वंदे मातरम् पर सरकार का कदम ‘असंवैधानिक और अलोकतांत्रिक’ : एआईएमपीएलबी

वंदे मातरम् पर सरकार का कदम ‘असंवैधानिक और अलोकतांत्रिक’ : एआईएमपीएलबी

वंदे मातरम् पर सरकार का कदम ‘असंवैधानिक और अलोकतांत्रिक’ : एआईएमपीएलबी
Modified Date: May 7, 2026 / 07:15 pm IST
Published Date: May 7, 2026 7:15 pm IST

नयी दिल्ली, सात मई (भाषा) ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (एआईएमपीएलबी)ने केंद्रीय मंत्रिमंडल द्वारा ‘वंदे मातरम’ को राष्ट्रगान ‘जन गण मन’ के समान कानूनी संरक्षण दिए जाने के फैसले की बृहस्पतिवार को कड़ी आलोचना करते हुए इसे धार्मिक स्वतंत्रता सहित संवैधानिक अधिकारों का सीधा उल्लंघन करार दिया और तत्काल इस निर्णय को वापस लेने की मांग की।

केंद्रीय मंत्रिमंडल ने राष्ट्रगीत वंदे मातरम् के गायन में किसी भी प्रकार की बाधा डालने को दंडनीय अपराध बनाने के लिए ‘राष्ट्रीय गौरव अपमान निवारण अधिनियम, 1971’ में संशोधन के प्रस्ताव को मंजूरी दी है।

इससे वंदे मातरम् को राष्ट्रगान जन गण मन के समान वैधानिक सुरक्षा मिल जाएगी। वर्तमान कानून में राष्ट्रीय ध्वज, संविधान और राष्ट्रगान को किसी भी प्रकार के अपमान से सुरक्षा प्राप्त है।

बोर्ड द्वारा जारी बयान में कहा गया कि एआईएमपीएलबी केंद्रीय मंत्रिमंडल के उस फैसले को ‘कड़ी आलोचना’ के साथ खारिज करता है, जिसमें वंदे मातरम् को राष्ट्रगान ‘जन गण मन’ के बराबर दर्जा दिया गया है, इसके सभी छह अंतरों के गायन को अनिवार्य बनाया गया है और सभी सरकारी और शैक्षणिक संस्थानों में राष्ट्रगान से पहले इसका गायन अनिवार्य किया गया है।

एआईएमपीएलबी ने दावा किया कि यह कदम भारत के संविधान की मूल भावना, धार्मिक स्वतंत्रता, धर्मनिरपेक्ष मूल्यों और संविधान सभा के ऐतिहासिक निर्णयों का ‘प्रत्यक्ष उल्लंघन’ है। साथ ही सरकार ने इस निर्णय को तत्काल वापस लेने की मांग की।

एआईएमपीएलबी के प्रवक्ता एस क्यू आर इलियास ने कहा कि मंत्रिमंडल का निर्णय न केवल ‘असंवैधानिक और अलोकतांत्रिक’ है, बल्कि देश की धार्मिक और सांस्कृतिक विविधता और संवैधानिक लोकाचार के भी विपरीत है।

उन्होंने कहा कि एक धर्मनिरपेक्ष राज्य किसी एक समुदाय की धार्मिक अवधारणाओं या मान्यताओं को बलपूर्वक सभी नागरिकों पर नहीं थोप सकता।

इलियास ने कहा कि ‘वंदे मातरम्’ के कई बंदों में देवी दुर्गा और अन्य देवी-देवताओं की स्तुति और महिमागान किया गया है, जो एक ही ईश्वर के इस्लामी सिद्धांत के विपरीत है।

उन्होंने रेखांकित किया कि 1937 में, रवींद्रनाथ टैगोर की सलाह पर कांग्रेस ने स्वयं यह निर्णय लिया था कि ‘वंदे मातरम्’ के केवल पहले दो बंद (अंतरों) का ही उपयोग किया जाना चाहिए, क्योंकि बाद के श्लोक धार्मिक प्रकृति के हैं और समाज के सभी वर्गों को स्वीकार्य नहीं हो सकते हैं।

इलियास ने कहा कि इस वास्तविकता को संज्ञान में लेते हुए, संविधान सभा ने 1950 में भी केवल पहले दो बंदों को ही राष्ट्रीय गीत के रूप में स्वीकार किया था।

उन्होंने कहा, ‘‘ऐसी स्थिति में, सभी छह बंद को अनिवार्य बनाना न केवल ऐतिहासिक सहमति से विचलन है, बल्कि एक खतरनाक और उकसाने वाला कदम भी है।’’

इलियास ने कहा, ‘‘सरकार को संवेदनशील धार्मिक मुद्दों का राजनीतिक उद्देश्यों के लिए इस्तेमाल करने से परहेज करना चाहिए और ऐसे फैसले लेने से बचना चाहिए जो सांप्रदायिक सद्भाव और राष्ट्रीय एकता को कमजोर करते हों।’’

भाषा धीरज नरेश

नरेश


लेखक के बारे में