ममता गुट ने निर्वाचन आयोग को जवाब सौंपा, बागी गुट के दावे को फर्जी बताया

ममता गुट ने निर्वाचन आयोग को जवाब सौंपा, बागी गुट के दावे को फर्जी बताया

ममता गुट ने निर्वाचन आयोग को जवाब सौंपा, बागी गुट के दावे को फर्जी बताया
Modified Date: July 6, 2026 / 08:46 pm IST
Published Date: July 6, 2026 8:46 pm IST

नयी दिल्ली, छह जुलाई (भाषा) पश्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले तृणमूल कांग्रेस के गुट ने सोमवार को निर्वाचन आयोग को अपना जवाब सौंपते हुए पार्टी पर प्रतिद्वंद्वी गुट के दावे को ‘‘फर्जी’’ करार दिया और कहा कि पार्टी संविधान के अनुसार दल की संगठनात्मक समितियां वर्ष 2027 तक वैध हैं।

निर्वाचन आयोग को जवाब सौंपने के बाद संवाददाताओं से बात करते हुए तृणमूल सांसद कल्याण बनर्जी ने कहा कि पार्टी ने बागी नेता ऋतब्रत बनर्जी की ओर से दिए गए प्रतिवेदन के जवाब में निर्वाचन आयोग को ‘‘बहुत विस्तृत उत्तर’’ दाखिल किया है।

उन्होंने बागी गुट के इस प्रमुख दावे को खारिज कर दिया कि अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस(एआईटीसी) की समिति और राष्ट्रीय कार्य समिति का कार्यकाल वर्ष 2025 में समाप्त हो गया था।

लोकसभा सदस्य बनर्जी ने कहा कि पार्टी संविधान में समय-समय पर संशोधन किए गए हैं। उन्होंने कहा कि वर्ष 2000 में कार्यकाल तीन वर्ष से बढ़ाकर चार वर्ष तथा वर्ष 2006 में पांच वर्ष कर दिया गया था और इन संशोधनों की जानकारी निर्वाचन आयोग को भी दी गई थी।

उन्होंने बताया, ‘‘पिछला संगठनात्मक चुनाव वर्ष 2022 में हुआ था। इसलिए तृणमूल समिति और राष्ट्रीय कार्यकारी समिति का कार्यकाल स्वतः पांच वर्ष का है। यह वर्ष 2027 में समाप्त होगा।’’

उन्होंने कहा कि समिति का कार्यकाल वर्ष 2025 में समाप्त होने का आरोप ‘‘गलत है और पार्टी के संवैधानिक प्रावधानों से समर्थित नहीं है।’’

बनर्जी ने यह भी कहा कि बागी नेताओं ने स्वयं मौजूदा पार्टी नेतृत्व के अधिकार को स्वीकार किया था क्योंकि उन्होंने वर्ष 2026 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में टीएमसी के चुनाव चिह्न पर चुनाव लड़ा था और उनके नामांकन पत्रों पर पार्टी अध्यक्ष ममता बनर्जी के हस्ताक्षर थे।

उन्होंने कहा, ‘‘यदि उनका कहना है कि पार्टी वर्ष 2025 के बाद अस्तित्व में नहीं रही तो फिर उन्होंने किस आधार पर चुनाव लड़ा? उनके अपने तर्क के अनुसार उनका चुनाव अवैध हो जाएगा। उन्हें तत्काल इस्तीफा दे देना चाहिए।’’

तृणमूल नेता ने यह भी आरोप लगाया कि बागी गुट ने 22 जून को आयोजित ‘‘विशेष अधिवेशन’’ में पार्टी संगठन के पुनर्गठन का जो दावा किया, वह अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस के संविधान का उल्लंघन है।

उन्होंने कहा कि पार्टी संविधान के अनुसार संगठनात्मक प्रक्रिया की शुरुआत ब्लॉक स्तर से होती है। इसके बाद जिला और राज्य समितियों का गठन किया जाता है और फिर एआईटीसी समिति का गठन होता है।

उनका आरोप था कि बागी गुट ने इन प्रक्रियाओं का पालन नहीं किया तथा मीडिया में अनिवार्य सार्वजनिक सूचना जारी करने और सांसदों एवं विधायकों को नोटिस देने जैसी आवश्यक औपचारिकताएं भी पूरी नहीं कीं।

