बेटियों को अब बोझ नहीं, बल्कि अनमोल उपहार के रूप में देखा जाता है : सुनील जागलान

बेटियों को अब बोझ नहीं, बल्कि अनमोल उपहार के रूप में देखा जाता है : सुनील जागलान

बेटियों को अब बोझ नहीं, बल्कि अनमोल उपहार के रूप में देखा जाता है : सुनील जागलान
Modified Date: May 7, 2026 / 06:48 pm IST
Published Date: May 7, 2026 6:48 pm IST

चंडीगढ़, सात मई (भाषा) देश में एक समय ऐसा था जब लड़कियों के पैदा होने पर माता-पिता के चेहरे पर निराशा छा जाती थी, उन्हें लगता था कि उनके सारे सपने टूट गए हों, लेकिन अब लोगों के विचार ऐसे नहीं हैं और इसकी पुष्टि गैर सरकारी संगठन ‘सेल्फी विद डॉटर फाउंडेशन’ के तीन वर्षीय राष्ट्रव्यापी सर्वेक्षण हुई है।

‘सेल्फी विद डॉटर’ अभियान शुरू करने वाले सुनील जागलान के अनुसार देश के कई हिस्सों विशेषकर हरियाणा में कई परिवार लड़की के जन्म पर खुलकर शोक मनाते थे ।

जागलान ने बृहस्पतिवार को कहा, ‘‘पूरे देश में सकारात्मकता की एक परिवर्तनकारी लहर चल रही है, जहां बेटियों को अब बोझ नहीं, बल्कि अनमोल उपहार के रूप में देखा जाता है।’’

उन्होंने कहा,‘‘माता-पिता भतेरी, संतोष, अंतिम जैसे अफसोसजनक नामों को अलविदा कह रहे हैं और (बेटियों के लिए) पौराणिक कथाओं, आधुनिकता एवं आशा से प्रेरित सुंदर एवं सशक्त नामों को अपना रहे हैं।’’

जागलान के एनजीओ ‘सेल्फी विद डॉटर फाउंडेशन’ के सर्वेक्षण के अनुसार कभी लिंगानुपात में गिरावट और बेटों की गहरी चाहत के लिए कुख्यात हरियाणा में अब एक खामोश क्रांति चल रही है।

जागलान ने सर्वेक्षण का हवाला देते हुए कहा कि पहले ‘अंतिम’, ‘भतेरी’, और ‘संतोष’ (जो ‘दिया’ गया है उससे संतुष्ट) जैसे नाम प्रचलन में थे लेकिन वे अब सुनने को नहीं मिलते।

उन्होंने कहा,‘‘जो परिवार कभी बेटी के जन्म पर शोक मनाते थे, वे अब उनके जन्म पर दीये जलाते हैं, गर्व के साथ उसकी उपलब्धियों और सपनों को साझा करते हैं। यह एक सामूहिक प्रायश्चित है, उन पीढ़ियों की लड़कियों से समाज की माफी है जो इससे बेहतर की हकदार थीं।’

उन्होंने कहा कि सर्वेक्षण देश भर में इसी तरह के उत्साहजनक रुझानों को उजागर करता है, जो एक व्यापक सांस्कृतिक पुनर्जागरण को दर्शाता है।

उनका कहना है कि सर्वेक्षण में देशभर में इसी तरह के उत्साहवर्धक रुझान सामने आए हैं, जो एक व्यापक सांस्कृतिक पुनर्जागरण को दर्शाते हैं।

उन्होंने कहा कि इसी प्रकार, उत्तर प्रदेश में ‘‘बाची’’ और ‘‘खतम’’ (अंतिम या पर्याप्त) शब्दों का प्रचलन तेजी से कम हो रहा है।

उन्होंने कहा कि मध्यप्रदेश में ‘‘पुरा’’, और ‘‘समाप्ति’’(जिनका अर्थ पूर्णता है), तेजी से लुप्त हो रहे हैं।

भाषा

प्रचेता राजकुमार

राजकुमार


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