शांतिपूर्ण प्रदर्शन का अधिकार संविधान प्रदत्त, पुलिस ज्यादती उचित नहीं : न्यायालय

शांतिपूर्ण प्रदर्शन का अधिकार संविधान प्रदत्त, पुलिस ज्यादती उचित नहीं : न्यायालय

शांतिपूर्ण प्रदर्शन का अधिकार संविधान प्रदत्त, पुलिस ज्यादती उचित नहीं : न्यायालय
Modified Date: July 27, 2026 / 06:36 pm IST
Published Date: July 27, 2026 6:36 pm IST

नयी दिल्ली, 27 जुलाई (भाषा)उच्चतम न्यायालय ने सोमवार को कहा कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन का अधिकार संविधान प्रदत्त है और किसी आंदोलन का हवाला देकर ‘‘पुलिस की ज्यादतियों’’ या ‘लाठीचार्ज’ को उचित नहीं ठहराया जा सकता।

प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने कहा कि वह मंगलवार को उन याचिकाओं पर सुनवाई करेगी जिनमें देश भर में नीट प्रश्नपत्र लीक और अन्य परीक्षाओं में अनियमितताओं को लेकर कॉकरोच जनता पार्टी (कॉजपा) के नेतृत्व में हुए विरोध प्रदर्शन में छात्रों के खिलाफ पुलिस की ज्यादतियों का आरोप लगाया गया है।

इसके अलावा पीठ विरोध-प्रदर्शन के दौरान जिन पुलिसकर्मियों पर हमला हुआ था, उनके परिवार के कुछ सदस्यों की ओर से दायर एक अलग याचिका पर भी सुनवाई करने को तैयार हो गई। इस याचिका पर दूसरी सूचीबद्ध याचिकाओं के साथ ही सुनवाई की जाएगी।

कॉजपा ने 20 जुलाई को ‘संसद चलो’ मार्च निकाला था और संसद की ओर बढ़ने के दौरान प्रदर्शनकारियों की सुरक्षाकर्मियों से झड़प हो गई थी और भीड़ को तितर-बितर करने के लिए कानून प्रवर्तन एजेंजियों द्वारा लाठीचार्ज किया गया था और आंसू गैस के गोले छोड़े गए थे।

प्रधान न्यायाधीश ने कहा, ‘‘शांतिपूर्ण प्रदर्शन करना संविधान प्रदत्त अधिकार है और इससे इनकार नहीं किया जा सकता। केवल यह कहकर कि आंदोलन चल रहा है, पुलिस की ज्यादतियों को उचित नहीं ठहराया जा सकता।’’

पीठ ने कहा, ‘‘अगर कोई ज्यादती हुई है, तो उसकी स्वतंत्र रूप से जांच होनी चाहिए। यह केवल दिल्ली का मामला नहीं है। प्रोटोकॉल में एकरूपता जरूरी है… लोकतांत्रिक प्रक्रिया के लिए अनुशासन अहम है।’’

जब एक वकील ने कहा कि पुलिसकर्मियों की भी पिटाई की गई थी, तो पीठ ने रेखांकित किया कि हर व्यक्ति का जीवन महत्वपूर्ण है, चाहे वह कोई भी हो।

न्यायमूर्ति बागची ने कहा, ‘‘चाहे पुलिसकर्मी हों या छात्र, किसी को भी चोट पहुंचना समान रूप से चिंता का विषय है। हम राज्य (सरकार)से यह सवाल कर सकते हैं कि ऐसी स्थितियों से निपटने के लिए पुलिस को पर्याप्त उपकरण क्यों नहीं दिए जाते… उनके पास हेलमेट होने चाहिए।’’

प्रधान न्यायाधीश ने कहा, ‘‘सिर्फ इसलिए कि कोई आंदोलन हो रहा है, इसका मतलब यह नहीं कि ‘लाठीचार्ज’ किया जाए। लोकतांत्रिक प्रक्रिया के लिए आवश्यक है कि लोग स्वयं अनुशासन का पालन करें।’’ उन्होंने पक्षकारों से पीठ की सहायता करने का भी आग्रह किया।

