Contract Employees Regularization Order: संविदा कर्मचारियों के लिए सुप्रीम कोर्ट से आई खुशखबरी, दिया नियमितीकरण का आदेश, दिया ऐसा निर्देश कि जानकर झूमने लगेंगे खुशी से
Contract Employees Regularization Order Supreme Court: संविदा कर्मचारियों के लिए सुप्रीम कोर्ट से आई खुशखबरी, दिया नियमितीकरण का आदेश

Contract Employees Regularization Order: संविदा कर्मचारियों के लिए सुप्रीम कोर्ट से आई खुशखबरी / Image Source: IBC24 Customized
- संविदा कर्मचारी को नियमित करने का आदेश
- अस्थाई रूप से काम पर रखना संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन
- नियमितीकरण के बाद कर्मचारी को न्यूनतम वेतन
नई दिल्ली: Contract Employees Regularization Order Supreme Court देशभर में संविदा कर्मचारियों के नियमतीकरण की मांग उठने लगी है। अलग-अलग राज्यों में संविदा कर्मचारी नियमितीकरण सहित अपनी अन्य मांगों को लेकर प्रदर्शन कर रहे हैं। हालांकि कई राज्यों की सरकारों ने संविदा कर्मचारियों का नियमितीकरण किया है, लेकिन लाखों कर्मचारी आज भी नियमितीकरण से वंचित हैं। इन सब के बीच सुप्रीम कोर्ट ने संविदा कर्मचारियों के लिए अहम फैसला लेते हुए नियमित करने का आदेश दिया है। मामले में सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले को खारिज कर दिया है।
Contract Employees Regularization Order Supreme Court मिली जानकारी के अनुसार साल 1989 से 92 तक वाहन चालक के तौर पर सेवा देने वाले उत्तर प्रदेश उच्च शिक्षा सेवा आयोग अनियमित कर्मचारी ने की नियमितीकरण की मांग को आयोग ने वित्तीय कारणों और नए पद के श्रृजन की समस्याओं का हवाला देते हुए खारिज कर दिया था। जबकि वह कर्मचारी पिछले करीब तीन साल से नियमित रूप से वाहन चालक के तौर पर आयोग में रेवरत था। मामले को लेकर कर्मचारी ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था, लेकिन यहां भी आयोग के फैसले को सही ठहराया गया।
सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई
वहीं, हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती देते हुए वाहन चालक ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की, जहां मामले की सुनवाई जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की खंडपीठ ने की। मामले में सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट की डबल बेंच ने कहा कि किसी कर्मचारी का नियमितीकरण सिर्फ इस आधार पर नहीं रोका जा सकता कि उसकी नियुक्ति दैनिक वेतनभोगी के तौर पर हुई थी और कोई स्वीकृत पद नहीं है। कोर्ट ने सुनवाई के दौरान ये भी कहा कि राज्य केवल एक बाजार भागीदार नहीं, बल्कि एक संवैधानिक नियोक्ता है। राज्य उन लोगों की पीठ पर बजट को संतुलित नहीं कर सकता, जो सबसे बुनियादी और स्थायी सार्वजनिक कार्य करते हैं।
शोषण नहीं किया जा सकता
कोर्ट ने आगे कहा, "जहां काम दिन-ब-दिन और साल-दर-साल दोहराया जाता है, वहां अस्थायी व्यवस्था के माध्यम से श्रमिकों का शोषण नहीं किया जा सकता। अस्थायी लेबल के तहत नियमित श्रम का लंबे समय तक शोषण करना सार्वजनिक प्रशासन में विश्वास को कम करता है और समान सुरक्षा के वादे को ठेस पहुंचाता है।" न्यायालय ने यह भी कहा कि वित्तीय तंगी एक बहाना नहीं है जो निष्पक्षता और संवैधानिक दायित्वों को ओवरराइड कर सके। कोर्ट ने पाया कि अपीलकर्ताओं के साथ भेदभाव किया गया था, क्योंकि समान रूप से काम करने वाले अन्य कर्मचारियों को नियमित कर दिया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा, "एक ही प्रतिष्ठान में चयनात्मक नियमितीकरण, जबकि अन्य को दैनिक मजदूरी पर रखना, समानता का स्पष्ट उल्लंघन है। एक संवैधानिक नियोक्ता के रूप में, राज्य को उच्च मानक पर रखा गया है।"
कोर्ट ने सरकार को आदेश देते हुए कहा कि कर्मचारी का नियमितीकरण के बाद वेतन भी न्यूनतम नहीं रखा जा सकता है। उन्हें वेतनवृद्धि के साथ-साथ अन्य भत्तों का भी लाभ मिलना चाहिए। साथ ही वरिष्ठता और पदोन्नति के लिए, सेवा की गणना 2002 से की जाएगी।
सामान्यतः पूछे जाने वाले प्रश्नः
उत्तर: सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि कर्मचारियों का नियमितीकरण केवल इस आधार पर नहीं रोका जा सकता कि वे दैनिक वेतनभोगी थे या कोई स्वीकृत पद नहीं है।
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