‘डीबीएस रेफरल’ में देरी से पार्किंसंस उपचार के नतीजे सीमित हो जाते हैं: चिकित्सक

‘डीबीएस रेफरल’ में देरी से पार्किंसंस उपचार के नतीजे सीमित हो जाते हैं: चिकित्सक

‘डीबीएस रेफरल’ में देरी से पार्किंसंस उपचार के नतीजे सीमित हो जाते हैं: चिकित्सक
Modified Date: April 11, 2026 / 04:51 pm IST
Published Date: April 11, 2026 4:51 pm IST

नयी दिल्ली, 11 अप्रैल (भाषा) अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) के विशेषज्ञों ने कहा है कि स्पष्ट नैदानिक ​​दिशा-निर्देशों के बावजूद, भारत में पार्किंसंस रोग के कई रोगियों को ‘डीप ब्रेन स्टिमुलेशन’ (डीबीएस) के लिए बहुत देर से रेफर किया जाता है, जिससे इस प्रक्रिया के संभावित लाभ सीमित हो जाते हैं।

डीबीएस पार्किंसंस की बीमारी के इलाज के लिए एक सुस्थापित शल्य चिकित्सा पद्धति है। इसकी सिफारिश सावधानीपूर्वक चयनित उन रोगियों के लिए की जाती है जो लेवोडोपा, जो इस बीमारी के प्रबंधन के लिए सबसे प्रभावी दवा है, के प्रति खराब प्रतिक्रिया देते हैं। अनुकूलित चिकित्सा उपचार के बावजूद उतार-चढ़ाव और ‘डिस्किनेसिया’ जैसी अक्षम करने वाली मोटर जटिलताएं विकसित होती हैं और साथ ही अप्रत्याशित ‘ऑन-ऑफ’ अवधि संबंधी विकार पैदा होते हैं।

विशेषज्ञों के मुताबिक ‘ऑन’ अवधि वह समय है जब दवा से पार्किंसंस के लक्षण अच्छी तरह से नियंत्रित होते हैं, जबकि ‘ऑफ’ अवधि वह समय है जब दवा का असर खत्म हो जाता है और लक्षण (जैसे अकड़न, कंपन और सुस्ती) फिर से प्रकट हो जाते हैं।

दिल्ली स्थित एम्स में न्यूरोसर्जरी और गामा नाइफ विभाग के अध्यक्ष डॉ. पी. शरत चंद्र ने विश्व पार्किंसंस दिवस पर बताया कि डीबीएस से दवा की खुराक कम हो जाती है और डिस्किनेसिया (दवा के कारण शरीर में होने वाली असामान्य हरकतें), मतिभ्रम, मतली और निम्न रक्तचाप जैसी जटिलताओं से बचाव होता है। इससे कई दवाओं की खुराक कम करने में भी मदद मिलती है।

उन्होंने कहा लेकिन वास्तविकता यह है कि रेफरल करने की परिपाटी असंगत बनी हुई है।

डॉ. चंद्र ने कहा, ‘‘भारत में कई मरीजों को बीमारी के लक्षण विकसित होने के बाद रेफर किया जाता है, खासतौर पर जब चलने में अकड़न और शारीरिक अस्थिरता जैसे अक्षीय लक्षण पहले ही प्रकट हो चुके होते हैं, जो कि डीबीएस के प्रति खराब प्रतिक्रिया देने वाले लक्षण माने जाते हैं।’’

उन्होंने कहा कि इस देरी का एक प्रमुख कारण डीबीएस को ‘अंतिम उपाय’ चिकित्सा के रूप में व्यापक रूप से देखा जाना है, न कि एक ऐसे हस्तक्षेप के रूप में जिसे मोटर संबंधी जटिलताएं शुरू होने के दौरान लेकिन अपरिवर्तनीय दिव्यांगता होने से पहले शुरू करना सबसे अच्छा होता है।

डॉ. चंद्रा ने कहा कि उम्रदराज लोगों की बढ़ती संख्या के कारण पार्किंसंस रोग का बोझ तेजी से बढ़ रहा है।

उन्होंने कहा, ‘‘आने वाले दशकों में भारत में इसके प्रसार में काफी वृद्धि होने की आशंका है, जिससे डीबीएस जैसी उन्नत चिकित्सा पद्धतियों के लिए पात्र रोगियों की संख्या में वृद्धि होगी।’’

