निर्वाचन आयोग ‘तार्किक विसंगति’ सूची में शामिल लोगों के नाम प्रदर्शित करे: न्यायालय
निर्वाचन आयोग ‘तार्किक विसंगति’ सूची में शामिल लोगों के नाम प्रदर्शित करे: न्यायालय
नयी दिल्ली, 29 जनवरी (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने विभिन्न राज्यों में जारी मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के बीच निर्वाचन आयोग को बृहस्पतिवार को उन लोगों के नाम ग्राम पंचायत भवनों और ब्लॉक कार्यालयों में प्रदर्शित करने का निर्देश दिया, जिन्हें “तार्किक विसंगतियों” की सूची में शामिल किया गया है।
बिहार में मतदाता सूचियों की एसआईआर प्रक्रिया पूरी होने के बाद इस अभ्यास का दूसरा चरण नौ राज्यों- छत्तीसगढ़, गोवा, गुजरात, केरल, मध्यप्रदेश, राजस्थान, तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल तथा तीन केंद्र-शासित प्रदेशों-अंडमान एवं निकोबार, लक्षद्वीप और पुडुचेरी में संचालित किया जा रहा है।
प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने द्रविड़ मनेत्र कषगम (द्रमुक) की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल, अमित आनंद तिवारी और विवेक सिंह की इस दलील पर सुनवाई के दौरान यह आदेश पारित किया कि चुनावी राज्य तमिलनाडु में “तार्किक विसंगतियों” की सूची में शामिल मतदाताओं को मतदाता सूची में अपना नाम दर्ज करने का दावा करने के लिए पर्याप्त समय एवं अवसर दिया जाए।
पीठ तमिलनाडु में एसआईआर में मनमानी और प्रक्रियात्मक अनियमितताओं के आरोपों वाली याचिकाओं पर सुनवाई कर रही है, जिनमें “तार्किक विसंगति” श्रेणी से संबंधित याचिकाएं भी शामिल हैं।
जिन राज्यों में एसआईआर जारी है, उनके लिए सामान्य निर्देश पारित करते हुए पीठ ने कहा कि निर्वाचन आयोग की ओर से नोटिस जारी किए गए हैं और उन्हें मोटे तौर पर तीन श्रेणियों में वर्गीकृत किया गया है- ‘मैप’ किए गए, ‘मैप’ नहीं किए गए और तार्किक विसंगति।
पीठ ने कहा कि “तार्किक विसंगति” श्रेणी के तहत पिता के नाम का मिलान न होने और माता-पिता या दादा-दादी की उम्र से अंतर जैसी चीजों को शामिल किया गया है।
उसने कहा, “पक्षों की ओर से पेश दस्तावेजों से संकेत मिलता है कि तार्किक विसंगतियों की श्रेणी में अन्य बातों के अलावा, पिता के नाम का मिलान न होना, माता-पिता की उम्र में अंतर, माता-पिता की उम्र में 50 वर्ष से अधिक का अंतर, दादा-दादी की उम्र में 40 वर्ष से कम का अंतर और छह से अधिक संतान जैसे कारक शामिल हैं।”
पीठ ने तार्किक विसंगतियों की श्रेणी में शामिल व्यक्तियों की दावे और आपत्तियां पेश करने में मदद करने के मकसद से कुछ निर्देश जारी किए।
उसने कहा, “तार्किक विसंगतियों की सूची में शामिल व्यक्तियों के नाम हर तालुका (उप-मंडल) में सार्वजनिक स्थानों और ग्राम पंचायत भवनों के साथ-साथ शहरी क्षेत्रों के वार्ड कार्यालयों में प्रदर्शित किए जाएं।”
पीठ ने कहा कि प्रभावित लोगों को अपने अधिकृत प्रतिनिधि के माध्यम से दस्तावेज या आपत्तियां पेश करने की अनुमति है।
उसने कहा, “बूथ स्तरीय एजेंट (बीएलए) भी ऐसा अधिकृत प्रतिनिधि हो सकता है। ऐसे प्रतिनिधि के पक्ष में एक अनुमति पत्र होना चाहिए, चाहे उस पर हस्ताक्षर हों या अंगूठे का निशान लगा हो।”
पीठ ने कहा कि पंचायत भवनों या तालुका कार्यालयों में दस्तावेज और आपत्तियां पेश करने की इजाजत दी जा सकती है।
पीठ ने निर्वाचन आयोग से यह निर्देश जारी करने को कहा कि उन सभी व्यक्तियों को पंचायत भवनों में सूचियां प्रदर्शित किए जाने की तारीख से 10 दिनों का अतिरिक्त समय दिया जाए, जिन्होंने अभी तक अपने दावे, दस्तावेज या आपत्तियां पेश नहीं की हैं, ताकि वे विस्तारित अवधि के भीतर ऐसा कर सकें।
उसने कहा, “राज्य सरकार भारत निर्वाचन आयोग और राज्य निर्वाचन आयोग को पंचायत भवनों में दस्तावेजों/आपत्तियों को संभालने और प्रभावित व्यक्तियों की सुनवाई करने के लिए पर्याप्त जनशक्ति उपलब्ध कराएगी।”
पीठ ने जिलाधिकारियों को निर्देश दिया कि वे सुचारु कामकाज सुनिश्चित करने के लिए पर्याप्त कर्मचारियों और बलों की तैनाती के सिलसिले में निर्वाचन आयोग की ओर से जारी निर्देशों का “बारीकी से” पालन करें।
उसने एसआईआर वाले राज्यों के पुलिस महानिदेशकों (डीजीपी), पुलिस अधीक्षकों (एसपी) और जिलाधिकारियों (डीएम) को यह सुनिश्चित करने का निर्देश दिया कि वहां कानून-व्यवस्था की कोई स्थिति न पैदा हो।
पीठ ने कहा, “सभी प्रभावित व्यक्तियों को दस्तावेज, सामग्री या आपत्तियां पेश करने का अवसर दिए जाने के अलावा, उसी समय व्यक्तिगत रूप से या उनके साथ आए अधिकृत प्रतिनिधि के माध्यम से सुनवाई का मौका भी दिया जा सकता है, ताकि उचित निर्णय लिया जा सके।”
उसने कहा कि जो अधिकारी प्रभावित व्यक्तियों से दस्तावेज हासिल करेगा या उन्हें सुनवाई का अवसर प्रदान करेगा, वह कागजात प्राप्त होने और ऐसी सुनवाई के आयोजन को भी प्रमाणित कर सकता है।
पीठ ने 19 जनवरी को पश्चिम बंगाल में एसआईआर से संबंधित याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान भी इसी तरह के निर्देश पारित किए थे।
भाषा पारुल सुरेश
सुरेश

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