चेन्नई, 28 जुलाई (भाषा) तमिलनाडु के मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय ने मंगलवार को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से कहा कि प्रस्तावित मेकेदातु बांध परियोजना के संबंध में राज्यसभा में केंद्र सरकार की ओर से दिया गया यह जवाब ‘‘निराशाजनक’’ है कि उच्चतम न्यायालय के फैसले में कर्नाटक के लिए तटवर्ती राज्यों की सहमति लेना अनिवार्य नहीं बताया गया है।
मुख्यमंत्री विजय ने प्रधानमंत्री को लिखे पत्र में आग्रह किया कि जल शक्ति राज्य मंत्री द्वारा 27 जुलाई, 2026 को राज्यसभा में (अतारांकित प्रश्न संख्या 876 के) उत्तर में अंतरराज्यीय जल विवादों से जुड़े स्थापित कानूनों और कानूनी सिद्धांतों का उल्लेख किए बिना दिया गया जवाब वापस लिया जाए।
उन्होंने कहा कि कर्नाटक-आंध्र प्रदेश आलमट्टी मामले में उच्चतम न्यायालय ने स्पष्ट रूप से कहा है कि किसी भी परियोजना के लिए निचले तटवर्ती राज्य की सहमति पूरी तरह आवश्यक है।
विजय ने प्रधानमंत्री से आग्रह किया कि यह सुनिश्चित किया जाए कि मेकेदातु बांध परियोजना को तब तक कोई वैधानिक या प्रशासनिक मंजूरी नहीं दी जाए, जब तक वह कावेरी जल विवाद न्यायाधिकरण (सीडब्ल्यूडीटी) के फैसले और उच्चतम न्यायालय के निर्णय के अनुरूप ना हो।
मुख्यमंत्री विजय ने कहा कि मंत्री ने संसद के ऊपरी सदन में कहा कि कावेरी जल विवाद के संबंध में उच्चतम न्यायालय के दिनांक 16.02.2018 के निर्णय के अनुसार, कर्नाटक राज्य को कावेरी नदी पर किसी भी प्रकार की संरचना के निर्माण के लिए अन्य तटीय राज्यों की सहमति
प्राप्त करने का कोई उल्लेख नहीं है।
विजय ने कहा, ‘जल शक्ति राज्य मंत्री का यह निराशाजनक जवाब निचले तटवर्ती राज्यों की सहमति से जुड़ी मौजूदा कानूनी व्यवस्थाओं और स्थापित कानून को ध्यान में रखे बिना दिया गया प्रतीत होता है।’
उन्होंने कहा कि कावेरी जल विवाद न्यायाधिकरण के फैसले के संबंध में, उच्चतम न्यायालय ने न्यायाधिकरण के फैसले के खंड-18 को स्पष्ट रूप से बरकरार रखा है। उन्होंने कहा कि इस खंड में प्रत्येक राज्य को अपने क्षेत्र के भीतर जल के नियमन का अधिकार दिया गया है, लेकिन यह केवल ‘‘उसी तरीके से इस्तेमाल किया जा सकता है जो न्यायाधिकरण के आदेश के विपरीत ना हो।’’
उन्होंने कहा कि इस प्रकार ऐसी किसी भी परियोजना, जिससे न्यायाधिकरण के फैसले के तहत निर्धारित जल प्रवाह व्यवस्था प्रभावित होने की संभावना हो, उसकी समीक्षा यह सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक है कि वह फैसले के अनुरूप है या नहीं।
मुख्यमंत्री ने कहा कि न्यायाधिकरण ने स्वयं कई महत्वपूर्ण सिद्धांत तय किए हैं। उन्होंने कहा कि केरल की पंबर जलविद्युत परियोजना के मामले में, जिसमें केवल 0.1 टीएमसी जल उपयोग शामिल था, न्यायाधिकरण ने निर्देश दिया था कि केरल और तमिलनाडु संयुक्त रूप से जल छोड़ने की समय-सारणी तय करें ताकि निचले क्षेत्रों की सिंचाई प्रतिकूल तौर पर प्रभावित ना हो।
