विकासशील देश जलवायु परिवर्तन लक्ष्यों को पाने के लिए स्थानीय संसाधनों पर जोर दें: संरा अधिकारी

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विकासशील देश जलवायु परिवर्तन लक्ष्यों को पाने के लिए स्थानीय संसाधनों पर जोर दें: संरा अधिकारी

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  • Publish Date - September 1, 2026 / 04:24 PM IST,
    Updated On - September 1, 2026 / 04:24 PM IST

नयी दिल्ली, एक सितंबर (भाषा) संयुक्त राष्ट्र के एक शीर्ष पदाधिकारी ने कहा है कि विकासशील देशों को नवीकरणीय ऊर्जा और अन्य जलवायु निवेशों के लिए वित्तपोषण की बढ़ती कमी का सामना करना पड़ रहा है, जिसे केवल बाहरी वित्तपोषण से पूरा नहीं किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि जलवायु लक्ष्यों को पूरा करने के लिए घरेलू संसाधनों पर अधिक जोर देने की जरूरत है।

एशिया और प्रशांत क्षेत्र के लिए संयुक्त राष्ट्र की आर्थिक और सामाजिक आयोग (यूएन ईएससीएपी) में आर्थिक मामलों के अधिकारी माइकल एम पोडोल्स्की ने कहा कि विकासशील देशों को अपने जलवायु कार्रवाई लक्ष्यों को पूरा करने के लिए हर साल 365 अरब अमेरिकी डॉलर तक की जरूरत है। इस राशि का एक बड़ा हिस्सा ऊर्जा क्षेत्र में बदलाव से जुड़ा है, जबकि अभी बाहरी वित्तपोषण से इस जरूरत की 10 प्रतिशत से भी कम राशि मिल पाती है।

पोडोल्स्की ने ‘पीटीआई-भाषा’के सवालों के दिए लिखित जवाब में कहा, ‘‘अधिक जोखिम की धारणा, घरेलू पूंजी बाजार का सीमित दायरा, जीवाश्म ईंधन पर सब्सिडी और रियायत पर मिलने वाले धन का सीमित प्रवाह ऐसे कारण है जो नवीनीकरण ऊर्जा, ग्रिड के विस्तार, आधुनिकीकरण और ऊर्जां संग्रह परियोजनाओं के लिए पूंजी की लागत को और बढ़ा देती हैं।’’

उन्होंने कहा कि आवश्यक निवेश के पैमाने और उपलब्ध वित्तपोषण के बीच के अंतर से इंगित होता है कि केवल वाणिज्यिक वित्तपोषण से लक्ष्यों को पूरा करने की संभावना कम है।

पोडोल्स्की ने वित्तपोषण की कमी को पूरा करने के लिए बहु स्तरीय और राष्ट्रीय विकास बैंकों से संयुक्त रूप से और रियायती दर पर वित्त मुहैया कराने के साथ-साथ हरित बॉण्ड और मज़बूत सतत पूंजी बाजार के अधिक इस्तेमाल की वकालत की।

संयुक्त राष्ट्र पदाधिकारी की ये टिप्पणियां ऐसे समय में आई हैं जब विकासशील अर्थव्यवस्थाओं पर स्वच्छ ऊर्जा में निवेश बढ़ाने का दबाव बढ़ रहा है, जबकि उन्हें कर्ज लेने की ऊंची लागत और सीमित वित्तीय गुंजाइश जैसी चुनौतियों का भी सामना करना पड़ रहा है।

भारत सरकार द्वारा जारी 2025-26 के आर्थिक सर्वेक्षण रिपोर्ट के मुताबिक जलवायु परिवर्तन के असर को कम करने के लिए लगभग 83 प्रतिशत और इसके अनुकूल ढलने के लिए 98 प्रतिशत कोष देश के भीतर से ही जुटाया जाता है, जबकि कुल जलवायु कोष विकासशील देशों की जरूरतों से काफी कम बना हुआ है।

आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 के अनुसार, दिसंबर 2025 के आखिर तक भारत की कुल बिजली उत्पादन क्षमता में गैर-जीवाश्म स्रोतों की हिस्सेदारी 51.93 प्रतिशत थी, जो देश के 50 प्रतिशत के लक्ष्य से अधिक है।

पोडोल्स्की ने कहा कि वित्तपोषण में सुधार के साथ-साथ नीति में भी बदलाव करने होंगे, जिसमें सरकार के बजट में गुंजाइश बनाने के लिए जीवाश्म ईंधन सब्सिडी को धीरे-धीरे खत्म करना शामिल है।

उन्होंने वित्त और ऊर्जा मंत्रालयों के बीच बेहतर समन्वय और घरेलू संसाधन जुटाने की क्षमता को मजबूत करने का भी आह्वान किया।

पोडोल्स्की से जब पूछा गया कि क्या बैटरी एनर्जी स्टोरेज सिस्टम (बीईएसएस) का विनिर्माण वास्तव में स्थानीय स्तर पर किया जा सकता है, तो उन्होंने कहा कि हरित मूल्य श्रृंखला का आंशिक स्थानीयकरण ‘संभव और बहुत जरूरी, दोनों है।

यूएन-ईएससीएपी के पदाधिकारी ने कहा, ‘‘हालांकि, हरित बदलाव के लिए जरूरी किसी भी उपकरण (जैसे बीईएसएस) के निर्माण में बड़ी रुकावटें आती हैं। इनमें आम तौर पर मानव पूंजी और आपूर्ति श्रृंखला को तैयार करने या उन्हें नयी दिशा देने में लगने वाला लंबा समय और हरित प्रौद्योगिकी के मामले में जरूरी खनिजों की भरोसेमंद आपूर्ति सुनिश्चित करना शामिल है।’’

उन्होंने कहा, ‘‘अच्छी बात यह है कि इस क्षेत्र में संसाधनों का मजबूत आधार है जिसमें दुनिया के लिथियम, निकेल, ग्रेफ़ाइट और दुलर्भ खनिज भंडार का बड़ा हिस्सा शामिल है। यह मजबूत क्षेत्रीय और वैश्विक मांग के सहारे हरित मूल्य श्रृंखला को बढ़ाने और उनमें विविधता लाने के बड़े अवसर पैदा करता है।’’

पोडोल्स्की ने कहा कि संसाधनों का दोहन करने और उनका प्रसंस्करण से पर्यावरण और समुदाय पर पड़ने वाले असर के कारण मंजूरी की लंबी और जटिल प्रक्रियाओं, सीमित वित्तपोषण और मानव पूंजी को विकसित करने की जरूरत जैसी चुनौतियों की वजह से प्रगति धीमी हो जाती है।

उन्होंने कहा, ‘‘स्थानीय उत्पादन को बढ़ावा देने वाली राष्ट्रीय नीतियों को लागत, दक्षता और उत्पाद की प्रतिस्पर्धात्मकता का पूरा ध्यान रखते हुए, बाजार की ताकतों के मुकाबले अपनी दीर्घकालिक स्थिति पर सावधानीपूर्वक विचार करना चाहिए।’’

पोडोल्स्की के अनुसार, लंबी अवधि की रणनीतियों का उद्देश्य ऐसे क्षेत्रों को विकसित करना होना चाहिए जो आखिरकार बिना सरकारी सब्सिडी या लगातार सरकारी मदद के खुद खड़े हो सकें। उन्होंने यह भी कहा कि संपूर्ण मूल्य श्रृंखला को पूरी तरह से स्थानीय स्तर पर लाने में लागत से जुड़ी चुनौतियां हैं और खनिजों व उन्नत रासायनिक प्रौद्योगिकी को प्राप्त करने में कई साल लग सकते हैं।

भाषा धीरज पवनेश

पवनेश