जगती: तीन दशक से अधिक के ‘निर्वासन’ के बीच रोजमर्रा की मुश्किलों से जूझती एक जर्जर बस्ती
जगती: तीन दशक से अधिक के ‘निर्वासन’ के बीच रोजमर्रा की मुश्किलों से जूझती एक जर्जर बस्ती
(सुमीर कौल)
जगती (जम्मू), दो अगस्त (भाषा) हर सुबह जागते ही तोताराम भट जगती स्थित विस्थापित कश्मीरी पंडितों की बस्ती के पास मौजूद एक छोटी पहाड़ी को निहारने लगते हैं और सोचते हैं कि यही वह पहाड़ी है जो दक्षिण कश्मीर के अनंतनाग जिले में स्थित उनके पैतृक गांव की सीमा तय करती थी।
पिछले महीने उनका निधन हो गया। लेकिन जीवन के अंतिम समय में उन्हें पूरा विश्वास हो गया था कि वह आखिरकार कश्मीर घाटी स्थित अपने घर लौट आए हैं।
जगती स्थित बस्ती जम्मू-कश्मीर की शीतकालीन राजधानी जम्मू से लगभग 30 किलोमीटर दूर स्थित है।
हालांकि, जगती इलाके की इस बस्ती में तोताराम भट की कहानी कोई अकेली कहानी नहीं है। वहां करीब तीन दशक तक रहने वाले अनेक विस्थापित कश्मीरी पंडित (जिनमें मधुसूदन जुत्शी और जंकीनाथ भट भी शामिल हैं) अपने जीवन के अंतिम वर्षों में डिमेंशिया और अल्जाइमर जैसी भूलने की बीमारियों से जूझते रहे। वे घाटी में अपने पुराने घरों की यादों और विस्थापन की कठोर वास्तविकता के बीच उलझे रहे।
लंबे और अंतहीन इंतजार के बाद उनका निधन हो गया, लेकिन वे कभी अपने घर वापस नहीं लौट सके।
अधिवक्ता विश्व रंजन पंडिता के अनुसार, 1989-90 में कश्मीर घाटी में आतंकवाद फैलने के बाद हुए सामूहिक पलायन के पश्चात जगती इलाके में रह रहे कश्मीरी पंडितों की त्रासदी अब राज्य की ओर से दिखाई गई उपेक्षा के खिलाफ एक लंबी लड़ाई का रूप ले चुकी है।
उन्होंने कहा कि लगभग 2010 के आसपास इस बस्ती का निर्माण विस्थापितों को अधिक सुरक्षित और सम्मानजनक आवास उपलब्ध कराने के उद्देश्य से किया गया था, लेकिन आज यह जर्जर होता इलाका अधूरे वादों का प्रतीक बनकर रह गया है।
कश्मीरी पंडितों के प्रमुख संगठन ‘पनुन कश्मीर’ ने भी विस्थापित समुदाय के लिए बनाए गए आवासों के रखरखाव में विभिन्न सरकारों की ‘विफलता’ का हवाला देते हुए कानूनी कार्रवाई की तैयारी शुरू कर दी है।
‘पनुन कश्मीर’ के अध्यक्ष टीटो गंजू ने कहा कि जगती स्थित बस्ती और अन्य शिविरों की बदहाल स्थिति ने ‘कश्मीरी हिंदू नरसंहार’ के पीड़ितों और जीवित बचे लोगों के पुनर्वास को एक गंभीर सार्वजनिक सुरक्षा का मुद्दा बना दिया है। उन्होंने कहा कि हर मानसून के साथ एक ऐसी आपदा का खतरा और बढ़ जाता है जिसे टाला जा सकता था।
गंजू ने बताया कि राहत विभाग की इंजीनियरिंग शाखा को समाप्त करने से महत्वपूर्ण परियोजनाओं की निगरानी गंभीर रूप से प्रभावित हुई है।
उन्होंने कहा, ‘‘हम इंजीनियरिंग शाखा की तत्काल पुनर्स्थापना, तत्काल मरम्मत और सभी आवासीय ब्लॉकों की संरचनात्मक सुरक्षा समीक्षा की मांग कर रहे हैं, यदि ऐसा नहीं किया गया, तो ‘पनुन कश्मीर’ उच्च न्यायालय से उचित हस्तक्षेप की अपील करेगा।’’
इस बस्ती में 24 इमारतों में दो कमरों वाले 4,242 फ्लैट हैं और लगभग 5,600 परिवारों को आवास प्रदान करते हैं।
