न्यायालय ने सौतेली बेटी से दुष्कर्म और हत्या के दोषी की मौत की सजा उम्रकैद में बदली
न्यायालय ने सौतेली बेटी से दुष्कर्म और हत्या के दोषी की मौत की सजा उम्रकैद में बदली
नयी दिल्ली, 24 सितंबर (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने छह वर्षीय सौतेली बेटी का बार-बार यौन उत्पीड़न करने और उसका गला घोंटकर हत्या करने के मामले में एक व्यक्ति को दी गई मौत की सजा को बृहस्पतिवार को घटाकर बिना किसी छूट के शेष जीवनकाल तक कारावास में बदल दिया।
न्यायमूर्ति विक्रम नाथ, न्यायमूर्ति संदीप मेहता और न्यायमूर्ति विजय बिश्नोई की पीठ ने दोषी की उस अपील पर यह फैसला सुनाया, जिसमें उसने दोषसिद्धि और मौत की सजा को बरकरार रखने के मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय की इंदौर पीठ के 2019 के फैसले को चुनौती दी थी।
पीठ ने कहा, ‘‘अपराध अत्यंत गंभीर प्रकृति का है और इसमें असाधारण परिस्थितियां शामिल हैं, लेकिन अपीलकर्ता के सुधार की संभावनाएं वास्तविक और पर्याप्त हैं। राज्य, जिस पर इसका दायित्व था, उसकी ओर से सुधार की संभावना को खारिज नहीं किया गया है।’’
पीठ ने कहा कि 56 वर्षीय दोषी को शीर्ष अदालत द्वारा दी गई यह सजा मृत्युदंड के बाद दूसरी सबसे कठोर सजा है। इसके तहत उसे बिना किसी छूट के जीवन के अंतिम समय तक जेल में रहना होगा।
पीठ ने पीड़िता की मां की गवाही का हवाला देते हुए कहा कि उसकी गवाही विश्वसनीय है और उसके पक्ष में चिकित्सकीय साक्ष्य तथा फोन रिकॉर्ड उपलब्ध हैं।
पीठ ने कहा, ‘‘इस अदालत के विचार में, एक मां आमतौर पर वह आखिरी व्यक्ति होगी जो अपने ही बच्चे के हत्यारे को बचाएगी और उसकी जगह किसी निर्दोष व्यक्ति को फंसाएगी।’’
शीर्ष अदालत ने कहा कि घर के भीतर बच्चों का यौन उत्पीड़न आमतौर पर छिपकर किया जाता है। ऐसे मामलों में प्रायः अपराधी व बच्चा ही मौजूद होते हैं और यदि परिवार का कोई अन्य सदस्य वहां हो भी, तो उसके लिए अपराध को रोक पाना संभव नहीं होता। इसलिए, ऐसे अपराधों में खुले तौर पर किए गए अपराधों की तरह प्रत्यक्ष साक्ष्य की अपेक्षा करना उचित नहीं होगा, क्योंकि अपराध की प्रकृति ही ऐसे साक्ष्य जुटाने में बाधा बनती है।
पीठ ने कहा, ‘‘ऐसा करना उन लोगों को संरक्षण देने जैसा होगा, जो घर की चारदीवारी के भीतर बच्चों को अपना शिकार बनाते हैं और अपने अपराध को गोपनीयता के पर्दे में छिपा लेते हैं।’’
इसने कहा कि मां ने अपीलकर्ता को बच्ची का गला घोंटते हुए देखा था, इसलिए वह इस घटना की प्रत्यक्षदर्शी है। वहीं, बच्ची के साथ हुए यौन उत्पीड़न का खुलासा खुद नाबालिग ने अपनी मां से बातचीत के दौरान किया था।
फैसला लिखने वाले न्यायमूर्ति नाथ ने 157 पृष्ठों के फैसले में कहा, ‘‘जिस पीड़िता को जिंदगी में खामोश कर दिया गया, वह कानून की नजर में खामोश नहीं हुई है। अपनी मां के जरिए अदालत तक पहुंचने वाली उसकी आवाज और उसके शरीर पर बने निशान इस बात के गवाह हैं कि उसके साथ क्या किया गया था।’’
शीर्ष अदालत को अधीनस्थ अदालत और उच्च न्यायालय के उन निष्कर्षों में कोई त्रुटियां नहीं मिली, जिनमें अपीलकर्ता को तत्कालीन भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) और यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण (पॉक्सो) अधिनियम के तहत दोषी ठहराया गया था।
पीठ ने कहा, ‘‘हम शुरुआत में ही और पूरी स्पष्टता के साथ यह टिप्पणी करने के लिए बाध्य हैं कि अधीनस्थ अदालत द्वारा सजा के प्रश्न पर जिस तरीके से विचार किया गया, वह कानून द्वारा अपेक्षित मानकों के अनुरूप नहीं था।’’
पीठ ने इस बात पर गौर किया कि अधीनस्थ अदालत ने दिसंबर 2018 में एक ही दिन आरोपी को दोषी ठहराया और उसी दिन उसे मृत्युदंड भी सुना दिया।
इसने कहा कि तत्कालीन दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 235(2) के तहत यह अनिवार्य था कि दोषसिद्धि के बाद सजा के प्रश्न पर आरोपी का पक्ष सुना जाए।
पीठ ने कहा, ‘‘यह जरूरत महज एक औपचारिकता नहीं है।’’
इसने कहा कि देश के कानून के तहत केवल अपराध की गंभीरता को मृत्युदंड देने के लिए कभी पर्याप्त आधार नहीं माना गया है, “यदि ऐसा होता, तो ‘दुर्लभ से दुर्लभतम’ का सिद्धांत अपराध की गंभीरता को मापने भर तक सीमित होकर रह जाता और अपराधी की परिस्थितियों का आकलन करने की कानूनी आवश्यकता का कोई अर्थ नहीं रह जाता।”
अभियोजन पक्ष के मुताबिक, आरोपी ने घर के भीतर अपनी ही सौतेली बेटी का लगातार यौन उत्पीड़न किया और बाद में उसका गला घोंटकर हत्या कर दी। इस वारदात की इकलौती चश्मदीद बच्ची की मां यानी आरोपी की पत्नी थी।
भाषा खारी नरेश
नरेश

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