भारत-जर्मनी के बीच आर्थिक संबंध बढ़ रहे हैं, मजबूत मध्यस्थता तंत्र की जरूरत: सीजेआई सूर्यकांत

भारत-जर्मनी के बीच आर्थिक संबंध बढ़ रहे हैं, मजबूत मध्यस्थता तंत्र की जरूरत: सीजेआई सूर्यकांत

भारत-जर्मनी के बीच आर्थिक संबंध बढ़ रहे हैं, मजबूत मध्यस्थता तंत्र की जरूरत: सीजेआई सूर्यकांत
Modified Date: August 27, 2026 / 07:18 pm IST
Published Date: August 27, 2026 7:18 pm IST

नयी दिल्ली, 27 अगस्त (भाषा) भारत और जर्मनी के बीच मजबूत और बढ़ते आर्थिक संबंधों को रेखांकित करते हुए प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत ने बृहस्पतिवार को कहा कि अंतरराष्ट्रीय व्यापार में भरोसे की जरूरत है और एक मजबूत मध्यस्थता व्यवस्था भरोसेमंद माहौल बना सकती है।

बर्लिन, जर्मनी में आयोजित ‘इंडो-जर्मन आर्बिटरेशन कॉन्क्लेव’ में, सीजेआई सूर्यकांत ने कहा कि वाणिज्यिक गतिविधियों में विवाद होना एक स्वाभाविक बात है लेकिन ऐसा होने का यह मतलब नहीं है कि विश्वास खत्म हो गया है।

उन्होंने कहा, ‘‘असली बात यह है कि क्या कानूनी व्यवस्था कोई भरोसेमंद तरीका देती है जिससे वाणिज्यिक रिश्ते को नुकसान पहुंचाए बिना मतभेदों को सुलझाया जा सके?’’

प्रधान न्यायाधीश ने कहा कि मध्यस्थता समझौता किसी अनुबंध में सिर्फ एक प्रक्रिया से जुड़ी शर्त नहीं है, बल्कि यह भविष्य के मतभेदों को सुलझाने के तरीके के प्रति एक प्रतिबद्धता है।

उन्होंने कहा, ‘‘भारत और जर्मनी के बीच एक मजबूत और बढ़ती हुई आर्थिक साझेदारी है। भारत में जर्मन निवेश कई अहम क्षेत्र में फैला हुआ है, वहीं भारतीय कंपनियां भी तेजी से जर्मन बाजार में कदम रख रही हैं। जैसे-जैसे ये संबंध और गहरे और बेहतर हो रहे हैं, इनसे जुड़े अनुबंध भी अधिक जटिल होते जा रहे हैं।’’

उन्होंने कहा कि लंबे समय के लिए आपूर्ति के समझौते, अवसंरचना परियोजना, प्रौद्योगिकी समझौता, संयुक्त उद्यम और सीमा-पार निवेश से ऐसे सवाल उठते हैं जिनका समाधान हमेशा सिर्फ बातचीत से नहीं हो पाता।

उन्होंने खास मध्यस्थता संस्थाओं, वकीलों और उतनी ही अहमियत रखने वाली उन अदालतों की जरूरत पर ज़ोर दिया जो मध्यस्थता की प्रक्रिया में मदद करती हैं।

प्रधान न्यायाधीश ने कहा कि संस्थाओं पर भरोसा रातों-रात नहीं बनता, बल्कि यह लगातार काम करने, पेशेवर ईमानदारी और लगातार जुड़े रहने से बनता है।

उन्होंने कहा, ‘‘मध्यस्थता की विश्वसनीयता न्यायिक संयम और सभी पक्षों की इच्छा के सम्मान पर निर्भर करती है।’’

भाषा सुभाष नरेश

नरेश


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