‘अस्पृश्यता’ के विरोध पर गांधी के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करना मनुस्मृति मानसिकता:दीपांकर भट्टाचार्य
‘अस्पृश्यता’ के विरोध पर गांधी के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करना मनुस्मृति मानसिकता:दीपांकर भट्टाचार्य
नयी दिल्ली, एक सितंबर (भाषा) भाकपा (माले) लिबरेशन के महासचिव दीपांकर भट्टाचार्य ने ‘शुद्धीकरण प्रकरण’ में बयान को लेकर लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी का मंगलवार को समर्थन किया।
राहुल गांधी ने उत्तराखंड में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के संबोधन के बाद रैली स्थल पर हुए कथित शुद्धीकरण अनुष्ठान की आलोचना की थी। उसके बाद गांधी के विरुद्ध प्राथमिकी दर्ज की गयी थी।
भट्टाचार्य ने कहा कि यह बड़ी विडंबना है कि गांधी को छुआछूत के खिलाफ कार्रवाई की मांग करने को लेकर अत्याचार का मामला झेलना पड़ रहा है।
उन्होंने बताया कि खरगे को ‘नफरत भरी जातिवादी सोच’ का सामना करना पड़ा था, जब उत्तराखंड के हल्द्वानी में रामलीला मैदान में उनके भाषण के बाद एक ‘शुद्धीकरण हवन’ (शुद्धि अनुष्ठान) किया गया था और गांधी ने इसके लिए जिम्मेदार लोगों के खिलाफ़ प्राथमिकी दर्ज करने की मांग की थी।
उन्होंने पूछा, ‘‘छुआछूत की प्रथा के खिलाफ न्याय की मांग करने को अत्याचार कैसे माना जा सकता है?’’
वाल्मीकि समुदाय के एक सदस्य की शिकायत पर हल्द्वानी थाने में गांधी के ख़िलाफ प्राथमिकी दर्ज की गई थी। शिकायतकर्ता का आरोप था कि कांग्रेस नेता ने एक धार्मिक अनुष्ठान की व्याख्या जातिवादी नजरिए से की थी। प्राथमिकी में भारतीय न्याय संहिता तथा अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम की धाराएं लगायी गयी हैं।
यह विवाद रामलीला मैदान में आठ अगस्त को खरगे के भाषण के बाद शुरू हुआ। राज्यसभा में इस मामले को उठाते हुए कांग्रेस अध्यक्ष ने आरोप लगाया था कि उनके भाषण के बाद मंच पर भाजपा से जुड़े लोगों ने ‘शुद्धीकरण’ की रस्म निभाई । उन्होंने ‘अस्पृश्यता निवारण कानून’ के तहत कार्रवाई की मांग की।
केंद्रीय मंत्री जे.पी. नड्डा ने इस घटना की निंदा की और कहा कि भाजपा ऐसी गतिविधियों का समर्थन नहीं करती है।
गांधी ने 29 अगस्त को प्रेसवार्ता में इस मुद्दे को उठाते हुए इस घटना को ‘अपराध’ बताया और मांग की कि इसके लिए ज़िम्मेदार लोगों के ख़िलाफ प्राथमिकी दर्ज की जाए। उन्होंने कहा कि यह घटना भाजपा-आरएसएस की उस सोच को दिखाती है जो नहीं चाहती कि दलित तरक्की करें, सम्मान के साथ जिएं और सफल हों।
भट्टाचार्य ने कहा कि मनुस्मृति की गांधी की आलोचना से मीडिया के कुछ वर्गों में ‘बेचैनी और मज़ाक’ की स्थिति भी पैदा हुई थी।
उन्होंने कहा,‘‘मनुस्मृति को गुलामी की पितृसत्तात्मक एवं जातिवादी संहिता और संस्थागत या रस्मी अन्याय की संहिता बताने को चुनिंदा ‘हिंदू-विरोधी पूर्वाग्रह’ के तौर पर पेश किया जा रहा है।
बी.आर. आंबेडकर द्वारा 1927 में मनुस्मृति जलाये जाने का ज़िक्र करते हुए उन्होंने कहा कि संविधान को अपनाना उस सामाजिक व्यवस्था को स्पष्ट रूप से नकारना था जो इस ग्रंथ से जुड़ी थी।
भट्टाचार्य ने यह भी आरोप लगाया कि राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ (आरएसएस) ने अतीत में संविधान का विरोध किया था और भारत के संवैधानिक आधार के तौर पर मनुस्मृति का समर्थन किया था।
भाषा राजकुमार पवनेश
पवनेश

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