आईआईटी मद्रास के अध्ययन में खुलासा, वित्तीय साइबर अपराध के शिकार शिक्षित पेशेवर भी

आईआईटी मद्रास के अध्ययन में खुलासा, वित्तीय साइबर अपराध के शिकार शिक्षित पेशेवर भी

आईआईटी मद्रास के अध्ययन में खुलासा, वित्तीय साइबर अपराध के शिकार शिक्षित पेशेवर भी
Modified Date: September 29, 2026 / 02:15 pm IST
Published Date: September 29, 2026 2:15 pm IST

चेन्नई, 29 सितंबर (भाषा) आईआईटी मद्रास के शोधकर्ताओं के एक अध्ययन में पाया गया है कि देश में वित्तीय साइबर अपराध के शिकार लोग अक्सर उच्च शिक्षित पेशेवर होते हैं। यह अध्ययन इस धारणा को चुनौती देता है कि साइबर ठगी के शिकार लोग मुख्य रूप से लापरवाह, वित्तीय रूप से अनजान या लालची होते हैं।

संस्थान की ओर से मंगलवार को जारी एक विज्ञप्ति के अनुसार अध्ययन में पाया गया कि अधिक डिजिटल साक्षरता भी लोगों को साइबर धोखाधड़ी से पूरी तरह सुरक्षित नहीं रखती।

अध्ययन के अनुसार, साइबर अपराध के पीड़ितों में आईटी पेशेवर, बैंकर, डॉक्टर, प्रबंधन और वित्त क्षेत्र के विशेषज्ञ, सार्वजनिक क्षेत्र के अधिकारी तथा साइबर सुरक्षा प्रमाणपत्र रखने वाले लोग भी शामिल थे।

विज्ञप्ति में कहा गया कि भारत में मोबाइल की लगभग सार्वभौमिक पहुंच, यूपीआई और व्यापक डिजिटल इंडिया अभियान के कारण एक दशक के भीतर पहली बार डिजिटल वित्त सेवाओं का इस्तेमाल करने वाले करोड़ों लोग जुड़े हैं। इससे निवेश और शेयर कारोबार से जुड़ी धोखाधड़ी, टास्क एवं नौकरी के नाम पर ठगी, डिजिटल भुगतान धोखाधड़ी, मैलवेयर हमलों और विशेष रूप से भारत में सामने आए ‘‘डिजिटल अरेस्ट’’ जैसे अपराधों के लिए जोखिम का दायरा बढ़ा है।

भारतीय साइबर अपराध समन्वय केंद्र (आई4सी) के आधिकारिक आंकड़े लेनदेन संबंधी उल्लंघनों को दर्ज करते हैं, लेकिन इनके पीछे लोगों को होने वाली मानसिक पीड़ा को नहीं दर्शाते। इसी कारण शोधकर्ताओं ने तकनीकी पहलू के बजाय मानवीय पहलू को समझने का प्रयास किया।

शोधकर्ताओं ने पाया कि ठग अक्सर बीमारी, परिवार में परेशानी, सेवानिवृत्ति, नौकरी की तलाश या कार्यस्थल के दबाव जैसे तनावपूर्ण समय में लोगों को निशाना बनाते हैं।

अध्ययन के अनुसार, ठगों ने डर, आर्थिक अपेक्षाओं और प्रतिष्ठा संबंधी चिंताओं का इस्तेमाल कर पीड़ितों को ऐसी स्थिति में पहुंचाया, जिसे शोधकर्ताओं ने ‘‘इंजीनियर्ड ब्रेन फ्रीज’’ बताया। पीड़ितों ने इसे ऐसी ‘‘मानसिक गिरफ्त’’ की स्थिति बताया, जिसमें वे स्पष्ट रूप से सोचने की क्षमता खो बैठे।

अध्ययन में कहा गया कि वित्तीय नुकसान कुछ हजार रुपये से लेकर एक करोड़ रुपये से अधिक तक रहा, जबकि पीड़ितों ने शर्मिंदगी, अनिद्रा, अवसाद और परिवार में भरोसा कम होने जैसी समस्याओं की भी जानकारी दी।

शोध में यह भी पाया गया कि संस्थागत प्रतिक्रिया अलग-अलग रही। कुछ बैंकों और साइबर अपराध इकाइयों ने तेजी से कार्रवाई की, जबकि कुछ के पास जरूरी तकनीकी क्षमता और समन्वय की कमी थी।

यह अध्ययन चेन्नई, बेंगलुरु, हैदराबाद, नयी दिल्ली और मुंबई के 33 पीड़ितों—22 पुरुष और 11 महिलाओं, जिनमें 12 वरिष्ठ नागरिक शामिल थे—से किए गए साक्षात्कार पर आधारित है। ये साक्षात्कार अंग्रेजी, हिंदी और तमिल में किए गए।

शोध को आईआईटी मद्रास के वाधवानी स्कूल ऑफ डेटा साइंस एंड आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का समर्थन मिला।

वाधवानी स्कूल ऑफ डेटा साइंस एंड आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, आईआईटी मद्रास के प्रोफेसर नंदन सुदर्शनम ने कहा, ‘‘हमारे निष्कर्ष बताते हैं कि वित्तीय साइबर अपराध केवल डिजिटल साक्षरता की कमी की समस्या नहीं है। ठग डर, तनाव और जल्दबाजी जैसी स्थितियों का फायदा उठाकर उच्च शिक्षित और डिजिटल रूप से अनुभवी लोगों को भी निशाना बना सकते हैं।’’

आईआईटी मद्रास के डेटा साइंस एवं आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस विभाग तथा प्रबंधन अध्ययन विभाग के सहायक प्रोफेसर पी. कंदास्वामी (आईपीएस सेवानिवृत्त) ने कहा कि साइबर अपराध से निपटने का तरीका पीड़ितों को दोष देने तक सीमित नहीं होना चाहिए।

उन्होंने कहा कि बैंकों और कानून प्रवर्तन एजेंसियों को शुरुआती पहचान, त्वरित हस्तक्षेप और बेहतर समन्वय के लिए मजबूत व्यवस्था के साथ-साथ पीड़ितों को बेहतर सहायता उपलब्ध कराने की जरूरत है।

भाषा मनीषा वैभव

वैभव


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