उन्होंने कहा कि इससे स्पष्ट होता है कि न्यायाधिकरण ने केवल वार्षिक जल मात्रा को ही नहीं, बल्कि निचले तटवर्ती राज्यों के हितों को प्रभावित करने वाले जल प्रवाह के समन्वित नियमन को भी अत्यधिक महत्व दिया था।
विजय ने कहा कि फैसले का खंड-11 विशेष रूप से किसी ऊपरी तटवर्ती राज्य को ऐसी कार्रवाई करने से रोकता है, जिससे निचले राज्यों को निर्धारित जल आपूर्ति प्रभावित हो, जब तक कि नियामक प्राधिकार के साथ आपसी सहमति और परामर्श ना हो।
उन्होंने कहा कि खंड-20 में भी यह माना गया है कि न्यायाधिकरण के फैसले में बदलाव केवल संबंधित राज्यों के बीच सहमति से ही किया जा सकता है।
मुख्यमंत्री ने कहा कि तमिलनाडु का स्पष्ट मत है कि प्रस्तावित मेकेदातु परियोजना को केवल एक इंजीनियरिंग परियोजना के रूप में नहीं देखा जा सकता। उन्होंने कहा कि इसकी कानूनी वैधता की पहले कावेरी जल विवाद न्यायाधिकरण के अंतिम फैसले और 16 फरवरी 2018 के उच्चतम न्यायालय के निर्णय के संदर्भ में पड़ताल की जानी चाहिए।
उन्होंने कहा कि निचले तटवर्ती राज्यों के अधिकारों को भी ध्यान में रखना होगा। उन्होंने कहा कि यह महत्वपूर्ण है कि कर्नाटक द्वारा 2019 में जमा की गई विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (डीपीआर) को केंद्रीय जल आयोग ने न्यायाधिकरण के फैसले और लागू दिशा-निर्देशों के अनुपालन के लिए समीक्षा हेतु वापस कर दिया था।
विजय ने कहा, ‘यह स्वयं दर्शाता है कि न्यायाधिकरण के फैसले का अनुपालन एक अनिवार्य पूर्व शर्त है।’
मुख्यमंत्री ने इस पृष्ठभूमि में संसद में केंद्रीय मंत्री द्वारा दिए गए जवाब को वापस लेने की मांग की। इसके अलावा, मुख्यमंत्री ने मोदी से आग्रह किया कि यह सुनिश्चित किया जाए कि निचले तटवर्ती राज्यों के अधिकारों की पूरी तरह रक्षा हो, जिसमें उन्हें मिलने वाली जल की मात्रा और जल छोड़ने के निर्धारित नियमन दोनों शामिल हैं।
उन्होंने कहा कि परियोजना पर भविष्य में कोई भी विचार सभी निचले तटवर्ती राज्यों की चिंताओं को ध्यान में रखते हुए व्यापक तकनीकी और कानूनी पड़ताल के बाद ही किया जाना चाहिए।
विजय ने कहा, ‘‘कावेरी नदी केवल पानी का स्रोत नहीं है, बल्कि दक्षिण भारत के लाखों किसानों और नागरिकों की जीवनरेखा है। अंतरराज्यीय नदियों के लिए संवैधानिक व्यवस्था में विश्वास बनाए रखने के लिए न्यायाधिकरण के फैसले और उच्चतम न्यायालय के निर्णय की मूल भावना की रक्षा करना आवश्यक है।’’
केंद्रीय मंत्री का यह जवाब ऐसे समय आया है जब कावेरी मुद्दे को लेकर तमिलनाडु के मुख्यमंत्री और उनके कर्नाटक के समकक्ष डी.के. शिवकुमार के बीच बैठक की संभावनाएं जताई जा रही थीं।
इस बीच, किसान संगठनों और विभिन्न दलों के नेताओं ने ऐसी बैठक और कावेरी मुद्दे पर बातचीत का विरोध किया है। उनका कहना है कि इससे इस मामले में तमिलनाडु के अधिकारों को स्थापित करने में मदद नहीं मिलेगी।
भाषा अमित नरेश
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