नयी दिल्ली, एक जुलाई (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने बुधवार को कहा कि आरोपी को आरोपपत्र की प्रति नहीं दिए जाने को स्वत: जमानत का आधार नहीं बनाया जा सकता।
न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति एन. कोटिश्वर सिंह की पीठ ने आरोपी की स्वत: जमानत याचिका को खारिज करने वाले बम्बई उच्च न्यायालय के आदेश को बरकरार रखते हुए यह बात कही।
आरोपी ने यह कहते हुए जमानत देने का अनुरोध किया था कि उसे आरोपपत्र की प्रति उपलब्ध नहीं कराई गई है।
उच्चतम न्यायालय ने कहा कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) की धारा 193(8) के तहत आरोपपत्र की अतिरिक्त प्रतियां दाखिल नहीं किए जाने से स्वयं आरोपपत्र अमान्य नहीं हो जाता।
उच्चतम न्यायालय ने कहा कि जैसे पहले दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) के तहत व्यवस्था थी, उसी तरह बीएनएसएस के तहत भी स्वत: जमानत का अधिकार तभी बनता होता है, जब लागू प्रावधानों के अनुसार 60 या 90 दिनों की अवधि के भीतर आरोपपत्र दाखिल नहीं किया जाता।
न्यायालय ने कहा, “एक बार बीएनएसएस की धारा 193(3) के तहत निर्धारित प्रारूप के अनुसार आरोपपत्र निर्धारित अवधि के भीतर दाखिल कर दिया जाता है, तो स्वत: जमानत का अधिकार समाप्त हो जाता है। बीएनएसएस की धारा 193(8) का पालन नहीं किए जाने को बीएनएसएस की धारा 187(3) के समान परिणाम देने वाला नहीं माना जा सकता।”
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस), 2023 की धारा 187(3) स्वत: जमानत से संबंधित है।
उच्चतम न्यायालय, केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) द्वारा दर्ज लगभग 3.81 करोड़ रुपये की कथित बड़े पैमाने की साइबर धोखाधड़ी से जुड़े मामले में गिरफ्तार एक आरोपी की याचिका पर सुनवाई कर रहा था।
भाषा जितेंद्र पवनेश
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