न्यायालय: अविवाहित वयस्कों के बीच सहमति से बने संबंध खराब चरित्र साबित करने का आधार नहीं हैं

न्यायालय: अविवाहित वयस्कों के बीच सहमति से बने संबंध खराब चरित्र साबित करने का आधार नहीं हैं

न्यायालय: अविवाहित वयस्कों के बीच सहमति से बने संबंध खराब चरित्र साबित करने का आधार नहीं हैं
Modified Date: June 8, 2026 / 01:25 pm IST
Published Date: June 8, 2026 1:25 pm IST

नयी दिल्ली, आठ जून (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने अपने एक फैसले में कहा कि दो अविवाहित वयस्कों के बीच सहमति से बने शारीरिक संबंध को, उस संबंध में शामिल लोगों के चरित्र के बारे में प्रतिकूल धारणा बनाने का आधार नहीं बनाया जा सकता।

न्यायमूर्ति मनमोहन और न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा की पीठ ने यह टिप्पणी तेलंगाना राज्य स्तरीय पुलिस भर्ती बोर्ड को एक ऐसे उम्मीदवार की नियुक्ति का निर्देश देते हुए की, जिसका पुलिस कांस्टेबल पद पर चयन एक असफल प्रेम संबंध से जुड़े आपराधिक मामले में संलिप्तता के कारण रद्द कर दिया गया था।

पीठ ने कहा, ‘‘दो अविवाहित वयस्कों के बीच सहमति से बने शारीरिक संबंध उस संबंध में शामिल लोगों के चरित्र के बारे में प्रतिकूल धारणा बनाने का आधार नहीं हो सकता और न ही होना चाहिए। ऐसा कोई कानून नहीं है जो दो अविवाहित वयस्कों को सहमति से अपनी पसंद का संबंध रखने से रोकता हो।’’

न्यायालय ने उम्मीदवार द्वारा दायर अपील को स्वीकार कर लिया और तेलंगाना उच्च न्यायालय के एकल न्यायाधीश के उस आदेश को बरकरार रखा जिसमें ‘स्टाइपेंडरी कैडेट ट्रेनी पुलिस कांस्टेबल’ के पद पर उसकी नियुक्ति पर पुनर्विचार करने का निर्देश दिया गया था।

तेलंगाना राज्य स्तरीय पुलिस भर्ती बोर्ड ने उनकी नियुक्ति इस आधार पर रद्द कर दी थी कि 2014 में उनके खिलाफ शादी का झांसा देकर बलात्कार करने का जो मामला दर्ज किया गया था, वह नैतिक पतन को दर्शाता है।

यह मामला पड़ोसी के साथ संबंध से जुड़ा है और दोनों पक्षों के बीच समझौता होने के बाद 2015 में लोक अदालत में इसका निपटारा हो गया था। आईपीसी की धारा 376 के तहत कोई आरोप नहीं लगाया गया था।

मामले का जिक्र करते हुए उच्चतम न्यायालय ने कहा कि अपीलकर्ता और पीड़िता पड़ोसी थे और लगभग चार साल तक उनके बीच संबंध थे।

पीठ ने कहा, ‘‘हर रिश्ता शादी में तब्दील नहीं होता। इसलिए, सिर्फ इसलिए कि रिश्ता शादी में तब्दील नहीं हुआ, यह मानने का कोई आधार नहीं है कि एक पक्ष ने दूसरे को धोखा दिया है।’’

पीठ ने यह भी कहा, ‘‘यदि यह समझौता करने के लिए बल प्रयोग या धमकी का मामला होता, तो प्रतिवादी अनुशासित बल में नियुक्ति के लिए अपीलकर्ता की उपयुक्तता पर निर्णय लेने में न्यायसंगत होता। हालांकि, यहां ऐसा कोई सबूत नहीं है जिससे यह निष्कर्ष निकाला जा सके कि पीड़िता पर समझौता थोपा गया था।’’

शीर्ष अदालत ने कहा कि आपराधिक न्यायशास्त्र में, जब तक किसी अदालत में आरोप सिद्ध नहीं हो जाता, तब तक निर्दोष होने की धारणा बनी रहती है।

भाषा शोभना वैभव

वैभव


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