संवैधानिक लोकतंत्र में बार और बेंच एक-दूसरे के पूरक, प्रतिस्पर्धी नहीं : पूर्व सीजेआई गवई
संवैधानिक लोकतंत्र में बार और बेंच एक-दूसरे के पूरक, प्रतिस्पर्धी नहीं : पूर्व सीजेआई गवई
नयी दिल्ली, 10 मई (भाषा) पूर्व प्रधान न्यायाधीश बी आर गवई ने रविवार को कहा कि बार एसोसिएशन और न्यायपालिका उस रथ के दो पहिये हैं जिस पर राज्य की जवाबदेही टिकी है और यदि एक भी पहिया लड़खड़ाता है, तो पूरी संरचना का संतुलन बिगड़ने लगता है।
श्रीलंका बार एसोसिएशन के 52वें वार्षिक दीक्षांत समारोह को संबोधित करते हुए पूर्व सीजेआई ने कहा कि एक स्वतंत्र न्यायपालिका अलग-थलग होकर काम नहीं करती है और बार (अधिवक्ता) और बेंच (अदालत) मिलकर संवैधानिक लोकतंत्र के वादे को अक्षुण्ण रखते हैं।
न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) गवई ने कहा, ‘‘संवैधानिक लोकतंत्र में बार और बेंच दो अलग-अलग या प्रतिस्पर्धी संस्थाएं नहीं हैं। वे एक-दूसरे के पूरक हैं। जैसा कि मैंने अपने संबोधनों में अक्सर कहा है, वे उस स्वर्ण रथ के दो पहिए हैं जिस पर राज्य की जवाबदेही टिकी है। यदि एक भी पहिया लड़खड़ाता है, तो पूरी संरचना का संतुलन बिगड़ने लगता है।’’
उन्होंने कहा कि वकील समाज की नैतिक और राजनीतिक परिकल्पना को आकार देते हैं, और भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन को महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, सरदार वल्लभभाई पटेल और बी आर अंबेडकर जैसे कानून में प्रशिक्षित व्यक्तियों द्वारा महत्वपूर्ण रूप से आकार दिया गया था।
उन्होंने कहा कि एक स्वतंत्र बार दबावों का विरोध करता है, ज्यादतियों को चुनौती देता है, संवैधानिक दलील की संस्कृति को बनाए रखता है और उन लोगों के लिए आवाज उठाता है जिनकी आवाज अन्यथा नहीं सुनी जाती।
न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्ति)गवई ने कहा कि बार एसोसिएशन एक पेशेवर विशेषाधिकार नहीं बल्कि एक संवैधानिक आवश्यकता है और यदि न्यायपालिका संविधान की संरक्षक है, तो बार एसोसिएशन उसका सतर्क सहयोगी है।
उन्होंने कहा, ‘‘भारत और श्रीलंका दोनों के अनुभव से यह स्पष्ट होता है कि संवैधानिक लोकतंत्र की मजबूती केवल संवैधानिक पाठ या संस्थागत संरचना पर ही निर्भर नहीं करती। यह एक स्वतंत्र, सतर्क और सक्रिय बार की उपस्थिति पर भी समान रूप से निर्भर करती है।’’
भाषा धीरज नरेश
नरेश

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