नाबालिग बहनों से दुष्कर्म-हत्या मामले में मौत की सजा पाए चार लोगों को उच्च न्यायालय ने बरी किया
नाबालिग बहनों से दुष्कर्म-हत्या मामले में मौत की सजा पाए चार लोगों को उच्च न्यायालय ने बरी किया
चंडीगढ़, 27 अगस्त (भाषा) पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय ने 2021 में सोनीपत में दो नाबालिग बहनों से कथित दुष्कर्म और हत्या के मामले में मौत की सजा पाए चार लोगों को यह कहते हुए बरी कर दिया कि अभियोजन पक्ष उनके अपराध में शामिल होने का पुख्ता सबूत नहीं दे सका।
न्यायमूर्ति अनूप चितकारा और न्यायमूर्ति रमेश चंदर डिमरी की खंडपीठ ने बुधवार को अरुण, फूल चंद, दुखन और राम सुहाग की दोषसिद्धि और सजा को रद्द करते हुए उन्हें निजी मुचलके पर तत्काल रिहा करने का निर्देश दिया।
यह मामला अगस्त 2021 में 13 और 12 वर्ष की दो बहनों की मौत से जुड़ा है।
शुरुआत में लड़कियों की मां ने चिकित्सकों और पुलिस को बताया था कि दोनों को सांप ने काट लिया है।
लड़कियों को दिल्ली के एक अस्पताल ले जाया गया, जहां एक लड़की को मृत अवस्था में लाया गया घोषित किया गया जबकि दूसरी की भी कुछ घंटे बाद मौत हो गई।
हालांकि, तीन दिन बाद नौ अगस्त 2021 को मां ने एक अन्य शिकायत दर्ज कराई और आरोप लगाया कि पड़ोसी अरुण, फूल चंद, दुखन और राम सुहाग उनके कमरे में घुसे, लड़कियों से दुष्कर्म किया और उन्हें जबरन जहर दे दिया।
शिकायत के आधार पर चारों के खिलाफ मामला दर्ज किया गया। नवंबर 2023 में सोनीपत के अधीनस्थ न्यायालय ने चारों आरोपियों को मौत की सजा सुनाई थी।
हालांकि, अदालत ने मां के अलग-अलग मौकों पर दिए बयानों में विरोधाभास पाया।
शुरुआत में मां ने अपनी शिकायत में चारों आरोपियों के नाम लिए थे लेकिन 10 अगस्त 2021 को दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 164 के तहत दर्ज बयान में उसने कहा कि वह केवल एक आरोपी का नाम जानती है और बाकी के नाम नहीं जानती।
उच्च न्यायालय ने कहा कि इससे एक दिन पहले दी गई शिकायत में चारों आरोपियों के पूरे नाम दर्ज थे।
अदालत ने कहा, ‘‘यह सामान्य समझ की बात है कि अगर लड़कियों की मां को नौ अगस्त 2021 को पुलिस को दी गई लिखित शिकायत के समय आरोपियों के नाम पता थे, तो अगले ही दिन न्यायिक मजिस्ट्रेट (एसीजेएम) के समक्ष यह स्पष्ट रूप से कहने का कोई कारण नहीं था कि वह एक आरोपी को छोड़कर किसी अन्य का नाम नहीं जानती।’’
अदालत ने इसे ‘‘महत्वपूर्ण विरोधाभास’’ माना।
मुकदमे की सुनवाई के दौरान महिला अपने बयान से मुकर गई।
उसने अभियोजन पक्ष के मामले का समर्थन नहीं किया और न्यायिक मजिस्ट्रेट के समक्ष दिए गए अपने बयान समेत सभी बातों से इनकार कर दिया।
अदालत ने कहा कि चिकित्सकीय साक्ष्यों से यह साबित होता है कि दोनों लड़कियों का यौन उत्पीड़न किया गया था।
पीठ ने यह भी पाया कि वैज्ञानिक साक्ष्यों में किसी भी आरोपी की आनुवंशिक सामग्री मिलने का उल्लेख नहीं था।
अदालत ने कहा, ‘‘साक्ष्य का अभाव इस बात को लेकर मजबूत संदेह उत्पन्न करता है कि आरोपियों ने ही दुष्कर्म किया था।’’
अदालत ने कहा कि सभी साक्ष्य और रिकॉर्ड का सावधानीपूर्वक विश्लेषण करने के बाद भी यह स्पष्ट नहीं होता कि इन चार लोगों को मामले में कैसे आरोपी बनाया गया, जबकि उन्हें मौत की सजा भी सुनाई गई थी।
आदेश में कहा गया, “पूरे साक्ष्य के विश्लेषण से न केवल किसी भी आरोपी की संलिप्तता पर संदेह पैदा होता है, बल्कि उनके खिलाफ वैज्ञानिक साक्ष्य के अभाव का भी पता चलता है। इन परिस्थितियों में, हालांकि अभियोजन पक्ष दोनों पीड़िताओं के साथ दुष्कर्म किए जाने का अपराध साबित करने में सफल रहा है, लेकिन वह किसी भी आरोपी को दुष्कर्म के अपराधी के रूप में साबित नहीं कर सका।”
अभियोजन पक्ष चारों आरोपियों में से किसी को भी किसी अपराध से जोड़ने वाला ऐसा कानूनी रूप से स्वीकार्य साक्ष्य प्रदान करने में विफल रहा, जिसके आधार पर उन्हें दोषी ठहराया जा सके इसलिए वे संदेह का लाभ पाने के हकदार हैं।
आदेश के अनुसार, सभी आरोपों में चारों अपीलकर्ताओं की दोषसिद्धि और सजा को रद्द कर दिया गया तथा उन्हें सभी आरोपों से बरी कर दिया गया।
भाषा जितेंद्र पवनेश
पवनेश

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