चिकित्सकों ने बताया कि जैसे-जैसे जीवन प्रत्याशा में सुधार हो रहा है, अधिक से अधिक मरीज इतने लंबे समय तक जीवित रह रहे हैं कि उनमें मोटर संबंधी जटिलताएं विकसित हो रही हैं, जो समय पर पहचान और रेफरल की आवश्यकता को रेखांकित करता है।

पिछले एक दशक में, एम्स दिल्ली जैसे प्रमुख संस्थानों सहित तृतीयक देखभाल केंद्रों में डीबीएस की सुविधा का काफी विस्तार हुआ है।

न्यूरोसर्जरी के अतिरिक्त प्रोफेसर डॉ. सतीश वर्मा ने कहा कि ‘इमेजिंग, इंट्राऑपरेटिव मॉनिटरिंग और डिवाइस’ प्रौद्योगिकियों तथा लंबे समय तक चलने वाली ‘रिचार्जेबल’ बैटरी में हुई प्रगति ने सर्जिकल सटीकता और दीर्घकालिक परिणामों में सुधार किया है।

चिकित्सकों ने बताया कि इसके बावजूद पात्र रोगियों की संख्या की तुलना में इसका उपयोग काफी कम बना हुआ है।

न्यूरोसर्जरी विभाग के डॉ. रमेश डूडामणि ने कहा, ‘‘बाधाओं में उच्च लागत, विशेष केंद्रों का असमान भौगोलिक वितरण और रेफर करने वाले चिकित्सकों एवं डीबीएस कार्यक्रमों के बीच सीमित समन्वय शामिल है।’’

उन्होंने कहा कि एक अन्य बड़ी चुनौती मरीजों, देखभाल करने वालों और सामान्य चिकित्सकों के बीच जागरूकता की कमी है।

दिल्ली स्थित एम्स में न्यूरोलॉजी विभाग की प्रमुख डॉ. मंजरी त्रिपाठी ने बताया कि कई मरीज सर्जरी को लेकर आशंकित रहते हैं, जबकि गैर-विशेषज्ञ डॉक्टर मोटर संबंधी उतार-चढ़ाव के शुरुआती संकेतों को पहचान नहीं पाते या शल्य चिकित्सा पर विचार किए बिना इष्टतम सीमा से अधिक दवा की खुराक बढ़ाते रहते हैं।

उन्होंने कहा, ‘‘इससे अक्सर लंबे समय तक उच्च खुराक वाली दवा का सेवन करना पड़ता है, जिससे डिस्किनेसिया और मनोरोग संबंधी जटिलताओं का खतरा बढ़ जाता है।’’

विशेषज्ञों ने व्यवस्थित रेफरल प्रक्रिया और आम जनता तथा स्वास्थ्य सेवा प्रदाताओं दोनों को लक्षित करने वाले व्यापक जागरूकता अभियानों की आवश्यकता को रेखांकित किया।

डॉ. त्रिपाठी ने कहा, ‘‘शुरुआती दौर में दवा का असर कम होना, डिस्किनेसिया और दवा से दुष्प्रभाव जैसे रेफर के कारणों की पहचान करने से परिणामों में काफी सुधार आ सकता है।’’

चिकित्सकों ने रेखांकित किया कि उपयुक्त रूप से चयनित रोगियों के डीबीएस पद्धति से इलाज से उनके जीवन की गुणवत्ता और कार्यात्मक स्वतंत्रता में काफी सुधार हो सकता है।

चिकित्सकों ने चेतावनी दी कि भारत में 30 और 40 वर्ष की आयु के लोगों में तेजी से देखी जा रही पार्किंसंस रोग की शुरुआती अवस्था एक गंभीर लेकिन अक्सर अनदेखी की जाने वाली स्वास्थ्य समस्या के रूप में उभर रही है जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

दिल्ली एम्स में न्यूरोलॉजी के प्रोफेसर डॉ. एलवारासी ने कहा, ‘‘हालांकि पार्किंसंस रोग को परंपरागत रूप से वृद्धावस्था से जोड़ा जाता रहा है, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि कम उम्र के लोगों में भी यह रोग बढ़ रहा है, जिससे दीर्घकालिक दिव्यांगता और जीवन की गुणवत्ता के बारे में चिंता बढ़ रही है।’’

डॉ. एलवारासी ने कहा, ‘‘शुरुआती अवस्था में यह बीमारी होने में आनुवंशिकी एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है, इसलिए समय पर पहचान करना महत्वपूर्ण है।’’

उन्होंने अधिक जागरूकता और प्रारंभिक हस्तक्षेप रणनीतियों की आवश्यकता पर जोर दिया।

भाषा धीरज नेत्रपाल

नेत्रपाल


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