केंद्र सरकार की ओर से पेश हुये सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि वह इस मामले में निष्पक्ष रूप से अदालत की सहायता करेंगे।

संक्षिप्त सुनवाई के दौरान अधिवक्ता फौजिया शकील ने आरोप लगाया कि बिहार में प्रदर्शनकारियों के खिलाफ पुलिस ने एके-47 राइफल का इस्तेमाल किया।

वरिष्ठ अधिवक्ता विकास सिंह ने कहा कि बिहार में छात्रों पर हमले की कई घटनाएं भी हुई हैं।

इससे पहले, शीर्ष अदालत ने विरोध कर रहे छात्रों के खिलाफ पुलिस की ज्यादतियों का आरोप लगाने वाली याचिकाओं पर सोमवार को सुनवाई करने पर सहमति जताई थी।

एक याचिका में सार्वजनिक विरोध-प्रदर्शनों के दौरान पुलिस की कार्रवाई को नियंत्रित करने के लिए देशव्यापी दिशानिर्देश जारी करने का अनुरोध किया गया है। इसमें भीड़ को नियंत्रित करने के काम में सादे कपड़ों में पुलिसकर्मियों की तैनाती पर रोक, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 163 के तहत निषेधाज्ञा लागू करने के संबंध में एहतियाती उपाय, और दिल्ली में 20 जुलाई के विरोध-प्रदर्शन के दौरान पुलिस की कार्रवाई की स्वतंत्र जांच का अनुरोध शामिल है।

एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड चांद कुरैशी के जरिए शैलेंद्र मणि त्रिपाठी की ओर से दाखिल याचिका में केंद्र, दिल्ली सरकार, पुलिस आयुक्त और सभी राज्यों व केंद्र शासित प्रदेशों को प्रतिवादी बनाया गया है।

इसमें संविधान के अनुच्छेद 14, 19 और 21 के तहत मौलिक अधिकारों का क्रियान्वयन सुनिश्चित करने का अनुरोध किया गया है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि 20 जुलाई को दिल्ली में हुए प्रदर्शन के दौरान भारी पुलिस बल की तैनाती की गई,अवरोधक लगाए गए, आंसू गैस छोड़ी गयी, लाठीचार्ज और बड़े पैमाने पर लोगों को हिरासत में लेने जैसी कार्रवाई की गई, जिससे कम से कम 60 प्रदर्शनकारी घायल हो गए।

इसमें महिला प्रदर्शनकारियों के साथ मारपीट और लैंगिक दुर्व्यवहार के साथ-साथ बिना पहचान वाले या सादे कपड़ों में मौजूद कर्मियों द्वारा बल प्रयोग का भी आरोप लगाया गया है।

प्रदर्शनकारी केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग कर रहे थे।

कॉजपा नीत आंदोलन 20 जून को जंतर-मंतर पर शुरू हुआ और शनिवार को प्रधान के इस्तीफे सहित अन्य मांगें सरकार द्वारा माने जाने के बाद समाप्त हो गया।

दिल्ली उच्च न्यायालय ने 20 जुलाई को संसद मार्च के दौरान प्रदर्शनकारियों के खिलाफ कथित अत्यधिक बल प्रयोग के आरोपों से संबंधित दो अलग-अलग याचिकाओं पर 22 जुलाई को केंद्र सरकार और दिल्ली पुलिस से जवाब मांगा था।

उच्च न्यायालय ने अधिकारियों को निर्देश दिया था कि पुलिस कार्रवाई से जुड़े सभी प्रासंगिक अभिलेख सुरक्षित रखे जाएं, जिनमें सीसीटीवी कैमरों की फुटेज और घटना की वीडियोग्राफी भी शामिल है।

भाषा धीरज नरेश

नरेश


लेखक के बारे में