वह वर्दी में नहीं थे, फिर भी सैनिक की तरह सेवा दी: ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के दौरान मारे गए अधिकारी की पत्नी
वह वर्दी में नहीं थे, फिर भी सैनिक की तरह सेवा दी: ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के दौरान मारे गए अधिकारी की पत्नी
(अनिल भट्ट)
जम्मू, सात मई (भाषा) ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के दौरान राजौरी में पाकिस्तानी सेना की भीषण गोलाबारी के दौरान मारे गए जम्मू-कश्मीर के वरिष्ठ नौकरशाह डॉ. राज कुमार थापा की पत्नी ने बृहस्पतिवार को कहा कि परिवार अभी तक इस सच को स्वीकार नहीं कर पाया है कि वह (डॉ. थापा) अब हमारे बीच नहीं रहे, लेकिन उसे इस बात पर गर्व है कि “वर्दी में न होने के बावजूद उन्होंने एक सैनिक की तरह सेवा दी।”
जम्मू-कश्मीर प्रशासनिक सेवा (जेकेएएस) के 2001 बैच के अधिकारी थापा राजौरी के अतिरिक्त जिला विकास आयुक्त (एडीडीसी) के रूप में कार्यरत थे। पिछले साल 10 मई को सीमावर्ती जिले में पाकिस्तान की भीषण गोलाबारी के दौरान एक गोला थापा के आवासीय क्वार्टर पर गिर गया था, जिससे उनकी मौत हो गई थी।
अपने पति की पहली बरसी से पहले उस दर्दनाक पल को याद करते हुए डॉ. मीनाक्षी कुंदन थापा ने कहा कि डॉ. राजकुमार थापा का बलिदान एक बेहद व्यक्तिगत और दर्दनाक वास्तविकता है।
उन्होंने नम आंखों से कहा, “जब हम किताबों में इस शब्द (बलिदान) को पढ़ते हैं, तो यह बहुत महान लगता है, लेकिन इसका असल अर्थ केवल वही लोग समझ सकते हैं, जिन्होंने हकीकत में नुकसान झेला हो। वीरगति वास्तव में मौत का दूसरा नाम है और उसके बाद व्यक्ति कभी वापस नहीं आता।”
डॉ. मीनाक्षी ने कहा, “ऐसा लगता है, जैसे यह कल ही हुआ हो। इस पर विश्वास करना अभी भी कठिन है। कभी-कभी दिल यह मानने से ही इनकार कर देता है कि ऐसा हकीकत में हुआ।”
उन्होंने कहा, “परिवार के सदस्य-खास तौर पर मेरे बच्चे-अभी भी इस सच को स्वीकार नहीं कर पाए हैं कि डॉ. थापा इस दुनिया में नहीं रहे।”
डॉ. मीनाक्षी ने कहा, “कभी-कभी बच्चे कहते हैं कि शायद ‘पापा’ किसी गोपनीय मिशन पर हैं और वह एक दिन जरूर लौटेंगे। हमें भी कई बार ऐसा लगता है कि शायद यह किसी बुरे सपने की तरह है, जो हमारी नींद टूटने पर गलत साबित हो जाएगा।”
डॉ. थापा को “बिना वर्दी वाला सैनिक” करार देते हुए डॉ. मीनाक्षी ने कहा कि संकट के दौरान उनकी प्रतिबद्धता अग्रिम मोर्चे पर तैनात कर्मियों के समान थी।
उन्होंने कहा, “डॉ. थापा वर्दी में नहीं थे, लेकिन उन्होंने अग्रिम मोर्चे पर तैनात सैनिक की तरह काम किया और निकासी के प्रबंधन से लेकर स्थिति पर नजर रखने और नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने तक में अहम योगदान दिया।”
डॉ. मीनाक्षी ने कहा कि परिवार में घटी कोई बड़ी दुर्घटना भी डॉ. थापा को अपने कर्तव्य से विचलित नहीं कर सकी।
उन्होंने कहा, “डॉ. थापा के पास घर आने का एक वैध कारण था, क्योंकि परिवार में एक नाबालिग बच्चे की मौत हो गई थी और उनकी उपस्थिति आवश्यक थी। लेकिन उन्होंने कहा-अगर मैं अभी चला गया, तो इसे मेरी विफलता के रूप में दर्ज किया जाएगा। कर्तव्य सर्वोपरि है।”
