूदा कार्यवाही का पूरा आधार मूल अपराध पर टिका था। इस तथ्य को संज्ञान में लेते हुए इस अदालत ने पहले दिए गए फ़ैसले (27 मार्च के) में यह पुख्ता निष्कर्ष निकाला है कि सीबीआई कथित मूल अपराध में से किसी के भी होने को साबित करने में असफल रही है। इसलिए मौजूदा कार्यवाही को जारी रखना व्यर्थ की कवायद होगी।’’
न्यायाधीश शर्मा ने कहा कि प्रक्रिया संहिता में किसी खास प्रावधान की कमी कार्यवाही रोकने में कोई रुकावट नहीं बनेगी, क्योंकि मूल प्राथमिकी में बरी होने के फैसले के बाद, अदालत के पास पीएमएलए के तहत मौजूदा कार्यवाही को जारी रखने का अधिकार ही नहीं रह जाता है।
अदालत ने अपने आदेश में कहा, ‘‘मुख्य अपराधों की सुनवाई में बरी होने के कारण, धनशोधन निवारण अधिनियम (पीएमएलए) की धारा-4 के तहत दंडनीय, धारा 3 (धनशोधन का अपराध) के साथ धारा 70 (कंपनियों द्वारा अपराध) के तहत मौजूदा कार्यवाही का आधार ही खत्म हो गया है। इसके मद्देनजर मौजूदा कार्यवाही बंद की जाती है और शिकायत को खारिज किया जाता है।’’
अदालत ने कहा कि अगर बरी करने के फ़ैसले को रद्द कर दिया जाता है या ईडी के पक्ष में किसी भी तरह से बदला जाता है, तो एजेंसी के पास कार्यवाही को फिर से शुरू करने की छूट होगी।
इससे पहले बरी करने के अपने फ़ैसले में अदालत ने कहा था, ‘‘एक बार जब यह तय हो जाता है कि कोयला खदान आवंटन में विजय दर्डा की कोई भूमिका नहीं थी, तो रिश्वत के भुगतान से जुड़े अभियोजन पक्ष के मामले की बुनियाद ही ढह जाती है।’’
इसमें कहा गया था कि एएमआर को बांदर कोयला खदान का आवंटन दिलाने में विजय दर्डा की कोई भूमिका नहीं थी, इसलिए कंपनी के पास उन्हें कोई गैर-कानूनी लाभ या रिश्वत देने का न तो कोई कारण था और न ही कोई ठोस उद्देश्य।
अदालत ने रेखांकित किया कि कोयला खदान आवंटन एक उच्च-स्तरीय समिति और प्रधानमंत्री कार्यालय के ‘‘नीतिगत फ़ैसले’’ का हिस्सा था।
भाषा
धीरज दिलीप
दिलीप

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