त्रिवेणी संगम पर गंगा बनती है अनोखी सूक्ष्मजीव प्रयोगशाला : पुस्तक में दावा

त्रिवेणी संगम पर गंगा बनती है अनोखी सूक्ष्मजीव प्रयोगशाला : पुस्तक में दावा

Modified Date: August 29, 2026 / 04:59 pm IST
Published Date: August 29, 2026 4:59 pm IST

नयी दिल्ली, 29 अगस्त (भाषा) उत्तर प्रदेश के प्रयागराज का त्रिवेणी संगम केवल आध्यात्मिक महत्व वाला स्थान ही नहीं है, बल्कि यहां विषाणुओं और जीवाणुओं के बीच होने वाली अनोखी परस्पर क्रिया गंगा को एक असाधारण सूक्ष्मजीव प्रयोगशाला बनाती है। एक नयी किताब में यह दावा किया गया है।

पद्मश्री से सम्मानित और प्रयागराज के स्वतंत्र शोध वैज्ञानिक अजय कुमार सोनकर ने अपनी किताब ‘‘द रिवर दैट रिमेम्बर्स: माइक्रोबियल इंटेलिजेंस ऑफ नेचर’’ में सूक्ष्म जीव विज्ञान, विषाणु विज्ञान और सांस्कृतिक स्मृति को जोड़ते हुए गंगा नदी का अध्ययन किया है।

लेखक का कहना है कि संगम में श्रद्धालुओं द्वारा लगाई जाने वाली हर डुबकी एक गहन सूक्ष्मजीवी आदान-प्रदान की प्रक्रिया बन जाती है, जिसका असर गंगा के पानी में दिखाई देता है।

उन्होंने कहा कि कुंभ मेले जैसे आयोजनों के दौरान विषाणु-जीवाणु की यह परस्पर क्रिया और तेज हो जाती है। स्नान की रस्मों के बाद इन विषाणुओं की संख्या और विविधता अपने चरम पर पहुंच जाती है।

पिछले वर्ष आयोजित महाकुंभ को दुनिया का सबसे बड़ा जनसमागम बताया गया था। पैंतालीस दिनों के दौरान देश-विदेश से 66 करोड़ से अधिक श्रद्धालु त्रिवेणी संगम के तट पर पहुंचे थे।

सोनकर ने किताब में लिखा है, ‘‘देश के कोने-कोने से श्रद्धालु यहां आते हैं और अपने साथ अलग-अलग तरह के सूक्ष्मजीव, जीवाणु, विषाणु और कवक लाते हैं, जो उनके अपने वातावरण के अनुकूल विकसित हुए हैं।’’

उन्होंने कहा कि इन लोगों के शरीर और त्वचा पर मौजूद सूक्ष्मजीव तटीय इलाकों, हिमालयी क्षेत्रों, रेगिस्तानों, शहरी केंद्रों और भारत के उष्णकटिबंधीय आंतरिक हिस्सों के वातावरण के अनुसार अलग-अलग होते हैं।

सोनकर के अनुसार, संगम में स्नान के दौरान ये सूक्ष्मजीव शरीर से निकलकर नदी के पानी में पहुंच जाते हैं और गंगा में पहले से मौजूद सूक्ष्मजीव समुदाय के साथ मिल जाते हैं।

भाषा शफीक सुरेश

सुरेश


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