डॉ. मीनाक्षी के मुताबिक, उनके पति ने अपने कर्तव्यों और देश सेवा को हमेशा खुद से और परिवार से ऊपर रखा।
उन्होंने बताया, “गोलाबारी शुरू होने के बाद वह कई दिनों तक घर नहीं लौटे। वह निकासी की निगरानी के लिए गोलाबारी प्रभावित क्षेत्रों का दौरा कर रहे थे। वह अपने सरकारी आवास में ही रहे, जबकि वह सबसे असुरक्षित क्षेत्रों में से एक था, क्योंकि दुश्मन उस पर लगातार गोलाबारी कर रहा था।”
डॉ. मीनाक्षी ने कहा, “इसके बावजूद उन्होंने कभी भी वहां से हटने के बारे में नहीं सोचा। वह लगातार लोगों की सेवा कर रहे थे, निकासी का समन्वय कर रहे थे और यह सुनिश्चित कर रहे थे कि जरूरतमंदों तक राहत पहुंचे।”
उन्होंने बताया कि संकट के दौरान डॉ. थापा लगातार अपने परिवार के संपर्क में रहे, यहां तक कि जब वह जमीनी स्तर पर काम कर रहे थे, तब भी।
डॉ. मीनाक्षी के अनुसार, “जब आखिरी बार हमारी बात हुई थी, तो उन्होंने मुझे बताया था कि गोलाबारी बढ़ गई है और इसके और तेज होने की आशंका है। उन्होंने हमसे अपनी सुरक्षा का ख्याल रखने और खिड़कियों से दूर रहने के लिए कहा तथा रिश्तेदारों को भी फोन करके सतर्क किया। फिर भी, उन्होंने अपनी चौकी नहीं छोड़ी, क्योंकि उनका मानना था कि यह उनकी ‘कर्मभूमि’ है।”
डॉ. मीनाक्षी ने कहा कि डॉ. थापा के बलिदान ने परिवार को गर्व और असहनीय दुख, दोनों से भर दिया है।
उन्होंने कहा, “हमें गर्व है कि उन्होंने तिरंगे में लिपटकर, पूरे राजकीय सम्मान के साथ अंतिम विदाई ली। लेकिन गर्व एक बात है और व्यक्तिगत क्षति दूसरी बात।”
डॉ. मीनाक्षी ने कहा कि उनकी मौत ने एक ऐसा खालीपन छोड़ दिया है, जिसे कभी भरा नहीं जा सकता।
उन्होंने कहा, “घर वहां रहने वाले लोगों से बनता है, दीवारों से नहीं। वह हमारी जिंदगी, हमारे परिवार, हमारे समुदाय और हमारे इलाके का अहम हिस्सा थे। हम कोई उन्हें ‘डॉक्टर साहिब’ के रूप में जानता था। वह एक ऐसे व्यक्ति थे, जो लोगों से गर्मजोशी और सकारात्मकता के साथ मिलते थे।”
डॉ. मीनाक्षी ने बताया, “आज भी लोग रोते हुए हमारे पास आते हैं और कहते हैं कि उन्होंने पहले कभी ऐसा अधिकारी नहीं देखा था। वह लोगों के दिलों में बसते थे।”
उन्होंने संघर्ष से मानवीय पहलु पर होने वाले नुकसान का जिक्र करते हुए कहा कि इस तरह की शत्रुता के दौरान अक्सर निर्दोष लोग सबसे ज्यादा खामियाजा भुगतते हैं।
एमबीबीएस डिग्री धारी डॉ. थापा 2001 में जेकेएएस में शामिल हुए थे और उन्हें अपने पेशेवर समर्पण और जन-हितैषी दृष्टिकोण के लिए बहुत सम्मान हासिल था।
राजौरी में तैनाती से पहले उन्होंने 2009 से 2014 तक पूर्व उपमुख्यमंत्री तारा चंद के विशेष सेवा अधिकारी के रूप में सेवाएं दी थीं।
जम्मू-कश्मीर के उपराज्यपाल मनोज सिन्हा ने 18 अप्रैल को राजौरी में डॉ. थापा की विरासत को समर्पित एक स्मारक संग्रहालय और पुस्तकालय का उद्घाटन किया।
भाषा पारुल माधव
माधव

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