प्रत्येक परिवार के पास 495 वर्ग फुट की एक इकाई है जिसमें एक बेडरूम, एक रसोईघर और एक लॉबी शामिल है। गंभीर भीड़भाड़ और परिवारों के बढ़ते आकार के बावजूद, लगभग 80 फ्लैट अब भी खाली हैं और बस्ती में मौजूद 200 व्यावसायिक दुकानों में से आधे से अधिक का आवंटन कभी नहीं हुआ।
स्थानीय लोगों का कहना है कि इमारतें तेजी से जर्जर हो रही हैं, इमारतों का बाहरी प्लास्टर उखड़ रहा है जबकि अंदर की दीवारों से लगातार पानी का रिसाव हो रहा है। मानसून के दौरान स्थिति और भी खराब हो जाती है जब छतों से पानी टपकने के कारण अंदर गंभीर जलभराव हो जाता है।
श्रीनगर के रैनावारी में जन्मे और महालेखाकार कार्यालय के सेवानिवृत्त अधिकारी टी. के. कौल (72) ने कहा, ‘‘सरकार ने अपने वादे पूरे नहीं किए। पिछले दस वर्षों में हमारी एक भी शिकायत पर ध्यान नहीं दिया गया है, इसलिए हमारी स्थिति दयनीय है।’’
उन्होंने कहा, ‘‘बार-बार अनुरोध करने के बाद अधिकारियों ने क्षतिग्रस्त दरवाजे तो बदल दिए, लेकिन काम घटिया ढंग से किया गया और घटिया सामग्री का इस्तेमाल किया गया। छतें टपकती हैं, इमारतों की तत्काल मरम्मत की आवश्यकता है, और हमारे ब्लॉक में चार महीने से पीने का पानी नहीं है।’’
यह अब अनवरत जारी रहने वाली कई पीढ़ियों की पीड़ा बन गई है। मूल रूप से बिजबेहरा के निवासी तेज कृष्ण कौल (52) ने नौकरशाही की उस भयावह स्थिति का वर्णन किया, जिसने उनके परिवार को मुश्किल में डाल दिया है। कश्मीर में गोलीबारी में अपने भाई को खोने वाले कौल को एक मकान दिया गया था।
कौल ने कहा, ‘‘तीन साल पहले अधिकारियों ने मेरे दस्तावेज इस आधार पर ले लिए कि मेरा पंजीकरण केवल अस्थायी था। मैं अपनी पत्नी, तीन बच्चों और अपनी बूढ़ी मां के साथ रहता हूं, और हमारे पास आय का कोई स्रोत नहीं है। मैंने हर जगह सहायता मांगी है, लेकिन मेरी अपीलों को अनसुना कर दिया गया।’’
कार्यकर्ताओं और समुदाय के नेताओं का दावा है कि राजनीतिक दलों ने विस्थापित समुदाय को महज एक राजनीतिक हथियार बना दिया है।
बस्ती में रह रहे और पेशे से दुकानदार विजय कुमार उर्फ अप्पू ने कहा, ‘‘राजनीतिक दल हमें वोट बैंक के रूप में इस्तेमाल कर रहे हैं, लेकिन हमारे पुनर्वास के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाए जा रहे हैं।’’
उन्होंने कहा, ‘‘रोजमर्रा की हमारी सबसे बुनियादी समस्यायों ṁ(जैसे इमारतों की मरम्मत, पानी की कमी और अनियमित बिजली आपूर्ति) को पूरी तरह नजरअंदाज किया जा रहा है। पूरी बस्ती में गहरी निराशा का माहौल है।’’
कुपवाड़ा जिले के हंदवाड़ा के रहने वाले और 1990 में पलायन करने वाले सामुदायिक कार्यकर्ता सुनील पंडिता ने कहा, ‘‘भगवान राम का वनवास 14 वर्ष तक चला था, जबकि हमें अपने घरों से दूर हुए 36 वर्ष हो चुके हैं और हमारी पीड़ा का अंत होता नहीं दिख रहा है।’’
