भारत में क्रोध और प्रतिशोध का बोलबाला है, क्षमा का अभाव है: गोपाल कृष्ण गांधी
भारत में क्रोध और प्रतिशोध का बोलबाला है, क्षमा का अभाव है: गोपाल कृष्ण गांधी
(माणिक गुप्ता)
जयपुर, 16 जनवरी (भाषा) पश्चिम बंगाल के पूर्व राज्यपाल गोपाल कृष्ण गांधी ने समकालीन भारत की चिंताजनक तस्वीर पेश करते हुए कहा कि अब सार्वजनिक चर्चा में ‘‘क्रोध, प्रतिशोध और बदले की भावना’’ हावी है।
बृहस्पतिवार को जयपुर साहित्य महोत्सव के 19वें संस्करण में गांधी ने यह टिप्पणी की।
‘द अनडाइंग लाइट: ए पर्सनल हिस्ट्री ऑफ इंडिपेंडेंट इंडिया’ के लेखक ने शांत लेकिन गंभीर लहजे में कहा ‘‘ आज भारत में सबसे प्रबल भावना क्रोध और प्रतिशोध की है। एक-दो पीढ़ी पहले ऐसा नहीं था। प्रतिद्वंदी के साथ लगभग टकराने की इच्छा अब एक प्रमुख भावना बन गई है।’’
उन्होंने कहा कि समाचार पत्रों में ‘स्लैम’ शब्द का बार-बार इस्तेमाल होता है जो बदलाव दर्शाता है।
उन्होंने कहा, ‘‘हमारे वक्त में ‘स्लैम’, ‘स्कैम’ और ‘स्पैम’ तीन प्रमुख शब्द बन गए हैं।’’
पश्चिम बंगाल के पूर्व राज्यपाल ने कहा, ‘‘ जो शब्द आप सबसे ज्यादा पढ़ते हैं, वह है ‘आलोचना’ – ‘ममता ने अमित शाह की आलोचना की’, ‘अमित शाह ने ममता की आलोचना की’, ‘टीएमसी ने कांग्रेस की आलोचना की’, ‘कांग्रेस ने भाजपा की आलोचना की’। आलोचना, आलोचना, आलोचना… अगर आलोचना कोई बिक्री का सामान होता, तो आज यह सबसे तेज़ी से बिकने वाले उत्पादों में से एक होता।’’
उनकी इस बात पर वहां मौजूद श्रोताओं ने खूब तालियां बजाईं और सहमति में सिर हिलाया।
गांधी ने आगाह करते हुए कहा कि, ‘‘प्रतिशोध और घृणा संबंधी हैं’’ और शत्रुता सार्वजनिक राय और राय निर्माण के क्षेत्र में आसानी से बिकने वाली वस्तु के रूप में उभरी है।
अपनी बात को विस्तार से समझाते हुए उन्होंने कहा, ‘‘हिंदी का शब्द ‘बदला’ अब एक और आम शब्द बन गया है और हम अक्सर सुनते हैं- ‘हम बदल लेंगे, बदल लेंगे’। लेकिन सुर्खियों में छाए शब्दों से परे, सार्वजनिक और निजी दोनों तरह के संवादों में ईमानदारी, माफी और क्षमा का भाव खो गया है।’’
उन्होंने कहा, ‘‘ हमने आखिरी बार कब किसी को यह कहते सुना था, ‘मुझसे गलती हो गई’?। गलतियां तो होती हैं लेकिन बहुत कम लोग उन्हें स्वीकार करते हैं। और कितने समय पहले हमने किसी को यह कहते सुना था, ‘मैं तुम्हें माफ करता हूं’? मुझे हाल के दिनों में ऐसा कहते हुए कोई याद नहीं आ रहा।’’
उन्होंने कहा कि समकालीन समाज में ‘भोला’ होना अक्सर कमजोर होने की निशानी माना जाता है।
यह महोत्सव 19 जनवरी को समाप्त होगा।
भाषा शोभना मनीषा
मनीषा

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