पुलिस की लापरवाही से जमानत अर्जी के निपटारे में देरी को लेकर सरकार पर 50,000 रुपये का हर्जाना

पुलिस की लापरवाही से जमानत अर्जी के निपटारे में देरी को लेकर सरकार पर 50,000 रुपये का हर्जाना

पुलिस की लापरवाही से जमानत अर्जी के निपटारे में देरी को लेकर सरकार पर 50,000 रुपये का हर्जाना
Modified Date: July 16, 2026 / 03:48 pm IST
Published Date: July 16, 2026 3:48 pm IST

प्रयागराज, 16 जुलाई (भाषा) इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने उसकी ओर से मांगी गई जानकारी उपलब्ध कराने में बिजनौर के पुलिस अधिकारियों की लापरवाही के चलते जमानत अर्जी के निपटारे में 10 दिन से अधिक की देरी होने पर राज्य सरकार पर 50,000 रुपये का हर्जाना लगाया है।

हालांकि, न्यायमूर्ति अरुण कुमार सिंह देशवाल ने मंगलवार को दहेज हत्या के कथित मामले में यासीन नामक व्यक्ति और उसकी पत्नी की जमानत याचिका पर सुनवाई के दौरान सुनाए गए फैसले में कहा कि राज्य सरकार जांच के बाद दोषी अधिकारियों से हर्जाने की राशि वसूल सकती है।

पुलिस अधिकारियों के कारण हुई देरी पर नाखुशी जाहिर करते हुए अदालत ने कहा, “यह जमानत अर्जी तीन जुलाई 2026 को ही निस्तारित की जा सकती थी, लेकिन बार-बार रिमाइंडर भेजे जाने और मौखिक निर्देश दिए जाने के बावजूद इस अदालत को आवश्यक जानकारी उपलब्ध नहीं कराई गई। पुलिस की इस उदासीनता के चलते यह अर्जी 10 दिनों से अधिक समय तक लंबित रही।”

अदालत ने जमानत याचिका इस आधार पर मंजूर कर ली कि यासीन की बहू की मौत से पहले दहेज की मांग पूरी नहीं होने को लेकर उसके उत्पीड़न के सिलसिले में पर्याप्त साक्ष्य मौजूद नहीं हैं। उसने कहा कि स्वतंत्र गवाहों ने पति-पत्नी के बीच मामूली घरेलू विवादों को लेकर अक्सर झगड़े होने के भी संकेत दिए हैं।

अदालत ने कहा कि संयुक्त निदेशक (अभियोजन) कार्यालय ने इस जमानत याचिका की प्रति 17 जून को पुलिस पैरोकार को उपलब्ध कराई थी और 19 जून को पुलिस अधीक्षक (एसपी) को एक अलर्ट भी भेजा गया था, लेकिन पुलिस आवश्यक जानकारी उपलब्ध कराने में नाकाम रही।

तीन जुलाई को सुनवाई के दौरान अदालत ने अभियोजन पक्ष को सीसीटीएनएस पोर्टल से केस डायरी का पीडीएफ प्राप्त करने का निर्देश दिया था। इसका अनुपालन करने के बजाय संबंधित पुलिस अधिकारियों ने केवल इन याचिकाकर्ताओं की ‘केस हिस्ट्री’ भेजी, न की वास्तविक केस डायरी।

इसके बाद, अदालत ने संबंधित थाना प्रभारी (एसएचओ) को तलब किया और उनका यह स्पष्टीकरण स्वीकार किया कि वह पहले अवकाश पर थे और बाद में कांवड़ यात्रा के दौरान उनकी ड्यूटी लग गई थी।

हालांकि, उप निरीक्षक हिमांशु पंवार ने केस डायरी भेजने में विफलता के लिए जानकारी के अभाव का हवाला दिया, जबकि क्षेत्राधिकारी ने खुलासा किया कि उनसे संबद्ध हेड कांस्टेबल उच्च न्यायालय के निर्देशों की जानकारी देने में पूरी तरह विफल रहा।

पीठ ने इसे बहुत ही चौंकाने वाला पाया कि नोटिस की प्राप्ति से 25 दिन से अधिक का समय बीत चुका है और अलर्ट, रिमाइंडर तथा मौखिक निर्देशों के बावजूद ये जानकारियां अभी तक उपलब्ध नहीं कराई गई हैं। उसने कहा कि अधिकारी एक-दूसरे पर ठीकरा फोड़ने में जुटे हुए हैं।

भाषा

सं राजेंद्र पारुल

पारुल


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