न्यायालय ने अमोघसिद्ध मंदिर में पुजारी के अधिकारों से जुड़े अति प्राचीन विवाद का निपटारा किया
न्यायालय ने अमोघसिद्ध मंदिर में पुजारी के अधिकारों से जुड़े अति प्राचीन विवाद का निपटारा किया
नयी दिल्ली, 25 फरवरी (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने बुधवार को कर्नाटक के एक मंदिर के वंशानुगत पुजारियों के अधिकारों को लेकर सौ साल पुराने विवाद का निपटारा कर दिया। इस विवाद में देवता अमोघसिद्ध की पूजा करने और भक्तों के चढ़ावा को ग्रहण करने का अधिकार भी शामिल था।
न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन की पीठ ने कर्नाटक उच्च न्यायालय के अक्टूबर 2012 के फैसले को बरकरार रखते हुए अपीलकर्ताओं के दावे को खारिज कर दिया।
पीठ ने कहा कि अपीलकर्ताओं का दावा लगभग पूरी तरह से 1901 के एक आदेश पर आधारित था, जिसका प्रभाव उनके पूर्ववर्ती द्वारा 1944 में कब्जे के लिए मुकदमा दायर करके स्पष्ट रूप से समाप्त कर दिया गया था।
पीठ ने कहा कि स्थायी कब्जे वाला पक्ष कब्जे के लिए मुकदमा नहीं करता है और यह मुकदमा इस बात की स्पष्ट स्वीकृति है कि संबंधित समय पर कब्जा उनके पास नहीं था।
पीठ ने कहा, ‘‘हमारे समक्ष वर्तमान विवाद एक सदी से अधिक समय से चला आ रहा है, जिसमें प्रतिवादी/वादी और अपीलकर्ता/प्रतिवादी वांशानुगत पुजारी के अधिकारों और अमोघसिद्ध देवता की पूजा करने के अधिकार को लेकर अपने-अपने दावे कर रहे हैं। अमोघसिद्ध एक संत थे, जिनका निधन 600 वर्ष पहले हुआ था और उनकी समाधि कर्नाटक के अरकेरी जिले के जलगेरी में ममट्टी गुड्डा में स्थित मंदिर में श्रद्धापूर्वक स्थापित की गई थी।’’
न्यायालय ने कहा कि विवाद का मूल बिंदु यह था कि झगड़ने वाले परिवारों में से कौन वंशानुगत ‘वाहिवतदार’ पुजारी है, जिसे मंदिर में धार्मिक अनुष्ठान करने, भक्तों के चढ़ावे को ग्रहण करने और वार्षिक जात्रा समारोह आयोजित करने का अधिकार है।
पीठ ने कहा कि विवाद की जड़ें 1944 में हैं, जब अपीलकर्ताओं के पूर्वजों ने अन्य लोगों के साथ मिलकर मंदिर और अन्य संपत्तियों पर कब्जे के लिए मुकदमा दायर किया था।
उन्होंने आरोप लगाया था कि दूसरे पक्ष ने मंदिर की संपत्ति पर जबरदस्ती कब्जा कर लिया था और पूजा करने के अपने अधिकार का दावा किया था।
मामले के इतिहास को देखते हुए, पीठ ने कहा कि उच्च न्यायालय और प्रथम अपीलीय न्यायालय दोनों ने मंदिर पर पुजारी के अधिकारों के पहलू पर एकमत से फैसला दिया था और प्रतिवादियों के पक्ष में फैसला सुनाया था।
पीठ ने यह भी कहा कि अपीलकर्ताओं ने तर्क दिया था कि मंदिर के पुजारी के अधिकार उनके पास हैं, क्योंकि 1901 के एक मुकदमे में फैसला उनके पूर्वज के पक्ष में सुनाया गया था।
पीठ ने कहा कि प्रथम अपीलीय न्यायालय और उच्च न्यायालय दोनों ने इस मुद्दे पर विचार करते हुए यह माना था कि यद्यपि अपीलकर्ताओं का दावा है कि उनके पक्ष में एक आदेश या फैसला है, लेकिन वे इस तथ्य पर स्पष्ट रूप से मौन हैं कि उन्होंने 1944 के मुकदमे में कब्जे और पुजारी के अधिकारों की मांग करते हुए एक मुकदमा दायर किया था।
उच्च न्यायालय के फैसले में कोई विसंगति न पाते हुए पीठ ने अपील खारिज कर दीं।
भाषा संतोष सुरेश
सुरेश

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