अदालत ने पुलिसकर्मी पर हमले के आरोपी को जमानत दी, प्राथमिकी में देरी पर उठाए सवाल
अदालत ने पुलिसकर्मी पर हमले के आरोपी को जमानत दी, प्राथमिकी में देरी पर उठाए सवाल
नयी दिल्ली, 27 अगस्त (भाषा) दिल्ली की एक अदालत ने आपातकालीन पीसीआर ड्यूटी पर तैनात एक पुलिस कांस्टेबल से मारपीट के आरोपी को जमानत देते हुए कहा है कि अभियोजन पक्ष द्वारा पेश वीडियो फुटेज में कथित अपराध के समय सह-आरोपी की मौके पर मौजूदगी दिखाई नहीं देती। अदालत ने बिना स्पष्ट कारण के प्राथमिकी दर्ज करने में हुई देरी पर भी सवाल उठाया।
अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश मुनीश बंसल आरोपी विपांशु राणा की जमानत याचिका पर सुनवाई कर रहे थे। राणा को भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की विभिन्न धाराओं के तहत दर्ज प्राथमिकी के सिलसिले में गिरफ्तार किया गया था। इनमें लोक सेवक पर हमला करने या उसके काम में बाधा डालने से संबंधित धाराएं भी शामिल हैं।
अदालत ने 25 अगस्त के एक आदेश में कहा, ‘घटना के वीडियो फुटेज से घटना वाली जगह पर सह-आरोपी राघव की मौजूदगी का पता नहीं चलता, जैसा कि अभियोजन पक्ष ने आरोप लगाया था। यहां तक कि जो स्कूटी अपराध के दौरान इस्तेमाल की गई बताई जा रही है वह भी बरामद नहीं हुई है।’
अभियोजन के अनुसार, 12 और 13 मई की दरमियानी रात आपातकालीन पीसीआर ड्यूटी पर तैनात कांस्टेबल सौरव कुमार को झगड़े की सूचना मिली। मौके पर पहुंचने पर उन्हें बताया गया कि जुपिटर स्कूटर पर सवार दो लोगों ने फोन करने वाले और उसके ग्राहकों के साथ मारपीट की है।
कॉन्स्टेबल ने कथित तौर पर उन दो लोगों का पीछा किया और चंदर विहार में बाबा बालकनाथ मंदिर के पास उन्हें रोका। अभियोजन पक्ष के अनुसार, उन लोगों ने अपनी पहचान बताने से इनकार कर दिया, कॉन्स्टेबल के साथ गाली-गलौज और मारपीट की, उसकी वर्दी फाड़ दी और उसे धमकी देते हुए भाग गए।
हालांकि, अदालत ने अभियोजन के मामले में कई विसंगतियां पाईं।
अदालत ने पाया कि अभियोजन पक्ष द्वारा पेश किए गए वीडियो फुटेज में घटना वाली जगह पर सह-आरोपी की मौजूदगी नहीं दिखी। अदालत ने यह भी गौर किया कि बचाव पक्ष द्वारा पेश किए गए फुटेज में शिकायतकर्ता राणा को लकड़ी के तख्ते से पीटता हुआ दिख रहा था, जबकि घटना की प्राथमिकी में इस बात का कोई उल्लेख नहीं था।
अदालत ने यह सवाल भी उठाया कि शिकायतकर्ता (जो एक पुलिसकर्मी है) और जिसने कथित तौर पर आरोपी का पीछा किया था, वह उस दो-पहिया वाहन का पंजीकरण नंबर क्यों नहीं नोट कर सका। अदालत ने यह भी गौर किया कि अपराध में कथित तौर पर इस्तेमाल किया गया दो-पहिया वाहन नहीं मिला।
न्यायाधीश ने प्राथमिकी दर्ज करने में हुई देरी पर भी चिंता जताई। शिकायतकर्ता की चिकित्सकीय जांच 13 मई को सुबह करीब 5:30 बजे हुई थी, लेकिन प्राथमिकी 14 मई को शाम 4:55 बजे दर्ज की गई।
अदालत ने कहा, ‘अभियोजन पक्ष इस मामले में प्राथमिकी दर्ज करने में हुई अप्रत्याशित देरी की वजह बताने में पूरी तरह नाकाम रहा है, खासकर तब जब शिकायतकर्ता खुद एक पुलिसकर्मी था।’
अदालत ने स्पष्ट किया कि जमानत के चरण में वह तथ्यों की विस्तृत जांच नहीं कर रही है, लेकिन रिकॉर्ड से सामने आने वाली परिस्थितियों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
अदालत ने राणा को 25,000 रुपये के निजी मुचलके और इतनी ही राशि की जमानत देने पर जमानत प्रदान कर दी।
भाषा
शुभम नरेश
नरेश

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