कारणों के विस्तृत उल्लेख के बिना दिए गए जमानत आदेशों पर पुनर्विचार जरूरी नहीं: न्यायालय

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कारणों के विस्तृत उल्लेख के बिना दिए गए जमानत आदेशों पर पुनर्विचार जरूरी नहीं: न्यायालय

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  • Publish Date - July 31, 2026 / 03:28 PM IST,
    Updated On - July 31, 2026 / 03:28 PM IST

नयी दिल्ली, 31 जुलाई (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने शुक्रवार को कहा कि किसी जमानत आदेश में विस्तृत कारण नहीं दिए जाने मात्र से उस पर दोबारा विचार करना जरूरी नहीं है क्योंकि किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता अदालत के आदेश में खामी पर नहीं, बल्कि अभियोजन पक्ष के मामले की मजबूती पर निर्भर करती है।

शीर्ष अदालत ने बनभूलपुरा हिंसा मामले के आरोपी अब्दुल मलिक को नैनीताल उच्च न्यायालय से मिली जमानत के खिलाफ उत्तराखंड सरकार की अपील खारिज करते हुए यह टिप्पणी की।

आरोप है कि आठ फरवरी 2024 को एक मस्जिद को ढहाए जाने के दौरान बड़ी संख्या में लोगों ने सुरक्षाकर्मियों पर पथराव किया और सरकारी एवं निजी वाहनों में आग लगा दी। भीड़ ने एक पुलिस थाने में भी कथित तौर पर आग लगा दी और पुलिस पर पेट्रोल बम फेंके। यह भी आरोप है कि हिंसा की साजिश मलिक के आवास पर रची गई थी।

राज्य सरकार की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता गौरव भाटिया ने जमानत रद्द करने का अनुरोध करते हुए कहा कि उच्च न्यायालय ने जमानत देने के कारण स्पष्ट किए बिना आदेश पारित किया।

न्यायमूर्ति बागची ने कहा, ‘‘जमानत के ऐसे आदेशों पर दोबारा विचार करने की आवश्यकता नहीं है, जिनमें विस्तृत कारण नहीं दिए गए हों।’’

वरिष्ठ अधिवक्ता ने कहा कि कारणों का उल्लेख किए बिना जमानत देने के आदेश उच्चतम न्यायालय के कई फैसलों के विपरीत हैं।

न्यायाधीश ने कहा, ‘‘उन फैसलों पर दोबारा विचार किए जाने की जरूरत है।’’

उन्होंने राज्य पुलिस द्वारा गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम लागू किए जाने पर भी सवाल उठाया।

इससे पहले, न्यायमूर्ति बागची ने चैतन्य बघेल को जमानत देने के उच्च न्यायालय के आदेश के खिलाफ प्रवर्तन निदेशालय और छत्तीसगढ़ सरकार की याचिकाएं खारिज करते हुए जमानत आदेशों को नियमित रूप से चुनौती देने की ‘‘बढ़ती प्रवृत्ति’’ पर गहरी चिंता जताई थी।

न्यायमूर्ति बागची ने उस समय कहा था, ‘‘एक फैसला है, जिसमें कहा गया है कि जमानत देते समय कारण बताने की जरूरत नहीं है लेकिन जमानत देने से इनकार करते समय कारण बताना जरूरी है।’’

न्यायमूर्ति बागची ने मौजूदा मामले का उल्लेख करते हुए सवाल किया, ‘‘अगर कोई भीड़ पुलिस थाने को जला देती है तो उस पर गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम कैसे लागू हो सकता है?’’

वरिष्ठ अधिवक्ता ने जवाब दिया कि इससे लोक व्यवस्था प्रभावित होती है। उन्होंने कहा कि ऐसे आरोपी को जमानत दिए जाने से पुलिसकर्मियों का मनोबल गिरेगा।

न्यायमूर्ति बागची ने कहा, ‘‘अगर आपको पुलिसकर्मियों का मनोबल गिरने की चिंता है तो आपको दो वर्ष के भीतर आरोपी को दोषी साबित कर देना चाहिए था। आप अपने मूल दायित्व का निर्वहन करने में बुरी तरह विफल रहे हैं। जमानत रद्द कराने के नाम पर विशेष अनुमति याचिका दाखिल करके आपको अपनी इस विफलता पर पर्दा नहीं डालना चाहिए।’’

न्यायाधीश ने कहा कि लोक व्यवस्था और गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम के तहत आने वाले अपराध अलग-अलग विषय हैं तथा मामले में इस कड़े कानून के प्रावधान लागू किए जाने को चुनौती दी जा सकती है।

न्यायमूर्ति बागची ने कहा, ‘‘किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता अदालत के आदेश में हुई त्रुटि पर निर्भर नहीं करती। यह अभियोजन पक्ष के मामले पर निर्भर करती है।’’

भाषा सिम्मी पवनेश

पवनेश