प्रयागराज (उप्र), दो अप्रैल (भाषा) इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने कहा है कि मोहम्मदिया कानून के तहत पति जिस तिथि को तलाक देता है, उसी तिथि से तलाक प्रभावी हो जाता है और बाद में अदालत द्वारा तलाक की पुष्टि, महज घोषणात्मक प्रकृति की होती है।
न्यायमूर्ति मदन पाल सिंह ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि अदालत का इस तरह का आदेश, निर्णय की तिथि से तलाक को प्रभावी नहीं बनाता, बल्कि इसका संबंध तलाक देने की मूल तिथि से होता है।
अदालत ने उक्त टिप्पणी हुमैरा रियाज नामक एक महिला की याचिका पर सुनवाई करते हुए की। महिला ने प्रयागराज की परिवारिक अदालत के आदेश को चुनौती दी थी । पारिवारिक अदालत ने सीआरपीसी की धारा 125 के तहत दाखिल महिला का आवेदन खारिज कर दिया था। महिला ने अपने पति से गुजारा भत्ता की मांग करते हुए यह आवेदन दाखिल किया था।
उच्च न्यायालय ने 10 मार्च को अपने निर्णय में महिला की याचिका स्वीकार कर ली और परिवारिक अदालत के गुजारा भत्ता देने से मना करने के आदेश को खारिज कर दिया। अब इस मामले पर नए सिरे से निर्णय करने के लिए इसे वापस परिवारिक अदालत के पास भेज दिया गया है।
महिला ने याचिका दायर करते हुए दलील दी थी कि उसके पहले पति ने 27 फरवरी, 2005 को तलाक दिया था और इस संबंध में घोषणा के लिए वाद दायर किया गया । दीवानी अदालत ने आठ जनवरी, 2013 को आदेश जारी कर 2005 में दिए गए तलाक को वैध घोषित किया ।
याचिकाकर्ता के वकील ने कहा कि घोषणात्मक आदेश लंबित रहने के दौरान, लेकिन इद्दत की मियाद पूरी होने के बाद महिला ने मई, 2012 में दूसरी शादी कर ली।
वकील ने कहा कि महिला के दूसरे पति को पूर्व में दिए गए तलाक की पूर्ण जानकारी थी, इसलिए, दूसरी शादी मोहम्मदिया कानून के मुताबिक वैध थी।
दूसरी शादी के कुछ समय बाद जब दूसरे पति ने अपनी पत्नी की वित्तीय जरूरतें पूरी करने से मना कर दिया तो महिला ने दूसरे पति से गुजारा भत्ता की मांग करते हुए धारा 125 के तहत आवेदन दाखिल किया।
दूसरी ओर, दूसरे पति के वकील ने दलील दी कि महिला ने अपने पहले पति से वैध तलाक लिए बगैर दूसरे शादी की। दूसरे पति के वकील ने कहा कि चूंकि तलाक संबंधी आदेश 2013 में दिया गया, इसलिए 2012 में हुई कथित दूसरी शादी मोहम्मदिया कानून के तहत शून्य थी।
परिवारिक अदालत ने इस आधार पर महिला के दावे को स्वीकार करने से मना कर दिया था कि उसकी दूसरी शादी की तिथि तक पहली शादी कानूनी रूप से भंग नहीं हुई थी, इसलिए दूसरी शादी शून्य थी।
उच्च न्यायालय ने कहा, “यह सुस्थापित नियम है कि जब एक पति तलाक देने की घोषणा करती है और इसके बाद इस संबंध में अदालती आदेश लेने के लिए अदालत से संपर्क करता है तो अदालत द्वारा पारित आदेश साधारण तौर पर घोषणात्मक प्रकृति की होती है जो पहले दिए जा चुके तलाक की स्थिति की पुष्टि करती।”
भाषा सं राजेंद्र
राजकुमार
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