ग्रेट निकोबार परियोजना अद्वितीय पारिस्थितिकी तंत्र को नष्ट कर देगी: रमेश ने पर्यावरण मंत्री से कहा
ग्रेट निकोबार परियोजना अद्वितीय पारिस्थितिकी तंत्र को नष्ट कर देगी: रमेश ने पर्यावरण मंत्री से कहा
नयी दिल्ली, 10 मई (भाषा) कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव को रविवार को पत्र लिखकर दावा किया कि ग्रेट निकोबार द्वीप विकास परियोजना वहां के अद्वितीय पारिस्थितिकी तंत्र को ‘‘नष्ट’’ कर देगी।
रमेश ने यादव से परियोजना के मौजूदा स्वरूप की पुन: समीक्षा करने का आग्रह किया।
उन्होंने यादव को लिखे पत्र में कहा कि जिन अध्ययनों के आधार पर इस परियोजना को पर्यावरणीय मंजूरी दी गई है, वे ‘‘पूरी तरह अपर्याप्त’’ हैं और ‘‘पर्यावरणीय प्रभाव आकलन प्रक्रिया का मजाक बना दिया गया है।’’
रमेश ने कहा कि सुरक्षा विशेषज्ञों ने भी लिखा है कि देश की आवश्यक सुरक्षा जरूरतों को इतनी बड़ी ‘‘पारिस्थितिकी तबाही’’ के बिना भी पूरा किया जा सकता है।
उन्होंने कहा, ‘‘मैं फिर दोहराना चाहता हूं कि ग्रेट निकोबार द्वीप की जैव विविधता वैश्विक स्तर पर अद्वितीय है और समय-समय पर वहां नयी खोज हो रही हैं। ग्रेट निकोबार द्वीप विकास परियोजना इसी अद्वितीय पारिस्थितिकी तंत्र को नष्ट कर देगी।’’
रमेश ने कहा कि प्रतिपूरक वनीकरण का तर्क पूरी तरह खोखला है और मंत्री यह जानते हैं।
कांग्रेस महासचिव रमेश ने कहा, ‘‘मैं एक बार फिर आपसे आग्रह करता हूं कि रुककर इस परियोजना के मौजूदा स्वरूप एवं विवरण पर विचार करें तथा उसकी फिर से समीक्षा करें।’’
रमेश ने कहा कि यह स्पष्ट है कि जिन अध्ययनों के आधार पर परियोजना को पर्यावरणीय मंजूरी दी गई है, वे त्वरित पर्यावरणीय प्रभाव आकलन (ईआईए) भी नहीं हैं और ये अध्ययन कुछ दिनों या कुछ सप्ताह में जुटाए गए आधारभूत आंकड़ों पर आधारित हैं तथा पूरी तरह अपर्याप्त हैं।
उन्होंने कहा, ‘‘ये रिपोर्ट विज्ञान का अपमान हैं और ईआईए प्रक्रिया का मजाक बनाती हैं। अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्नों (एफएक्यू) में जिन ‘व्यापक अध्ययनों, विस्तृत आकलनों और मजबूत पर्यावरणीय प्रभाव आकलन तथा पर्यावरण प्रबंधन योजना’ का हवाला दिया गया है, उन्हें खोजने के मेरे सभी प्रयास विफल रहे हैं।’’
रमेश ने पत्र में कहा, ‘‘सरकार द्वारा एक मई, 2026 को प्रकाशित ‘ग्रेट निकोबार परियोजना: एफएक्यू’ में कहा गया है कि ‘परियोजना के संभावित पारिस्थितिकी प्रभावों की व्यापक रूप से पहचान और समीक्षा की गई है तथा मजबूत पर्यावरणीय प्रभाव आकलन (ईआईए) प्रक्रिया एवं विस्तृत पर्यावरण प्रबंधन योजना (ईएमपी) के जरिये उनका प्रभावी प्रबंधन किया जा रहा है।’’
उन्होंने कहा कि कानून के तहत बंदरगाह परियोजनाओं, खासकर अंडमान एवं निकोबार द्वीपसमूह में स्थित परियोजनाओं के लिए व्यापक ईआईए अध्ययन अनिवार्य है।
रमेश ने कहा कि ग्रेट निकोबार द्वीप की अद्वितीय जैव विविधता और पारिस्थितिकी को देखते हुए मजबूत एवं पूर्ण आधारभूत अध्ययन में कम से कम तीन मौसम को शामिल किया जाना चाहिए, ताकि मौसमी बदलावों का पर्याप्त अध्ययन और आकलन हो सके।
कांग्रेस नेता ने कहा कि बंदरगाह परियोजनाओं के लिए व्यापक ईआईए के महत्व को पूर्व पर्यावरण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने पांच मई, 2015 को उस समय लोकसभा में दोहराया था, जब उन्होंने त्वरित ईआईए अध्ययनों के आधार पर बंदरगाहों को मंजूरी देने के गुजरात सरकार के अनुरोध को खारिज किया था।
रमेश ने पत्र में कहा, ‘‘मैंने राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) का तीन अप्रैल, 2023 का फैसला भी पढ़ा है जिसमें कहा गया था कि मंजूरी में ऐसी ‘खामियां हैं जिनका उत्तर नहीं दिया गया’ है और उसने पर्यावरणीय मंजूरी की फिर से समीक्षा के लिए उच्चाधिकार प्राप्त समिति (एचपीसी) गठित करने का निर्देश दिया गया था।’’
उन्होंने कहा, ‘‘पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने एनजीटी के समक्ष हलफनामे दाखिल कर दावा किया है कि एनजीटी के आदेशों के तहत गठित एचपीसी की विचार-विमर्श प्रक्रिया और रिपोर्ट गोपनीय है।’’
रमेश ने कहा कि 16 फरवरी, 2026 के फैसले में उच्चाधिकार प्राप्त समिति की रिपोर्ट के निष्कर्षों पर ही भरोसा किया गया, जबकि रिपोर्ट अदालत के रिकॉर्ड का हिस्सा नहीं थी।
उन्होंने कहा, ‘‘मैं यह समझने में पूरी तरह असमर्थ हूं कि मंत्रालय द्वारा एचपीसी की रिपोर्ट को गोपनीय बताने के दावे के पीछे क्या तर्क और वैधता है। यह पारदर्शिता और जवाबदेही के उन सभी बुनियादी सिद्धांतों के खिलाफ है, जिनके लिए आप प्रतिबद्धता जताते हैं।’’
कांग्रेस ने ग्रेट निकोबार परियोजना को लेकर पारिस्थितिकी, जनजातीय अधिकारों, पारदर्शिता और सुरक्षा से जुड़ी चिंताओं को पिछले सप्ताह विस्तार से उठाते हुए कहा था कि इन मुद्दों पर संसदीय मंच पर चर्चा होनी चाहिए।
भाषा सिम्मी नेत्रपाल
नेत्रपाल

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