विधवा पर आपराधिक कार्यवाही बेटे की अनुकंपा के आधार पर नियुक्ति को नहीं रोक सकती: न्यायालय

विधवा पर आपराधिक कार्यवाही बेटे की अनुकंपा के आधार पर नियुक्ति को नहीं रोक सकती: न्यायालय

विधवा पर आपराधिक कार्यवाही बेटे की अनुकंपा के आधार पर नियुक्ति को नहीं रोक सकती: न्यायालय
Modified Date: June 11, 2026 / 08:40 pm IST
Published Date: June 11, 2026 8:40 pm IST

नयी दिल्ली, 11 जून (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने बृहस्पतिवार को हरियाणा सरकार के नियमों का हवाला देते हुए कहा कि किसी मृत कर्मचारी की पत्नी के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही का इस्तेमाल उसके बेटे की अनुकंपा के आधार पर नियुक्ति के दावे को खारिज करने के लिए नहीं किया जा सकता।

न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति एन कोटिश्वर सिंह की पीठ ने अतुल चौहान की अपील मंजूर कर ली।

चौहान की ‘अनुकंपा के आधार पर नियुक्ति’ के अनुरोध को उस वक्त टाल दिया गया था, जब उनकी मां पर हरियाणा में सरकारी स्कूल शिक्षक रहे उनके पिता की हत्या की साजिश में संलिप्त होने का आरोप लगाया गया था।

शीर्ष अदालत ने एक आदेश में कहा, ‘‘प्रतिवादियों के लिए, अपीलकर्ता के अनुकंपा के आधार पर नियुक्ति के दावे पर 2019 के नियमों के तहत तय पात्रता शर्तों और आवश्यकताओं के अनुसार, उसके गुण-दोष के आधार पर विचार करने और निर्णय लेने में कोई कानूनी अड़चन नहीं है।’’

आदेश में कहा गया है कि हरियाणा का वह नियम, जिसके तहत ऐसी कार्यवाही के दौरान लाभ रोक दिये जाते हैं, सिर्फ आर्थिक मदद पर लागू होता है, नियुक्तियों पर नहीं।

शीर्ष अदालत ने पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय के उस फैसले को रद्द कर दिया, जिसमें अपीलकर्ता के मामले में हरियाणा सिविल सेवा (अनुकंपा के आधार पर वित्तीय सहायता या नियुक्ति) नियम, 2019 के नियम 23(1) को लागू करने को सही ठहराया गया था।

साथ ही, उच्चतम न्यायालय ने राज्य के अधिकारियों को निर्देश दिया कि वे तीन महीने के भीतर अपीलकर्ता के दावे पर गुण-दोष के आधार पर विचार करें।

अतुल के पिता गजेंद्र सिंह चौहान, जो एक जूनियर बेसिक टीचर (जेबीटी) थे, की सितंबर 2021 में सड़क हादसे में मौत हो गई थी। बाद में, गजेंद्र की पत्नी पुष्पा देवी पर उनकी हत्या की साजिश रचने का आरोप लगाया गया। हालांकि, अक्टूबर 2024 में निचली अदालत ने संदेह का लाभ देते हुए उन्हें बरी कर दिया, लेकिन उन्हें बरी किये जाने के फैसले के खिलाफ अपील अभी भी लंबित है।

अधिकारियों ने नियम 23(1) का हवाला देते हुए अतुल की ‘अनुकंपा के आधार पर नियुक्ति’ के अनुरोध पर कार्रवाई करने से इनकार कर दिया था। इस नियम के तहत, अगर परिवार के किसी सदस्य पर मृतक कर्मचारी की हत्या या हत्या के लिए उकसाने का आरोप हो, तो अनुकंपा के आधार पर वित्तीय सहायता रोक दी जाती है।

इस प्रावधान की व्याख्या करते हुए, उच्चतम न्यायालय ने कहा कि इसकी भाषा केवल ‘‘अनुकंपा के आधार पर वित्तीय सहायता’’ तक ही सीमित है और इसे अनुकंपा के आधार पर नौकरी देने तक नहीं बढ़ाया जा सकता था।

पीठ ने कहा, ‘‘नियम 23(1) की भाषा बिल्कुल साफ है और इसका सिर्फ एक ही मतलब निकाला जा सकता है। इस प्रावधान में ‘अनुकंपा के आधार पर वित्तीय सहायता’ शब्द का इस्तेमाल किया गया है और हर जगह सिर्फ इसी शब्द का प्रयोग हुआ है।’’

उच्चतम न्यायालय ने नियम 23(1) की संवैधानिक वैधता को बरकरार रखा। शीर्ष अदालत ने कहा कि यह प्रावधान रोकथाम और नियमन से जुड़ा है और इसका मकसद यह सुनिश्चित करना है कि जो व्यक्ति कर्मचारी की मौत के लिए संभवत: जिम्मेदार हो, उसे तुरंत अनुकंपा के आधार पर मिलने वाला वित्तीय लाभ न मिले।

न्यायालय ने सुझाव दिया कि हरियाणा सरकार कानून में कमी को दूर करने के लिए नियमों में बदलाव करने पर विचार करे।

पीठ ने यह स्पष्ट किया कि अनुकंपा के आधार पर नियुक्ति कोई कानूनी अधिकार नहीं है, लेकिन अपीलकर्ता के दावे पर कोई भी फैसला लेने से पहले अधिकारियों को नियमों के तहत उसकी पात्रता और अन्य जरूरतों पर विचार-विमर्श करना होगा।

भाषा

सुभाष माधव

माधव


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