बनर्जी ने कहा, ‘‘न तो मीडिया में कोई सूचना जारी की गई, न ही उचित तरीके से जानकारी प्रसारित की गई और न ही पदेन सदस्यों को कोई नोटिस दिया गया। उनके द्वारा गठित कथित एआईटीसी स्वयं एआईटीसी संविधान के साथ एक बड़ा छल है।’’

तृणमूल सांसद ने प्रतिद्वंद्वी गुट की कार्रवाई को ‘‘पूरी तरह फर्जी’’ बताते हुए कहा कि बागियों द्वारा अपनाई गई प्रक्रिया पूरी तरह से अवैध है तथा पार्टी संविधान के विपरीत है।

उन्होंने यह आरोप भी लगाया कि यह गुट राज्य प्रशासन के सहयोग से अवैध तरीके से पार्टी कार्यालयों पर नियंत्रण करने की कोशिश कर रहा है।

तृणमूल ने अपने जवाब में पार्टी के वर्ष 1997 में गठन से लेकर अब तक के इतिहास का उल्लेख करते हुए कहा है कि वर्ष 2000 में पार्टी का नाम ‘अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस’ (एआईटीसी) किए जाने से पहले तत्कालीन ‘पश्चिम बंगाल तृणमूल कांग्रेस’ को ‘घास और फूल’ चुनाव चिह्न आवंटित किया गया था।

पार्टी का कहना है कि उसकी मान्यता, संविधान और संगठनात्मक ढांचा निर्वाचन आयोग के संज्ञान में लगातार आता रहा है तथा पदाधिकारियों का कार्यकाल बढ़ाकर पांच वर्ष किए जाने संबंधी संशोधनों पर आयोग ने कभी कोई आपत्ति नहीं जताई।

जवाब में यह भी कहा गया है कि निर्वाचन आयोग ने स्वयं इसी वर्ष पार्टी से फरवरी में संविधान की नवीनतम प्रति प्राप्त करने के बाद संशोधित पार्टी संविधान को स्वीकार किया था। इसलिए बागी गुट का यह दावा तथ्यात्मक और कानूनी रूप से उचित नहीं है कि वर्ष 2025 में पार्टी की समितियां अस्तित्व में नहीं रहीं।

तृणमूल ने अपने जवाब में विधानसभा के पहले के उदाहरणों का हवाला देते हुए कहा है कि विपक्ष के नेता को मान्यता मूल राजनीतिक दल की सिफारिश के आधार पर दी जाती है, न कि स्वतंत्र रूप से कार्य कर रहे किसी विधायक दल की अनुशंसा पर।

पार्टी ने ऐसे पूर्व मामलों का भी उल्लेख किया है, जिनमें विधानसभा अध्यक्ष ने पार्टी नेतृत्व द्वारा अनुशंसित नामों को स्वीकार किया था।

पार्टी ने यह भी कहा कि चुनाव के बाद बागी विधायक स्वयं विधानसभा अध्यक्ष के पास जाकर ‘अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस’ विधायक दल के रूप में मान्यता की मांग कर चुके हैं।

तृणमूल के अनुसार, इससे उन्होंने मूल संगठन के निरंतर अस्तित्व को स्वयं स्वीकार किया था। पार्टी का कहना है कि यह रुख निर्वाचन आयोग के समक्ष बाद में किए गए उस दावे के विपरीत है, जिसमें कहा गया कि पार्टी का संगठन अस्तित्व में नहीं रहा।

जवाब में तृणमूल ने कहा है कि बागी गुट द्वारा आयोग को सौंपे गए दस्तावेज अधिकृत नहीं थे और उन्हें अस्वीकार किया जाना चाहिए।

निर्वाचन आयोग ने ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले टीएमसी गुट और ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाले प्रतिद्वंद्वी गुट, दोनों से पार्टी के अधिकृत हस्ताक्षरकर्ताओं और संगठनात्मक चुनावों को लेकर अपने-अपने दावे और प्रतिदावे प्रस्तुत करने को कहा था।

यह विवाद तब और गहरा गया जब बागी गुट ने पिछले सप्ताह निर्वाचन आयोग की पूर्ण पीठ से मुलाकात कर दावा किया कि वही ‘‘असली’’ एआईटीसी का प्रतिनिधित्व करता है। वहीं, ममता बनर्जी गुट ने आयोग द्वारा उन नेताओं को सुनवाई का अवसर दिए जाने पर सवाल उठाया जिन्हें वह पहले ही पार्टी से निष्कासित बता चुका है।

भाषा हक प्रशांत

प्रशांत


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