अदालत ने शबरिमला सोना चोरी प्रकरण में एसआईटी से अंतिम रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया
अदालत ने शबरिमला सोना चोरी प्रकरण में एसआईटी से अंतिम रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया
कोच्चि, 20 जुलाई (भाषा) केरल उच्च न्यायालय ने शबरिमला स्थित भगवान अयप्पा मंदिर से सोने की चोरी के प्रकरण की जांच करने वाले विशेष जांच दल (एसआईटी) से जांच पूरा करने और जल्दी से जल्दी अंतिम रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया है।
केरल उच्च न्यायालय के न्यायाधीश राजा विजयराघवम एवं न्यायमूर्ति के वी जयकुमार की खंडपीठ ने वस्तुस्थिति रिपोर्ट पर विचार करने के बाद यह निर्देश दिया। वर्ष 2019 में सोने की चादर फिर से मढ़ने के कार्य के दौरान द्वारपालक की स्वर्ण पट्टिकाओं तथा श्रीकोविल (गर्भगृह) के द्वार की चौखट से कथित तौर पर सोना गायब होने से जुड़े दो मामलों पर विशेष जांच दल ने यह रिपोर्ट दाखिल की थी।
विशेष जांच दल (एसआईटी) के अनुसार, झारखंड के जमशेदपुर स्थित सीएसआईआर की राष्ट्रीय धातुकर्म प्रयोगशाला में विशेष वैज्ञानिक परीक्षण कराया गया है। यह देश का एकमात्र ऐसा संस्थान है, जहां इस प्रकार के उन्नत धातुकर्मीय विश्लेषण की सुविधा उपलब्ध है।
एसआईटी ने कहा कि आरोपियों ने कथित रूप से तांबे की पट्टिकाओं पर चढ़ी सोने की परत को किस प्रकार हटाया, कथित रूप से चोरी किए गए सोने की मात्रा कितनी थी तथा तांबे की पट्टिकाओं की मौलिकता, संरचना और धातुकर्मीय विशेषताओं का निर्धारण करने के लिए यह वैज्ञानिक परीक्षण आवश्यक थे।
जांच दल की रिपोर्ट में कहा गया है कि सोने की परत चढ़ाने का कार्य करने वाली कंपनी ‘स्मार्ट क्रिएशंस’ से जब्त किए गए सोने की परत हटाने वाले रासायनिक मिश्रण को प्रयोगशाला भेजा गया, ताकि यह पता लगाया जा सके कि क्या वह अभियोजन पक्ष के दावे के अनुरूप सोने की परत हटाने में सक्षम है या नहीं।
एसआईटी की रिपोर्ट का उल्लेख करते हुए उच्च न्यायालय ने कहा कि वैज्ञानिक विश्लेषण से आरोपियों द्वारा कथित रूप से अपनाई गई कार्यप्रणाली के संबंध में नए तथ्य सामने आए हैं।
अदालत ने कहा, ‘‘राष्ट्रीय धातुकर्म प्रयोगशाला द्वारा दी गई अंतिम वैज्ञानिक राय में आरोपियों द्वारा कथित रूप से अपनाई गई पूरी प्रक्रिया का व्यापक वैज्ञानिक विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है। इसमें स्पष्ट किया गया है कि तांबे की पट्टिकाओं से सोने की परत किस प्रकार हटाई गई तथा तांबे की पट्टिकाओं की संरचना और धातुकर्मीय विशेषताओं का भी निर्धारण किया गया है।’’
खंडपीठ ने कहा कि वैज्ञानिक परीक्षण के आधार पर विशेष जांच दल (एसआईटी) यह निर्धारित करने में सफल रहा कि पट्टिकाओं पर मूल रूप से चढ़ाई गई सोने की परत में सोने की मात्रा और उसकी शुद्धता क्या थी। साथ ही, ‘स्मार्ट क्रिएशंस’ द्वारा नैनो-स्वर्ण परत चढ़ाने में प्रयुक्त सोने की मात्रा का भी निर्धारण किया गया। इससे आरोपियों द्वारा कथित रूप से अपनाई गई कार्यप्रणाली को समझने के लिए वैज्ञानिक आधार प्राप्त हुआ।
