कर्नाटक के मंत्री खरगे ने सरकार का पूरा अभिभाषण पढ़ने से इनकार करने पर राज्यपाल की आलोचना की

कर्नाटक के मंत्री खरगे ने सरकार का पूरा अभिभाषण पढ़ने से इनकार करने पर राज्यपाल की आलोचना की

कर्नाटक के मंत्री खरगे ने सरकार का पूरा अभिभाषण पढ़ने से इनकार करने पर राज्यपाल की आलोचना की
Modified Date: January 22, 2026 / 10:45 am IST
Published Date: January 22, 2026 10:45 am IST

बेंगलुरु, 22 जनवरी (भाषा) कर्नाटक के मंत्री प्रियंक खरगे ने राज्यपाल थावरचंद गहलोत की आलोचना करते हुए उन पर विधानसभा के इस वर्ष के पहले सत्र में सरकार का पूरा अभिभाषण पढ़ने से इनकार कर ‘‘संवैधानिक प्रावधानों का उल्लंघन’’ करने का बृहस्पतिवार को आरोप लगाया।

मंत्री ने सोशल मीडिया मंच ‘एक्स’ पर एक ‘पोस्ट’ में कहा कि यह बेहद खेदजनक है कि राज्यपाल सरकार का भाषण पूरा नहीं पढ़ने का विकल्प चुन रहे हैं जबकि संविधान इस बारे में स्पष्ट है।

कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के पुत्र प्रियंक खरगे ने कहा, ‘‘संविधान के अनुच्छेद 176 के तहत राज्यपाल को वर्ष के पहले सत्र में विधानसभा को संबोधित करना होता है और यह अभिभाषण निर्वाचित सरकार का नीतिगत वक्तव्य होता है, न कि उनके व्यक्तिगत विचार। इसे मंत्रिमंडल तैयार करता है और संवैधानिक रूप से उनसे अपेक्षा की जाती है कि वह इसे निर्धारित दिशा-निर्देशों के अनुसार प्रस्तुत करें।’’

सूचना प्रौद्योगिकी एवं जैव प्रौद्योगिकी विभाग का प्रभार संभाल रहे खरगे ने कहा कि पूरा भाषण नहीं पढ़ना अनुच्छेद 176 का उल्लंघन है और यह उस अनुच्छेद 163 के भी खिलाफ है जिसके तहत राज्यपाल को मंत्रिपरिषद की सहायता और सलाह पर कार्य करना होता है।

उन्होंने कहा कि संबंधित अभिभाषण पूरी तरह तथ्यों पर आधारित है और कर्नाटक सरकार की आधिकारिक स्थिति को दर्शाता है।

खरगे ने कहा कि कर्नाटक को उसके हक के धन से वंचित किए जाने और सहकारी संघवाद के टूटने का मुद्दा मुख्यमंत्री ने प्रधानमंत्री के समक्ष बार-बार उठाया है।

उन्होंने कहा, ‘‘इसके बावजूद सरकार ने संवैधानिक मर्यादा एवं पद की गरिमा का ध्यान रखते हुए यह संदेश दिया कि अगर वास्तविक चिंताएं हैं तो भाषा में सीमित बदलाव पर विचार किया जा सकता है लेकिन पूरे हिस्से हटाने पर जोर देना स्वीकार्य नहीं है और यह कर्नाटक के लोगों के हितों के खिलाफ है।’’

खरगे ने आरोप लगाया कि गहलोत की यह कार्रवाई पक्षपातपूर्ण हस्तक्षेप के अलावा कुछ नहीं है तथा यह राज्यपाल के पद की संवैधानिक भूमिका एवं निष्पक्षता को कमजोर करती है और ‘‘इससे यह गंभीर सवाल उठता है कि वास्तव में फैसले कौन कर रहा है।’’

सरकारी सूत्रों ने बताया कि राज्यपाल केंद्र सरकार के ‘विकसित भारत – रोजगार एवं आजीविका गारंटी मिशन (ग्रामीण)’ पर नकारात्मक टिप्पणियों से नाखुश थे। यह योजना महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) की जगह शुरू की गई है।

सूत्रों ने ‘पीटीआई-भाषा’ को बताया कि गहलोत चाहते थे कि इस विषय से संबंधित दो पैराग्राफ हटा दिए जाएं जबकि सरकार उन्हें बरकरार रखने पर अडिग रही।

उन्होंने कहा कि राज्य सरकार दो वाक्य हटाने पर सहमत हो गई, जिनमें वह वाक्य भी शामिल है जिसमें कहा गया कि विकसित भारत-जी राम जी से भ्रष्टाचार बढ़ेगा लेकिन अब भी यह स्पष्ट नहीं है कि राज्यपाल ने इसे स्वीकार किया है या नहीं।

भाषा

सिम्मी वैभव

वैभव


लेखक के बारे में

******** Bottom Sticky *******