घरेलू हिंसा कोई अपवाद नहीं बल्कि एक रोगग्रस्त सामाजिक व्यवस्था का संकेत है: उच्चतम न्यायालय
घरेलू हिंसा कोई अपवाद नहीं बल्कि एक रोगग्रस्त सामाजिक व्यवस्था का संकेत है: उच्चतम न्यायालय
नयी दिल्ली, चार अप्रैल (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने कहा है कि घरेलू हिंसा जैसे चलन अपवाद नहीं बल्कि ‘रोगग्रस्त सामाजिक व्यवस्था’ का संकेत है और देश में महिलाओं के खिलाफ अपराधों के अनुभवजन्य आंकड़े एक ‘चिंताजनक तस्वीर’ प्रस्तुत करते हैं।
उच्चतम न्यायालय ने कहा कि भारत ने महत्वपूर्ण आर्थिक विकास, साक्षरता में वृद्धि और शिक्षा एवं कार्यबल में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी का अनुभव किया है, फिर भी ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में पितृसत्तात्मकता रोजमर्रा की जिंदगी का एक अभिन्न अंग बनी हुई है।
न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति एन कोटिश्वर सिंह की पीठ ने ये टिप्पणियां कीं। पीठ ने अक्टूबर 2012 में आग लगाकर अपनी पत्नी की हत्या करने वाले व्यक्ति को दी गई सजा और आजीवन कारावास को बरकरार रखा।
पीठ ने कहा कि संविधान समानता, लिंग के आधार पर भेदभाव नहीं करने और जीवन एवं स्वतंत्रता के अधिकार का वादा करता है, लेकिन ऐसे मामले दर्शाते हैं कि इतने वर्षों बाद भी संविधान में निहित अधिकार कई लोगों के लिए अभी भी अप्राप्य हैं।
इस मामले में अपनी दोषसिद्धि को चुनौती देने वाले व्यक्ति द्वारा दायर अपील पर सुनवाई करते हुए पीठ ने पाया कि निचली अदालतों ने मृतक के मृत्युपूर्व बयान पर भरोसा किया था।
पीठ ने कहा कि जब किसी व्यक्ति की मृत्यु निकट हो, तो वे सभी कारक जो किसी व्यक्ति को सत्य के अलावा कुछ और बोलने के लिए विवश कर सकते हैं, महत्वहीन हो जाते हैं। यह इस दार्शनिक समझ पर आधारित है कि ऐसे में वह जो कुछ भी कहता है, वह केवल सत्य ही होता है।
भाषा संतोष माधव
माधव

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