पेपर लीक के खिलाफ आंदोलन वर्षों की वामपंथी सक्रियता का ही सिलसिला है : नेहा

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पेपर लीक के खिलाफ आंदोलन वर्षों की वामपंथी सक्रियता का ही सिलसिला है : नेहा

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  • Publish Date - August 2, 2026 / 05:07 PM IST,
    Updated On - August 2, 2026 / 05:07 PM IST

(अंजलि ओझा)

नयी दिल्ली, दो अगस्त (भाषा) आइसा की अध्यक्ष नेहा बोरा का कहना है कि हस्त निर्मित पोस्टरों और जंतर-मंतर से लेकर दूर-दूर तक पहुंचे आकर्षक नारों तक, पेपर लीक के खिलाफ महीने भर चले आंदोलन को वामपंथी छात्र संगठनों ने ही रचनात्मक प्रस्तुति और संगठनात्मक मजबूती दी। उन्होंने तर्क दिया कि यह आंदोलन अचानक हुई कोई राजनीतिक वापसी नहीं, बल्कि कई वर्षों के छात्र संघर्ष का एक स्वाभाविक नतीजा था।

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) की पीएचडी शोधार्थी बोरा ने ‘पीटीआई-भाषा’ को दिए एक साक्षात्कर में कहा कि इस आंदोलन में वाम छात्र संगठनों की भागीदारी, शिक्षा और परीक्षाओं से जुड़े मुद्दों पर वर्षों से चल रहे विरोध-प्रदर्शनों का ही एक ‘‘स्वाभाविक सिलसिला’’ है।

आंदोलन में शामिल वाम संगठनों में आइसा, एसएफआई, एआईएसएफ, क्रांतिकारी युवा संगठन, एआईडीएसओ, पीडीएसयू और अग्रगामी छात्र नौजवान सभा शामिल थे। जंतर-मंतर पर धरने के दौरान इन संगठनों ने पोस्टर बनाने और नारे लिखने से लेकर ‘मॉक कोर्ट’, अस्थायी पुस्तकालय और सांस्कृतिक कार्यक्रमों तक कई तरह की गतिविधियां आयोजित कीं।

बोरा ने कहा, ‘‘मुझे लगता है कि पेपर लीक के खिलाफ तथा सरकार से जवाबदेही की मांग करने वाला यह आंदोलन कई वर्षों से खड़ा हो रहा था। हम कई वर्षों से विरोध-प्रदर्शन कर रहे हैं; हमारे कार्यकर्ताओं के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की गईं, हमें तिहाड़ जेल भेजा गया… चाहे एनटीए मुख्यालय, यूजीसी मुख्यालय या शिक्षा मंत्रालय के बाहर काले झंडे दिखाकर विरोध करना हो, हम लगातार आंदोलन कर रहे थे।’’

उन्होंने कहा, ‘‘इतने सालों से जमा हुआ गुस्सा ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (कॉजपा) के जरिए बाहर आया। अगर वामपंथी संगठन इस विरोध-प्रदर्शन में शामिल नहीं होते, तो हैरानी होती। इस आंदोलन का हिस्सा बनना, कई वर्षों के संघर्ष का एक स्वाभाविक नतीजा था।’’

बोरा ने कहा कि वामपंथियों का योगदान सिर्फ लोगों को इकट्ठा करने तक ही सीमित नहीं था।

ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (आइसा) की अध्यक्ष ने कहा, ‘‘वामपंथी छात्र संगठनों ने इस आंदोलन को आगे बढ़ाया और इसे राजनीतिक विमर्श के जरिये समृद्ध किया। हमने भी अपनी जान जोखिम में डाली और सोनम वांगचुक के साथ भूख हड़ताल पर बैठे।’’

बोरा समेत आइसा के तीन कार्यकर्ताओं ने जंतर-मंतर पर 23 दिनों तक भूख हड़ताल की थी।

बोरा ने कहा कि उनके लिए सबसे बड़ी बात यह थी कि दूसरे लोगों के बीच वामपंथी नारों को खासी लोकप्रियता मिली।

बोरा ने कहा, ‘‘युवाओं ने हमारे नारों और पोस्टरों को बहुत पसंद किया। वे हमारे स्टॉल और पुस्तकालय पर आते थे, पोस्टर उठाते थे और उन्हें साथ ले जाते थे। अगर जंतर-मंतर पर आइसा के 80 या 100 कार्यकर्ता थे, तो पूरे प्रदर्शन स्थल पर 200 से 400 लोग हमारे पोस्टर लिए हुए थे।’’

भाषा शफीक नरेश

नरेश