न्यायिक व्यवस्था पक्षकारों के बीच हिसाब-किताब चुकता करने का माध्यम नहीं : न्यायालय
न्यायिक व्यवस्था पक्षकारों के बीच हिसाब-किताब चुकता करने का माध्यम नहीं : न्यायालय
नयी दिल्ली, 21 अगस्त (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने एक वकील और उसकी पूर्व मुवक्किल के आचरण पर कड़ी नाराजगी जताई, जिन्होंने केवल अपनी प्रतिष्ठा की खातिर न्यायपालिका का 11 साल से अधिक का समय व्यर्थ कर दिया।
न्यायालय ने कहा कि न्यायिक व्यवस्था पक्षकारों के हाथ में ऐसा साधन नहीं है, जिसका इस्तेमाल वे आपसी हिसाब-किताब चुकता करने के लिए करें।
न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने कहा कि दोनों पक्षों ने महत्वपूर्ण तथ्यों और दस्तावेजों को छिपाया तथा (वे) अदालत के समक्ष ईमानदारी पूर्वक नहीं पेश आए।
पीठ ने कहा, “इन दोनों पक्षों में से प्रत्येक हमारे सामने अपने साथ हुए अन्याय की शिकायत लेकर आया है, जबकि उस अन्याय के एक बड़े हिस्से के लिए वे खुद जिम्मेदार हैं। दोनों ने मिलकर भारतीय विधिज्ञ परिषद, एक उच्च न्यायालय और इस अदालत का 11 साल तक का समय लिया। यह समय उन अन्य वादियों का था, जो वास्तव में जरूरी राहत मिलने का इंतजार कर रहे थे। हम दोनों के आचरण पर अपनी कड़ी असहमति दर्ज करते हैं।”
इस मामले में एक महिला ने दावा किया कि वर्ष 2013 में अपने भाई के साथ विवाद के बाद वह मलाड पुलिस थाने गई थी, जहां उसकी मुलाकात एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी से हुई।
महिला का आरोप था कि अधिकारी ने उसकी मदद करने के बहाने उससे संपर्क बनाए रखा और बाद में उसका यौन उत्पीड़न करने का प्रयास किया।
महिला ने दावा कि इस मामले में वह एक वकील के पास गई और बातचीत के दौरान उसने अपने निजी जीवन से जुड़ी गोपनीय जानकारियां तथा अपने पास मौजूद ऐसे दस्तावेज और सामग्री वकील के साथ साझा की, जो उसके आरोपों से संबंधित थीं।
महिला ने वकील पर पेशेवर कदाचार का आरोप लगाते हुए शिकायत की कि उसने उसकी सहमति के बिना मुवक्किल से संबंधित गोपनीय जानकारी मीडिया के सामने उजागर कर दी और एक सार्वजनिक नोटिस भी जारी कर दिया। इसके बाद महिला ने भारतीय विधिज्ञ परिषद में शिकायत की, जिसने वकील के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्यवाही शुरू की।
अनुशासन समिति ने वकील को पेशेवर कदाचार का दोषी पाया और उसका लाइसेंस दो साल के लिए निलंबित कर दिया। साथ ही वकील को शिकायतकर्ता महिला को तीन लाख रुपये और भारतीय विधिज्ञ परिषद को दो लाख रुपये देने का निर्देश दिया गया।
इसके बाद दोनों पक्षों ने अनुशासन समिति के इस आदेश को बंबई उच्च न्यायालय और फिर उच्चतम न्यायालय में चुनौती दी।
शीर्ष अदालत ने अपने आदेश में दोनों पक्षों पर पांच-पांच लाख रुपये का जुर्माना लगाया और निर्देश दिया कि यह राशि शुक्रवार से चार सप्ताह के भीतर उच्चतम न्यायालय की विधिक सेवा समिति के पास जमा कराई जाए।
भाषा संतोष सुरेश
सुरेश

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