नयी दिल्ली, तीन सितंबर (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने बृहस्पतिवार को उस यूट्यूबर को सुनाई गई छह महीने जेल की सज़ा पर रोक लगा दी, जिसे कुछ न्यायिक अधिकारियों पर ‘‘व्यक्तिगत हमले’’ करने और न्यायिक व्यवस्था की गरिमा को ‘‘कमतर’’ करने वाले वीडियो के लिए अदालत की अवमानना का दोषी ठहराया गया था।
न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति शील नागू की पीठ ने यूट्यूबर गुलशन पाहुजा की याचिका पर सुनवाई करने का फ़ैसला किया। पाहुजा ने दिल्ली उच्च न्यायालय के उस आदेश को चुनौती दी है, जिसमें उन्हें आपराधिक अवमानना का दोषी ठहराते हुए सज़ा सुनाई गई थी।
शीर्ष अदालत ने याचिका पर नोटिस जारी करते हुए कहा कि पाहुजा को हिरासत से रिहा किया जाए।
पाहुजा ने वकील जुगुल किशोर गुप्ता के माध्यम से उच्चतम न्यायालय में यह याचिका दायर की थी।
उच्च न्यायालय ने अप्रैल में, उन्हें अदालत की अवमानना का दोषी ठहराया था। अदालत ने कहा था कि ‘फाइट फॉर ज्यूडिशियल रिफॉर्म्स’ नामक चैनल पर पाहुजा की सामग्री (कंटेंट) संविधान के तहत ‘‘अभिव्यक्ति की आज़ादी’’ के दायरे में नहीं आता है।
अदालत ने कहा था, ‘‘उन्होंने (पाहुजा ने) तीन न्यायिक अधिकारियों पर व्यक्तिगत हमले किए हैं और यहां तक कहा है कि अगर किसी वादी का मामला उन न्यायिक अधिकारियों के सामने आता है, तो उसे न्याय की उम्मीद नहीं करनी चाहिए। न्यायिक अधिकारियों के बारे में ऐसी बेबुनियाद और व्यापक टिप्पणियों का आधार क्या है?’’
अदालत ने कहा था कि किसी भी न्यायिक अधिकारी से हर समय 100 प्रतिशत सही होने की उम्मीद नहीं की जा सकती, और इसीलिए, वादी के पास अपील के जरिये ऊपरी अदालत में जाने का विकल्प होता है।
उच्च न्यायालय ने कहा था, लेकिन किसी न्यायिक अधिकारी की ईमानदारी या योग्यता पर हमला ठोस सबूतों के साथ होना चाहिए, क्योंकि निराधार आरोप उनके (न्यायिक अधिकारियों के) अधिकार को कमजोर करते हैं और बिना किसी डर या पक्षपात के न्याय देने में बाधा डालते हैं।
उच्च न्यायालय ने मई में पाहुजा को छह महीने के साधारण कारावास की सजा सुनाई थी और इसके साथ ही 2,000 रुपये का जुर्माना भी लगाया था।
भाषा सुरेश रंजन
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