दुर्गा पूजा के दौरान मांसाहार विवाद का कोई मुद्दा नहीं : दिलीप घोष

दुर्गा पूजा के दौरान मांसाहार विवाद का कोई मुद्दा नहीं : दिलीप घोष

दुर्गा पूजा के दौरान मांसाहार विवाद का कोई मुद्दा नहीं : दिलीप घोष
Modified Date: September 8, 2026 / 03:26 pm IST
Published Date: September 8, 2026 3:26 pm IST

कोलकाता, आठ सितंबर (भाषा) पश्चिम बंगाल के मंत्री दिलीप घोष ने बागेश्वर धाम के महंत धीरेंद्र शास्त्री द्वारा मांसाहार को लेकर दिये गए बयान पर मंगलवार को प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि दुर्गा पूजा के दौरान मांसाहार करना कोई विवाद का मुद्दा नहीं है।

‘बागेश्वर बाबा’ के नाम से मशहूर धीरेंद्र शास्त्री ने बंगालियों से दुर्गा पूजा के दौरान मांसाहार छोड़ने की अपील की थी और धार्मिक मौकों पर मांस खाने वालों को ‘ढोंगी’ बताया था। उनके बयान से बंगाल में विवाद पैदा हो गया था।

सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की राज्य इकाई के नेताओं ने शास्त्री के उक्त बयान से दूरी बना ली है, क्योंकि आशंका है कि इस बयान को बंगाल के पारंपरिक खान-पान की आदतों को तय करने की कोशिश के तौर पर देखा जा सकता है।

घोष ने यहां संवाददाताओं से बातचीत में कहा, ‘‘ बंगाल में दुर्गा पूजा के दौरान बकरे की बलि देने की परंपरा है और उसे प्रसाद के तौर पर ग्रहण किया जाता है। यहां बकरे का मांस खाना कोई विवाद का विषय नहीं है।’’

राज्य के पंचायत और ग्रामीण विकास मंत्री ने कहा, ‘‘मैं स्वयं मछली के अलावा कोई अन्य मांसाहारी व्यंजन नहीं खाता। लेकिन जो कोई भी जो कुछ भी खाना चाहे, उसे इसकी अनुमति होनी चाहिए।’’

भाजपा नेता ने सवाल किया कि क्या बागेश्वर बाबा के पास जाने वाले लोग पूरे यकीन के साथ कह सकते हैं कि वे मछली या मांस नहीं खाते हैं। उन्होंने कहा, ‘‘संत अपने नजरिए से बात करते हैं और कहते हैं कि शाकाहारी भोजन सेहत के लिए अच्छा होता है।’’

घोष ने बंगाल की धार्मिक परंपराओं का उल्लेख करते हुए कहा कि राज्य में पूजा-पाठ के कई रूपों में लंबे समय से मांसाहार शामिल रहा है। उन्होंने कहा, ‘‘स्वामी विवेकानंद ने कहा था कि जब तक यह देश रहेगा, मां काली बकरे का मांस खाती रहेंगी और शिव डमरू बजाते रहेंगे।’’

उन्होंने पूर्ववर्ती तृणमूल कांग्रेस सरकार पर लोगों की खान-पान की पसंद तय करने की कोशिश करने का भी आरोप लगाया।

मंत्री ने कहा, ‘‘तृणमूल यह कहने लगी थी कि यह नहीं खाया जा सकता और वह नहीं खाया जा सकता। उन्होंने साथ ही कहा कि लोगों को अपनी पसंद चुनने की स्वतंत्रता होना चाहिए।

भाजपा नेता से जब सवाल किया गया कि बंगाल में लोगों को दुर्गा पूजा मनाने का तरीका क्यों ‘सिखाया’ जा रहा है, तो उन्होंने कहा कि समय के साथ इस त्योहार की पारंपरिक मान्यताएं कमजोर हुई हैं।

उन्होंने कहा,‘‘बंगाल में अब शायद ही कोई वास्तविक दुर्गा पूजा बची है, इसीलिए लोग ऐसा कह रहे हैं। हम भी इसे दुर्गा पूजा के तौर पर ही देखना चाहते हैं। थीम और दूसरी चीजों के नाम पर सब कुछ बर्बाद हो गया है। बंगाली अपनी संस्कृति भूल गए हैं।’’

घोष ने सामुदायिक पूजा के लिए सरकारी धन के इस्तेमाल की भी आलोचना की और कहा कि यह त्योहार मुख्य रूप से समाज द्वारा आयोजित किया जाना चाहिए।

उन्होंने हालांकि कहा कि सरकार गांवों की उन पूजा समितियों की मदद कर सकती है, जो वास्तव में संसाधनों की कमी का सामना कर रहे हैं।

भाषा धीरज दिलीप

दिलीप


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