उच्च न्यायालय ने यौन उत्पीड़न के फर्जी मामलों में पीड़ितों को मुआवजा देने का प्रस्ताव दिया

उच्च न्यायालय ने यौन उत्पीड़न के फर्जी मामलों में पीड़ितों को मुआवजा देने का प्रस्ताव दिया

उच्च न्यायालय ने यौन उत्पीड़न के फर्जी मामलों में पीड़ितों को मुआवजा देने का प्रस्ताव दिया
Modified Date: May 26, 2026 / 09:00 pm IST
Published Date: May 26, 2026 9:00 pm IST

(अमिताव रॉय)

कोलकाता, 26 मई (भाषा) यौन उत्पीड़न और अन्य आपराधिक मामलों में वित्तीय लाभ की लालसा से प्रेरित झूठी शिकायतों की बढ़ती प्रवृत्ति को देखते हुए कलकत्ता उच्च न्यायालय ने फर्जी दावों को हतोत्साहित करने के लिए पीड़ित को चरणबद्ध तरीके से मुआवजा देने का प्रस्ताव दिया है।

उच्च न्यायालय की एक खंडपीठ ने एक लड़की से बलात्कार करने के आरोप से एक प्राध्यापक को बरी करते हुए इन बदलावों का प्रस्ताव दिया और उन्हें 10 लाख रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया।

उच्च न्यायालय ने कहा कि अधीनस्थ अदालत में उनकी दोषसिद्धि और कारावास ने उनकी प्रतिष्ठा को अपूरणीय क्षति पहुंचाई है।

मुआवजे के दुरुपयोग को रोकने के लिए पश्चिम बंगाल सरकार के लिए नीतिगत सिफारिश करते हुए उच्च न्यायालय ने कहा, ‘‘यद्यपि पीड़ित मुआवजा योजना पुनर्वास का एक सराहनीय साधन है, लेकिन न्यायालय एक चिंताजनक प्रवृत्ति देख रहा है जहां वित्तीय लाभ की लालसा अनैतिक व्यक्तियों को झूठी शिकायतें दर्ज करने के लिए प्रेरित करती है।’’

न्यायमूर्ति अरिजीत बनर्जी और न्यायमूर्ति अपूर्बा सिन्हा रे की खंडपीठ ने 22 मई को फैसला सुनाते हुए कहा, ‘‘पीड़ितों को सहायता प्रदान करने की आवश्यकता और निर्दोष नागरिकों की सुरक्षा के बीच संतुलन बनाए रखने के लिए, अधिक कठोर वितरण संरचना की आवश्यकता है।’’

अदालत ने एक ऐसा ढांचा प्रस्तावित किया जिसके तहत पीड़ित को अंतरिम भुगतान किया जाएगा, जो प्रारंभिक वितरण के रूप में मुआवजे की राशि का 25 प्रतिशत होगा।

अदालत ने कहा कि शेष 75 प्रतिशत राशि अधीनस्थ अदालत में दोष सिद्ध होने पर पीड़ित (या उसके निकटतम संबंधी) के नाम पर ब्याज कमाने वाले खाते में जमा की जाएगी और ये धनराशि अपील के अंतिम निर्णय तक सुरक्षित रहेगी।

खंडपीठ ने कहा, ‘‘चरणबद्ध भुगतान लागू करने से फर्जी मामले दर्ज करने की प्रवृत्ति को काफी हद तक कम किया जा सकता है।’’

अदालत ने राज्य सरकार के न्यायिक विभाग के प्रधान सचिव से इस मामले पर संबंधित विभागों को सलाह देने का अनुरोध किया और पश्चिम बंगाल राज्य विधि सेवा प्राधिकरण के सचिव को इन सिफारिशों की समीक्षा करने और उन्हें लागू करने का निर्देश दिया।

पीठ ने टिप्पणी की, ‘‘यद्यपि बच्चे ‘सर्वोच्च राष्ट्रीय संपत्ति’ हैं, फिर भी यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण (पॉक्सो) अधिनियम के कड़े प्रावधानों का इस्तेमाल व्यक्तिगत दुश्मनी निकालने के लिए नहीं किया जा सकता।’’

अदालत ने पश्चिम बंगाल बार काउंसिल के अध्यक्ष और पुलिस महानिदेशक को निर्देश दिया कि वे विशेष लोक अभियोजक और जांच अधिकारी के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्यवाही शुरू करने पर विचार करें, क्योंकि उन्होंने आरोपी को दोषी ठहराने में पक्षपातपूर्ण भूमिका निभाई थी। आरोपी ने 2022 में शिकायत दर्ज होने के बाद से चार साल हिरासत में बिताए।

इस दोषसिद्धि पर आपत्ति जताते हुए उच्च न्यायालय की खंडपीठ ने हुगली जिले के सेरामपुर कॉलेज के प्रोफेसर प्रताप दिगल को तत्काल रिहा करने का आदेश दिया, जिन्हें 2024 में सेरामपुर की एक विशेष अदालत ने 20 साल की जेल की सजा सुनाई थी।

अदालत ने माना कि एक विशेष लोक अभियोजक की नियुक्ति (जिसने पहले अपीलकर्ता की अलग रह रही पत्नी का प्रतिनिधित्व किया था) करने से पक्षपात का स्पष्ट खतरा पैदा हुआ था। अपीलकर्ता की पत्नी इस मामले में एक महत्वपूर्ण गवाह है और दिगल के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 498ए (घरेलू हिंसा) के तहत एक विरोधी मामले में शिकायतकर्ता है।

अलग रह रही पत्नी और उनका बेटा बलात्कार के मामले में अभियोजन पक्ष के गवाह थे।

पीठ ने कहा कि वकील जॉयदीप मुखर्जी को अधीनस्थ अदालत के समक्ष कार्यवाही से विशेष लोक अभियोजक के रूप में खुद को अलग कर लेना चाहिए था।

उच्च न्यायालय ने निर्देश दिया कि यदि मुखर्जी के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्यवाही शुरू की जाती है, तो पश्चिम बंगाल बार काउंसिल यह सुनिश्चित करेगी कि दिगल को अभियोजक के आचरण के संबंध में गवाही देने और सबूत पेश करने का पूरा और निष्पक्ष अवसर दिया जाए, क्योंकि अपीलकर्ता ही वह प्राथमिक व्यक्ति है जिसकी स्वतंत्रता और प्रतिष्ठा उपरोक्त हितों के टकराव से प्रभावित हुई है।

दिगल को बरी करते हुए खंड पीठ ने कहा कि अभियोजन पक्ष के गवाहों की जिरह ने अभियोजन पक्ष के मामले को स्पष्ट रूप से ध्वस्त कर दिया है, जो कथित पीड़ित लड़की, उसकी बड़ी बहन (जो इस मामले में शिकायतकर्ता थी) और अपीलकर्ता की अलग रह रही पत्नी और उसके बेटे के ‘पक्षपातपूर्ण बयान’ पर आधारित है।

भाषा संतोष माधव

माधव


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