एसआईटी ने न्यायालय को बताया कि उसके अधिकारियों ने नौ से 11 जुलाई के बीच जमशेदपुर स्थित राष्ट्रीय धातुकर्म प्रयोगशाला का दौरा किया, वहां परीक्षण करने वाले वैज्ञानिकों से बातचीत की और उनके बयान दर्ज किए।
श्रीकोविल के द्वार-चौखट से कथित रूप से सोना चोरी किए जाने के मामले की जांच लगभग पूरी हो चुकी है। एसआईटी ने कहा कि वह 30 दिनों के भीतर अंतिम जांच रिपोर्ट दाखिल करने की स्थिति में होगी, जिसके बाद वह सक्षम प्राधिकारी से अभियोजन की स्वीकृति प्राप्त करने का अनुरोध करेगी।
एसआईटी ने उच्च न्यायालय को यह भी बताया कि वर्ष 2025 में द्वारपालक प्रतिमाओं पर फिर से सोने की परत पुनः चढ़ाने के दौरान कथित स्वर्ण चोरी के आरोपों को पहले से दर्ज मामले के साथ जोड़ दिया गया है।
उच्च न्यायालय ने कहा कि जांच एजेंसी के अनुसार, राष्ट्रीय धातुकर्म प्रयोगशाला के निष्कर्षों से वर्ष 2025 के कथित लेन-देन के संबंध में भी नए तथ्य सामने आए हैं।
अदालत के समक्ष यह भी दर्ज किया गया कि वर्ष 2025 के कथित लेन-देन के संबंध में अब तक 54 गवाहों के बयान दर्ज किए जा चुके हैं।
एसआईटी ने अदालत को बताया कि द्वारपालक मामले में भी अंतिम जांच रिपोर्ट शीघ्र दाखिल की जा सकती है। हालांकि, जांच के कुछ गोपनीय पहलुओं को पूरा करने के लिए उसने अतिरिक्त समय देने का अनुरोध किया।
स्थिति रिपोर्टों का अवलोकन करने के बाद उच्च न्यायालय ने कहा कि राष्ट्रीय धातुकर्म प्रयोगशाला द्वारा किया गया वैज्ञानिक विश्लेषण जांच का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।
अदालत ने कहा, ‘इस चुनौतीपूर्ण दायित्व को स्वीकार करने की संस्थान की तत्परता और उसके द्वारा किए गए उच्च गुणवत्ता वाले वैज्ञानिक विश्लेषण ने जांच की प्रगति में उल्लेखनीय सहायता प्रदान की है। देश की किसी अन्य प्रयोगशाला के पास इस मामले में आवश्यक जटिल धातुकर्मीय परीक्षण करने के लिए जरूरी विशेष अवसंरचना, उपकरण और तकनीकी विशेषज्ञता उपलब्ध नहीं है।’
पीठ ने कहा कि यह मामला केवल प्रत्यक्षदर्शी या परिस्थितिजन्य साक्ष्यों पर आधारित नहीं है, बल्कि अभियोजन पक्ष काफी हद तक वैज्ञानिक और फोरेंसिक साक्ष्यों पर निर्भर है।
अदालत ने कहा, ‘अब जबकि अंतिम वैज्ञानिक रिपोर्ट प्राप्त हो चुकी है, हम जांच एजेंसी को निर्देश देते हैं कि वह द्वारपालक मामले की जांच शीघ्र पूरी कर संबंधित अधिकार-क्षेत्र वाले न्यायालय के समक्ष यथाशीघ्र अंतिम जांच रिपोर्ट प्रस्तुत करे।’
मामले की अगली सुनवाई तीन सितंबर को निर्धारित की गई है।
भाषा रंजन सुरेश
सुरेश

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