पंडिता ने कहा कि संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) सरकार ने आवास परियोजना शुरू की थी और 2009 में विस्थापितों के लिए 6,000 नौकरियों के पैकेज की घोषणा भी की थी लेकिन इसके बाद आई कई सरकारों ने प्रधानमंत्री पैकेज के लाभार्थियों के लिए कश्मीर में बनाए जाने वाले ट्रांजिट आवासों पर कोई ठोस काम नहीं किया।
निवासियों का आरोप है कि पानी और बिजली जैसी बुनियादी सुविधाओं की मांग को लेकर किए जाने वाले उनके शांतिपूर्ण प्रदर्शनों से भी सख्ती से निपटा जाता है। उन्होंने कहा कि महंगाई के अनुरूप सरकारी वित्तीय सहायता में भी बढ़ोतरी नहीं की गई है।
वर्तमान में राहत पाने वाले प्रत्येक पंजीकृत लाभार्थी को हर महीने नौ किलोग्राम चावल और 3,200 रुपये नकद सहायता दी जाती है। निवासियों का कहना था कि यह राशि बुनियादी जीवन-यापन, स्वास्थ्य देखभाल और शिक्षा का खर्च उठाने के लिए पर्याप्त नहीं है।
पिछले नौ वर्षों से यहां रह रहे बी. जे. भट ने कहा, ‘‘लोग मदद के लिए सरकार की ओर देखते हैं, लेकिन हाल के समय में उनकी एक भी समस्या का समाधान नहीं हुआ है। हम उस कांग्रेस सरकार के आभारी हैं जिसने सबसे पहले फ्लैट उपलब्ध कराए और राहत उपाय शुरू किए, लेकिन मौजूदा प्रशासन ने हमें पूरी तरह निराश किया है।’’
इस संबंध में अधिकारियों से प्रतिक्रिया लेने के प्रयास सफल नहीं हो सके। समुदाय में व्याप्त गहरी निराशा को दर्शाते हुए कुछ लोगों ने अपने अधिवक्ता विश्व रंजन पंडिता के माध्यम से राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) में याचिका दायर की है।
याचिका में कहा गया है कि यदि सरकार उनकी समस्याओं का समाधान नहीं कर सकती, तो उन्हें रोज-रोज की इस पीड़ा में जीने के लिए छोड़ने के बजाय उसकी ओर से उन्हें शीघ्र मृत्यु दे दिया जाना अधिक मानवीय होगा।
याचिका में आवासीय इकाइयों की संरचनात्मक खामियों, लगातार होने वाले जल रिसाव और अस्वच्छ परिस्थितियों का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि मरम्मत के लिए अलग बजट नहीं होने का हवाला देकर इन गंभीर समस्याओं की पांच वर्षों से अधिक समय से अनदेखी की जा रही है।
याचिका में संपर्क व्यवस्था से जुड़ी गंभीर समस्याओं का भी उल्लेख किया गया है। विशेष रूप से नगरोटा और जगती को जोड़ने वाली महत्वपूर्ण सड़क का जिक्र करते हुए कहा गया है कि पिछले आठ वर्षों से इस सड़क पर बड़े-बड़े और खतरनाक गड्ढे बरकरार हैं।
निवासियों का दावा था कि उनके साथ भेदभावपूर्ण व्यवहार किया गया है। उनका कहना है कि पिछले विधानसभा चुनाव के बाद जम्मू की अधिकांश सड़कों का तेजी से पुनर्निर्माण किया गया, लेकिन धन की कथित कमी का हवाला देकर उनकी जीवनरेखा मानी जाने वाली नगरोटा-जगती सड़क की लगातार अनदेखी की गई।
याचिका में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) से तत्काल हस्तक्षेप करने, संबंधित अधिकारियों को तलब करने तथा भविष्य में किसी और जनहानि को रोकने के लिए सभी फ्लैट की तत्काल मरम्मत कराने और नगरोटा-जगती सड़क का शीघ्र पुनर्निर्माण कराने का निर्देश देने की मांग की गई है।
भाषा संतोष नरेश
नरेश

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