विचाराधीन कैदी को जेल में रखना दंडात्मक हिरासत जैसा न हो: न्यायालय
विचाराधीन कैदी को जेल में रखना दंडात्मक हिरासत जैसा न हो: न्यायालय
नयी दिल्ली, 29 सितंबर (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने मंगलवार को कहा कि विचाराधीन कैदी को जेल में रखना दंडात्मक हिरासत का रूप नहीं ले सकता, खासकर तब जब मुकदमे की शुरुआत और समापन निकट न हो।
न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति शील नागू की पीठ ने राजस्थान में लोक स्वास्थ्य अभियांत्रिकी विभाग (पीएचईडी) के भीतर कथित वित्तीय अनियमितताओं से संबंधित 2024 के एक मामले में दो आरोपियों को जमानत देते हुए उपरोक्त टिप्पणी की।
शीर्ष अदालत ने कहा कि मामले में कार्यवाही अभी प्रारंभिक चरण में है और आरोपों को साबित करने के लिए प्रस्तुत किए जाने वाले साक्ष्यों की व्यापकता को ध्यान में रखते हुए साफ है कि मुकदमे की प्रक्रिया लंबी चलने वाली है।
न्यायालय ने कहा, “यह आपराधिक न्यायशास्त्र का एक भली-भांति स्थापित सिद्धांत है कि विचाराधीन कैदी का कारावास दंडात्मक हिरासत का रूप नहीं ले सकता, विशेष रूप से तब जब मुकदमे का आरंभ और समापन निकट भविष्य में होने वाला न हो।”
पीठ ने कहा, “जब किसी मुकदमे का निकट भविष्य में उचित रूप से निष्कर्ष निकाला जाना संभव न हो, तो भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार की रक्षा के लिए इस न्यायालय को हस्तक्षेप करना होगा।”
न्यायालय ने संजय बडाया और शुभांशु दीक्षित द्वारा दायर दो अलग-अलग याचिकाओं पर यह आदेश पारित किया, जिन्होंने मामले में नियमित जमानत की मांग करने वाली अपनी अर्जियों को खारिज करने वाले राजस्थान उच्च न्यायालय के आदेशों को चुनौती दी थी।
पीठ ने कहा कि मामले में कथित अनियमितताएं “जल जीवन मिशन” के क्रियान्वयन से संबंधित हैं, जो केंद्र और राज्य सरकारों की एक महत्वाकांक्षी संयुक्त पहल है।
न्यायालय ने कहा कि दोनों अपीलकर्ताओं के संबंध में जांच पूरी हो चुकी थी, आरोपपत्र दाखिल किए जा चुके थे और अभियोजन पक्ष का मामला मुख्य रूप से दस्तावेजी अभिलेखों और इलेक्ट्रॉनिक लेन-देन की कड़ियों को जोड़ने पर आधारित है।
पीठ ने कहा, “चूंकि ये सामग्री पहले ही जब्त कर ली गई है और जांच एजेंसी की सुरक्षित अभिरक्षा में है, इसलिए साक्ष्यों के साथ छेड़छाड़ की आशंका काफी हद तक समाप्त हो जाती है।”
अपीलों को स्वीकार करते हुए, पीठ ने क्रमशः एक जून और 13 अगस्त के उच्च न्यायालय के आदेशों को रद्द कर दिया।
पीठ ने स्पष्ट किया कि उच्चतम न्यायालय ने आरोपों के गुण-दोष, अपीलकर्ताओं को सौंपे गए विशिष्ट दायित्वों या अभिलेखों के साक्ष्यात्मक मूल्य पर कोई राय व्यक्त नहीं की है।
भाषा प्रशांत अविनाश
अविनाश

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