तिरुवनंतपुरम, तीन सितंबर (भाषा) मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) के महासचिव एम. ए. बेबी ने महिलाओं की सार्वजनिक स्थानों पर मौजूदगी पर पाबंदियों की वकालत करने वाले इस्लामी विद्वान कंथापुरम ए. पी. अबूबकर मुसलियार के बयान की बृहस्पतिवार को आलोचना की और कहा कि ज्यादातर धर्मों में लैंगिक समानता को स्वीकार करने में अब भी झिझक दिखाई देती है।
बेबी ने आरोप लगाया कि कंथापुरम के बयान राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) द्वारा व्यक्त किए गए विचारों के समान हैं।
कंथापुरम ने रविवार को कोच्चि में आयोजित एक इस्लामी कार्यक्रम में हिस्सा लेते हुए कहा था कि महिलाओं को सार्वजनिक मंचों पर लाने से ‘‘भारी तबाही’’ होगी और इस्लाम में इससे बचने के लिए महिलाओं के लिए पर्दा करने का नियम है।
उनकी टिप्पणी की व्यापक आलोचना हुई। मुख्यमंत्री वी. डी. सतीशन ने भी कहा था कि वह इस तरह के विचारों से सहमत नहीं हैं।
पत्रकारों द्वारा कंथापुरम की टिप्पणी के बारे में पूछे जाने पर बेबी ने कहा कि दुर्भाग्य से ज्यादातर धर्म विभिन्न मौकों पर लैंगिक समानता को स्वीकार करने में अनिच्छा दिखाते हैं।
उन्होंने कहा, ‘‘इस सोच का प्रतिबिंब अब कंथापुरम के बयान के रूप में सामने आया है।’’
महिलाओं के सार्वजनिक स्थानों पर प्रवेश को नियंत्रित किए जाने संबंधी विचारों का जिक्र करते हुए बेबी ने आरोप लगाया कि ‘‘न स्त्री स्वातंत्र्यमर्हति’’ (महिलाएं स्वतंत्रता की अधिकारी नहीं हैं) जैसी धारणा उन समूहों के दृष्टिकोण को दर्शाती है, जिनमें आरएसएस भी शामिल है। उन्होंने कहा कि ये समूह हिंदू धर्म की अपनी व्याख्या को आगे बढ़ाते हुए इस तरह के विचार रखते हैं।
बेबी ने आरोप लगाया, ‘‘जब देशभर में महिलाओं पर हमले और यौन उत्पीड़न के मुद्दों को जोरदार तरीके से उठाया गया था, तब आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने क्या कहा था? उन्होंने कहा था कि महिलाओं को अपने घरों तक सीमित रहना चाहिए और तर्क दिया था कि उनके साथ हिंसा इसलिए होती है क्योंकि वे घर से बाहर निकलती हैं।’’
उन्होंने कहा, ‘‘लगभग इसी तरह कंथापुरम ने भी यह विचार रखा है कि महिलाओं के सार्वजनिक जीवन में आने-जाने और सार्वजनिक स्थानों पर उनकी मौजूदगी पर प्रतिबंध लगाया जाना चाहिए।’’
बेबी ने कहा, ‘‘ऐसे मामलों में हमें संवैधानिक मूल्यों का दृढ़ता से पालन करना चाहिए।’’
भाषा गोला देवेंद्र
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