कोलकाता, 16 सितंबर (भाषा) पश्चिम बंगाल के उच्च शिक्षा विभाग ने राज्य सरकार से सहायता प्राप्त सभी विद्यालयों, महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों से कहा कि वे अपने पाठ्यक्रम में जनसंघ के संस्थापक श्यामा प्रसाद मुखर्जी के जीवन, योगदान एवं विरासत को शामिल करें तथा इस विषय पर शैक्षणिक एवं युवा जागरूकता कार्यक्रम आयोजित करें।
विभाग ने 15 सितंबर को जारी एक पत्र में इस मामले से संबंधित सूचना एवं संस्कृति मामलों के विभाग का एक ज्ञापन विद्यालयों और महाविद्यालयों के प्राचार्यों तथा सभी राज्य सहायता प्राप्त विश्वविद्यालयों के कुलसचिवों को भेजा तथा उनसे जल्द कार्रवाई करने के साथ ही अनुपालन रिपोर्ट भी मांगी।
उच्च शिक्षा मंत्री जगन्नाथ चट्टोपाध्याय ने इस कदम की पुष्टि करते हुए ‘पीटीआई-भाषा’ से बुधवार को कहा कि श्यामा प्रसाद मुखर्जी के जीवन और योगदान को 2027 के शैक्षणिक सत्र से उच्च माध्यमिक विद्यालयों, महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रम में शामिल किया जाएगा।
उन्होंने कहा, ‘‘वामपंथी विचारधारा के प्रभाव वाले तंत्र ने हमारी युवा पीढ़ी को मुखर्जी जैसे शिक्षाविद् के योगदान से अनजान बना दिया। श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने विभाजन के उन रक्तरंजित दिनों में पश्चिम बंगाल के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी, जब हमारी पिछली पीढ़ी खतरे में थी और अपनी जान बचाने के लिए संघर्ष कर रही थी।”
चटोपाध्याय ने कहा कि मुखर्जी ने कलकत्ता विश्वविद्यालय के कुलपति के रूप में संस्थान का मार्गदर्शन किया और लाखों विद्यार्थियों की मदद की।
उन्होंने कहा कि राष्ट्र की एकता, सुरक्षा और अखंडता के लिए श्यामा प्रसाद मुखर्जी के बलिदान को अब और भुलाया नहीं जा सकता।
मंत्री ने कहा, “हमने पहले ही संकल्प लिया था कि बंगाल एवं भारत के गौरवशाली पुत्र तथा सर आशुतोष मुखोपाध्याय के योग्य पुत्र की 125वीं जयंती पर उनके योगदान तथा विरासत को युवाओं और आम लोगों तक उचित तरीके से पहुंचाया और याद किया जाएगा।”
चट्टोपाध्याय ने कहा कि पाठ्यपुस्तकों में मुखर्जी पर उसीतरह एक अध्याय शामिल करना होगा, जैसा कि 19वीं सदी से बंगाल के अन्य प्रमुख व्यक्तित्वों के बारे में अध्याय शामिल किए गए हैं।
भाषा जितेंद्र सुरेश
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