लखनऊ, एक सितंबर (भाषा) इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ ने मोदी रबर लिमिटेड को पट्टे पर दी गई 117 एकड़ जमीन में से 59.11 एकड़ के कथित अवैध हस्तांतरण से संबंधित जांच रिपोर्ट पर निर्णय नहीं लेने के लिए मंगलवार को राज्य सरकार के रवैये पर गंभीर नाराजगी जताई।
न्यायमूर्ति राजन राय और न्यायमूर्ति मंजीव शुक्ला की पीठ ने संबंधित विभाग के अपर मुख्य सचिव (एसीएस) को दो सितंबर को व्यक्तिगत रूप से अदालत में पेश होकर यह स्पष्ट करने का निर्देश दिया कि अदालत के पूर्व निर्देश के बावजूद जांच रिपोर्ट पर अब तक कोई निर्णय क्यों नहीं लिया गया।
पीठ ने यह आदेश लोकेश कुमार खुराना की ओर से दायर जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान दिया।
याचिका में आरोप लगाया गया कि वर्ष 1972 में सरकारी अनुदान के तहत दिल्ली की मोदी रबर लिमिटेड को करीब 117 एकड़ जमीन पट्टे पर दी गई थी।
याचिका में आरोप लगाया गया कि अनुदान की शर्तों का उल्लंघन करते हुए इसमें से 59.11 एकड़ जमीन राज्य सरकार की अनुमति के बिना मेरठ की मोदी टायर कंपनी प्राइवेट लिमिटेड और फरीदाबाद की कॉन्टिनेंटल इंडिया प्राइवेट लिमिटेड को हस्तांतरित कर दी गई।
इससे पहले की सुनवाई में मोदी रबर लिमिटेड ने जमीन बेचने के आरोप से इनकार किया था।
कंपनी की ओर से कहा गया था कि जमीन का हस्तांतरण मोदी रबर लिमिटेड के पुनरुद्धार और पुनर्वास के लिए औद्योगिक एवं वित्तीय पुनर्निर्माण बोर्ड (बीआईएफआर) के समक्ष हुए समझौते के तहत दोनों कंपनियों को किया गया था।
कंपनी ने यह भी कहा था कि शेष जमीन का इस्तेमाल अब भी उसी औद्योगिक उद्देश्य के लिए किया जा रहा है, जिसके लिए उसे मूल रूप से पट्टे पर दिया गया था। राज्य सरकार ने आठ अक्टूबर 2025 को अदालत को बताया था कि मेरठ के जिलाधिकारी के चार सितंबर 2024 के आदेश पर गठित जांच समिति ने मामले की जांच की और पाया कि जमीन का हस्तांतरण राज्य सरकार की सहमति के बिना किया गया और यह अवैध था।
इसके बाद अदालत ने राज्य सरकार को समिति की रिपोर्ट पर लिए गए निर्णय की जानकारी देने और पूरक जवाबी हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया था। मंगलवार को सुनवाई के दौरान राज्य सरकार ने निर्णय से अवगत कराने के लिए तीन सप्ताह का अतिरिक्त समय मांगा।
पीठ ने देरी पर नाराजगी जताते हुए संबंधित अपर मुख्य सचिव को व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होकर यह बताने का निर्देश दिया कि अब तक कोई निर्णय क्यों नहीं लिया गया और आठ अक्टूबर 2025 के आदेश के बावजूद पूरक जवाबी हलफनामा क्यों दाखिल नहीं किया गया।
भाषा सं आनन्द जितेंद्र
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