न्यायिक सेवा की प्रवेश स्तरीय परीक्षा के लिए वकालत का अनिवार्य अनुभव घटाकर एक साल किया गया

न्यायिक सेवा की प्रवेश स्तरीय परीक्षा के लिए वकालत का अनिवार्य अनुभव घटाकर एक साल किया गया

न्यायिक सेवा की प्रवेश स्तरीय परीक्षा के लिए वकालत का अनिवार्य अनुभव घटाकर एक साल किया गया
Modified Date: August 21, 2026 / 07:28 pm IST
Published Date: August 21, 2026 7:28 pm IST

नयी दिल्ली, 21 अगस्त (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने मई 2025 के अपने फैसले में संशोधन करते हुए न्यायिक सेवा की प्रवेश स्तरीय परीक्षा में शामिल होने के लिए वकालत के अनिवार्य अनुभव को तीन साल से घटाकर शुक्रवार को एक साल कर दिया।

भारत के प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति ए. जी. मसीह एवं न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन की पीठ ने 2:1 के बहुमत से दिए गए निर्णय में कहा कि हालांकि चयनित उम्मीदवारों को न्यायिक अकादमी में प्रशिक्षण लेना होगा और इसके बाद एक वर्ष का अतिरिक्त न्यायिक प्रशिक्षण (क्लर्कशिप) लेना होगा।

पिछले साल 20 मई को भारत के तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश बी.आर. गवई की अध्यक्षता वाली पीठ ने विधि से स्नातक की पढ़ाई करने वाले नये विद्यार्थियों को न्यायिक सेवा की प्रवेश स्तरीय परीक्षा में बैठने से रोक दिया था और इसके लिए कम से कम तीन साल के वकालत के अनुभव की शर्त तय की थी।

शुक्रवार को प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन न्यायाधीशों की पीठ ने 2:1 के बहुमत वाले मई 2025 के फैसले में बदलाव किया। पीठ ने न्यायिक अधिकारी बनने की इच्छा रखने वाले विधि स्नातक विद्यार्थियों को अनिवार्य रूप से तीन साल तक वकालत करने की शर्त में ढील देकर राहत प्रदान की।

पीठ ने कहा, ‘‘तीन वर्ष की वकालत की अनिवार्यता के बावजूद, सभी विधि स्नातक आवेदन करने के पात्र होंगे। चूंकि जिस फैसले की समीक्षा की जा रही है, उसके सुनाए जाने के बाद एक वर्ष से अधिक का समय बीत चुका है, इसलिए आवेदन के समय ऐसे अभ्यर्थियों के बारे में यह माना जाएगा कि वे एक वर्ष की सक्रिय वकालत पूरी कर चुके हैं।’’

शीर्ष अदालत ने कहा कि उक्त मानी गई अवधि के समर्थन में उन्हें अलग से वकालत का प्रमाणपत्र प्रस्तुत करने की आवश्यकता नहीं होगी।

पीठ ने कहा कि ऐसे उम्मीदवारों को चयन के बाद एक वर्ष के लिए केवल प्रशिक्षु न्यायिक अधिकारी के रूप में नियुक्त किया जाएगा और इसके बाद उन्हें एक वर्ष का निर्धारित न्यायिक प्रशिक्षण लेना होगा।

शीर्ष अदालत ने कहा कि इस तरह के प्रशिक्षण की अवधि के दौरान प्रशिक्षु न्यायिक अधिकारियों को निश्चित मानदेय दिया जाएगा, जो संबंधित राज्य में प्रथम श्रेणी के न्यायिक मजिस्ट्रेट को देय पारिश्रमिक का आधा होगा।

पीठ ने कहा, ‘‘इसके अलावा वे संबंधित राज्य न्यायिक अकादमी में प्रशिक्षुओं को आम तौर पर उपलब्ध कराई जाने वाली सुविधाओं और अन्य लाभों के भी हकदार होंगे।’’

पीठ ने कहा कि उक्त प्रशिक्षण सफलतापूर्वक पूरा करने के बाद प्रशिक्षु न्यायिक अधिकारियों को एक वर्ष की संरचित ‘लॉ क्लर्कशिप’ करनी होगी।

शीर्ष अदालत ने कहा कि इस अवधि के पहले छह महीने प्रधान जिला न्यायाधीश या जिला एवं सत्र न्यायाधीश अथवा उच्च न्यायिक सेवा के सदस्यों की निगरानी में ‘लॉ क्लर्क’ के रूप में बिताने होंगे, जबकि शेष छह महीने संबंधित उच्च न्यायालय के किसी मौजूदा न्यायाधीश की निगरानी में बिताने होंगे।

शीर्ष अदालत ने कहा कि तीन साल की वकालत की शर्त को अचानक बहाल करने और बीच की अवधि के लिए कोई व्यवस्था न किए जाने से युवा वकीलों और विधि स्नातकों को कठिनाई हुई है, इसलिए सीमित हस्तक्षेप जरूरी है।

उसने कहा कि एक अप्रैल 2027 के बाद अधिसूचित होने वाली परीक्षाओं के अभ्यर्थियों पर नयी व्यवस्था लागू होगी।

उच्चतम न्यायालय ने मई 2025 के अपने उस फैसले को चुनौती देने वाली पुनरीक्षण याचिकाओं पर यह निर्णय सुनाया, जिसमें सिविल जज (जूनियर डिवीजन) के पद पर सीधी भर्ती के जरिये न्यायिक सेवा में प्रवेश के इच्छुक अभ्यर्थियों के लिए तीन साल की वकालत अनिवार्य की गई थी।

प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत ने बहुमत का फैसला सुनाते हुए कहा कि पीठ को पहले के फैसले के इस मूल आधार में हस्तक्षेप का कोई कारण नजर नहीं आता कि न्यायपालिका में शामिल होने से पहले अभ्यर्थी को कानूनी पेशे का कुछ अनुभव होना चाहिए।

हालांकि, पीठ ने कहा कि पूर्व अनुभव की शर्त का उचित आधार होना चाहिए और इससे युवा अधिवक्ताओं को कठिनाई नहीं होनी चाहिए। उसने स्पष्ट किया कि पूर्व अनुभव की अनिवार्यता के संबंध में पहले के फैसले पर पुनर्विचार की जरूरत नहीं है।

उच्चतम न्यायालय ने इस मामले में दायर पुनरीक्षण याचिकाओं और रिट याचिकाओं पर 28 जुलाई को अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था।

शीर्ष अदालत ने 13 मार्च को सभी उच्च न्यायालयों से सिविल जज (जूनियर डिवीजन) के पदों के लिए आवेदन जमा करने की अंतिम तारीख 30 अप्रैल तक बढ़ाने को कहा था।

उसने न्यायिक सेवा की प्रवेश स्तर की परीक्षा में शामिल होने के लिए तीन साल के अनुभव की शर्त पर सभी उच्च न्यायालयों, राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालयों और अन्य विधि शिक्षण संस्थानों की राय मांगी थी।

भाषा

संतोष पवनेश

पवनेश


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