पाठ्यपुस्तक लेखन में डर से रचनात्मकता, नवाचार पर असर पड़ेगा : शिक्षाविद् डैनिनो

पाठ्यपुस्तक लेखन में डर से रचनात्मकता, नवाचार पर असर पड़ेगा : शिक्षाविद् डैनिनो

पाठ्यपुस्तक लेखन में डर से रचनात्मकता, नवाचार पर असर पड़ेगा : शिक्षाविद् डैनिनो
Modified Date: May 28, 2026 / 01:35 pm IST
Published Date: May 28, 2026 1:35 pm IST

नयी दिल्ली, 28 मई (भाषा) एनसीईआरटी की आठवीं कक्षा की एक पाठ्यपुस्तक में न्यायपालिका संबंधी अब हटाए गए अध्याय को लेकर उठे विवाद के बाद शिक्षाविद् मिशेल डैनिनो ने बुधवार को कहा कि इस मामले में उच्चतम न्यायालय के आदेशों का वर्तमान और भविष्य के पाठ्यपुस्तक लेखकों पर ‘‘डर पैदा करने वाला प्रभाव’’ पड़ सकता है और इससे स्कूल शिक्षा में नवाचार हतोत्साहित होगा।

पद्मश्री से सम्मानित फ्रांसीसी मूल के भारतीय विद्वान डैनिनो राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) के लिए सामाजिक विज्ञान की पाठ्यपुस्तकों का मसौदा तैयार करने वाले पाठ्यक्रम समूह के अध्यक्ष थे।

न्यायपालिका पर विवादित अध्याय को लेकर उच्चतम न्यायालय ने डैनिनो समेत सुपर्णा दिवाकर और आलोक प्रसन्न कुमार पर आजीवन प्रतिबंध लगाया था, हालांकि बाद में अदालत ने अपने आदेश में संशोधन कर केंद्र, राज्यों और संस्थानों को स्वतंत्र निर्णय लेने की छूट दे दी।

डैनिनो ने ‘पीटीआई-भाषा’ को दिए साक्षात्कार में कहा कि कई टिप्पणीकारों, संपादकीय लेखकों और शिक्षाविदों ने 26 फरवरी और 11 मार्च को पारित उच्चतम न्यायालय के दो आदेशों के बाद के परिणामों पर चर्चा करते हुए ‘‘डर पैदा करने वाले प्रभाव’’ की बात कही है।

उन्होंने कहा, ‘‘इससे वर्तमान और भविष्य के पाठ्यपुस्तक लेखक स्वतंत्र रूप से नवाचार करने में संकोच करेंगे, जबकि नयी पीढ़ी की किताबों के लिए रचनात्मकता और नवाचार बेहद जरूरी हैं।’’

उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) 2020 में शिक्षा में ‘‘क्रांति’’ लाने की बात कही गई थी, लेकिन यदि ‘‘लेखक हर वाक्य पर संभावित आपत्तियों से डरेंगे’’ तो यह बदलाव संभव नहीं होगा।

डैनिनो ने भारतीय शिक्षा व्यवस्था को अत्यधिक ‘‘पाठ्यपुस्तक-केंद्रित’’ बताते हुए कहा कि यह छात्रों की सोच पर नकारात्मक असर डाल रही है।

उन्होंने फ्रांस में अपने छात्र जीवन का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां शिक्षक अपनी सामग्री और नोट्स के आधार पर पढ़ाते थे, किताबों पर निर्भरता कम थी।

उन्होंने कहा कि असली बहस स्कूल बैग का वजन कम करना नहीं, बल्कि कक्षाओं में पाठ्यपुस्तकों की भूमिका कम करना है। इसके लिए शिक्षकों को शोध और स्वतंत्र शिक्षण सामग्री तैयार करने का प्रशिक्षण देना होगा।

हालांकि उन्होंने माना कि भारत में यह बदलाव कठिन है, क्योंकि अधिकतर शिक्षक इसके लिए तैयार नहीं हैं और कई स्कूलों में बुनियादी सुविधाएं व इंटरनेट तक उपलब्ध नहीं है। ऐसे में ग्रामीण क्षेत्रों में पाठ्यपुस्तकें ही शिक्षा का मुख्य साधन बनी हुई हैं।

भाषा गोला मनीषा

मनीषा


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