न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा ने आरोपों की जांच के लिए जांच समिति गठित किए जाने की आलोचना की

न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा ने आरोपों की जांच के लिए जांच समिति गठित किए जाने की आलोचना की

न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा ने आरोपों की जांच के लिए जांच समिति गठित किए जाने की आलोचना की
Modified Date: January 7, 2026 / 03:01 pm IST
Published Date: January 7, 2026 3:01 pm IST

नयी दिल्ली, सात जनवरी (भाषा) इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायाधीश यशवंत वर्मा ने अपने खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच के लिए लोकसभा अध्यक्ष द्वारा जांच समिति का गठन किए जाने का बुधवार को उच्चतम न्यायालय में विरोध किया।

न्यायमूर्ति वर्मा की पैरवी वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने की और उन्होंने न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और सतीश चंद्र शर्मा की पीठ को न्यायाधीश (जांच) अधिनियम, 1968 के प्रावधानों का हवाला देते हुए बताया कि यदि महाभियोग प्रस्ताव लोकसभा और राज्यसभा में एक ही दिन एक साथ पेश किए जाते हैं तो जांच समिति का गठन दोनों सदनों द्वारा संयुक्त रूप से किया जाना चाहिए।

वरिष्ठ अधिवक्ता ने कहा कि मौजूदा मामले में, राज्यसभा में प्रस्ताव रद्द कर दिया गया था और लोकसभा अध्यक्ष ने जांच समिति का गठन किया था जो कानून की दृष्टि से ‘अस्तित्वहीन’ है।

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रोहतगी ने राज्यसभा के उपसभापति द्वारा उस प्रस्ताव को खारिज किए जाने के फैसले की भी आलोचना की, जिसे पहले उच्च सदन के अध्यक्ष ने स्वीकार कर लिया था।

रोहतगी ने कहा कि सवाल यह है कि क्या लोकसभा अध्यक्ष एकतरफा रूप से जांच समिति का गठन कर सकते हैं, जबकि दोनों सदनों में एक ही दिन प्रस्ताव पेश किए गए थे, लेकिन उन्हें केवल एक सदन में ही स्वीकार किया गया था।

वरिष्ठ वकील ने न्यायाधीश (जांच) अधिनियम की धारा 3(2) के तहत लोकसभा अध्यक्ष द्वारा तीन सदस्यीय समिति के गठन पर सवाल उठाया और यह तर्क दिया कि यह संविधान के अनुच्छेद 124(5) के तहत अनिवार्य प्रक्रिया का उल्लंघन करता है।

रोहतगी ने कहा कि किसी न्यायाधीश को हटाने के लिए संसद को अधिनियम के तहत निर्धारित प्रक्रिया का सख्ती से पालन करना चाहिए, जिसके लिए लोकसभा के कम से कम 100 सदस्यों या राज्यसभा के 50 सदस्यों द्वारा हस्ताक्षरित प्रस्ताव की आवश्यकता होती है।

एक बार ऐसा प्रस्ताव स्वीकार हो जाने पर एक समिति का गठन किया जाएगा जो एक प्रकार से विभागीय कार्यवाही के समान होगी।

पीठ का ध्यान आकर्षित करते हुए रोहतगी ने इस बात पर जोर दिया कि न्यायमूर्ति वर्मा के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव संसद के दोनों सदनों में एक ही दिन यानी 21 जुलाई 2025 को पेश किए गए थे।

प्रावधानों का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि जब दोनों सदनों में एक ही दिन प्रस्तावों के नोटिस दिए जाते हैं, तो कोई समिति तब तक गठित नहीं की जाएगी जब तक कि प्रस्ताव दोनों सदनों में स्वीकार न हो जाए।

ऐसी स्थिति में अधिनियम में लोकसभा अध्यक्ष और राज्यसभा अध्यक्ष द्वारा एक संयुक्त समिति के गठन का प्रावधान है।

रोहतगी ने कहा, ‘‘मौजूदा मामले में एक प्रस्ताव खारिज कर दिया गया। इसलिए, उसके बाद गठित समिति कानून की दृष्टि से अमान्य है।’’

हालांकि, पीठ ने सवाल उठाया कि क्या एक सदन में किसी प्रस्ताव की अस्वीकृति दूसरे सदन में शुरू की गई कार्यवाही को स्वतः ही अमान्य कर देगी।

लोकसभा द्वारा दायर हलफनामे का हवाला देते हुए रोहतगी ने कहा कि राज्यसभा के उपसभापति ने 11 अगस्त को प्रस्ताव को खारिज कर दिया था, जबकि लोकसभा अध्यक्ष ने 12 अगस्त को समिति का गठन किया था।

पीठ ने कहा कि अधिनियम में स्पष्ट रूप से यह नहीं कहा गया है कि यदि एक सदन किसी प्रस्ताव को अस्वीकार कर देता है, तो दूसरा सदन कार्यवाही करने से वंचित हो जाएगा।

न्यायमूर्ति दत्ता ने पूछा, ‘राज्यसभा की ओर से प्रस्ताव को अस्वीकार किए जाने की स्थिति में लोकसभा द्वारा समिति नियुक्त करने के प्रावधान के तहत रोक कहां है?’

मामले में सुनवाई फिलहाल जारी है।

भाषा शोभना नरेश

नरेश


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