सिनेमा केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं होता। कई बार वह समाज के भीतर वर्षों से सुलग रहे आक्रोश, असुरक्षा, न्याय व्यवस्था के प्रति अविश्वास और मानवीय संवेदनाओं को इस तरह पर्दे पर उतार देता है कि दर्शक केवल कहानी नहीं देखता, बल्कि स्वयं को उसके भीतर खड़ा हुआ महसूस करता है। हाल में चर्चित फिल्म ‘धुरंधर’ और विवादों में रही ‘Citizen Vigilante‘ इसी श्रेणी की फिल्में हैं। दोनों की पृष्ठभूमि अलग है, पात्र अलग हैं और सामाजिक संदर्भ भी भिन्न हैं, लेकिन एक प्रश्न दोनों के केंद्र में समान रूप से उपस्थित है—यदि पीड़ित को न्याय मिलने की आशा समाप्त हो जाए, तो उसके भीतर जन्म लेने वाले प्रतिशोध को क्या केवल अपराध कहकर समझा जा सकता है?
‘धुरंधर’ में घटनाएँ उस समय निर्णायक मोड़ लेती हैं, जब एक राजनीतिक रूप से प्रभावशाली परिवार के गुंडे नायक जस्सी के परिवार को बर्बाद कर देते हैं। पिता की हत्या, बहनों पर अत्याचार और छोटी बहन का अपहरण—इन घटनाओं के बाद जस्सी प्रतिशोध के मार्ग पर चल पड़ता है।
फिल्म में हिंसा के अनेक दृश्य हैं, किंतु उनका उद्देश्य केवल रक्तपात दिखाना नहीं, बल्कि उस मानसिक स्थिति को उकेरना है जिसमें एक व्यक्ति अपने भीतर बची हुई समूची संवेदना खो बैठता है।
फिर भी फिल्म का सबसे मार्मिक क्षण हिंसा नहीं, बल्कि वह दृश्य है जब जस्सी अपनी बंधक बनाई गई छोटी बहन तक पहुँचता है। भाई को देखते ही बहन की दबाई हुई चीखें और टूटता हुआ साहस उस दर्द को व्यक्त कर देता है जिसे किसी संवाद की आवश्यकता नहीं होती।
इसी प्रकार अदालत से बाहर आने के बाद जस्सी का अपनी माँ से कहना—”फौज में मरता तो शहीद कहलाता”—और माँ का उसे गले लगाकर “मेरा फौजी बच्चा” कहना, फिल्म के सबसे भावनात्मक दृश्यों में शामिल हो जाता है। यह दृश्य बताता है कि कानून और समाज का निर्णय अपनी जगह है, लेकिन माँ की दृष्टि में उसका बेटा अब भी वही बच्चा है, जिसे उसने अपने संस्कारों के साथ बड़ा किया था।
दूसरी ओर, ‘Citizen Vigilante’ न्याय व्यवस्था से उपजी निराशा को एक अलग सामाजिक संदर्भ में प्रस्तुत करती है। कहानी एक नाबालिग पीड़िता के साथ हुए जघन्य यौन अपराध से आरम्भ होती है। न्यायालय द्वारा आरोपियों को सुधार का अवसर दिए जाने के बाद फिल्म का केंद्रीय पात्र स्वयं न्याय करने का मार्ग चुनता है।
फिल्म में वह केवल अपराधियों से ही नहीं, बल्कि उनके परिवारों और उनकी सोच से भी प्रश्न करता है। अपराध, सांस्कृतिक टकराव, प्रवासन, पारिवारिक मूल्यों और सामाजिक उत्तरदायित्व जैसे विषय कथा के माध्यम से सामने आते हैं।
यद्यपि फिल्म का वैचारिक दृष्टिकोण अत्यंत स्पष्ट है और कई समीक्षकों ने इसे एकतरफा तथा विवादास्पद माना है, फिर भी यह पश्चिमी समाज के एक वर्ग में मौजूद उस असंतोष को अभिव्यक्त करती है, जो अपराध और न्याय व्यवस्था को लेकर लगातार बढ़ता दिखाई देता है।
इन दोनों फिल्मों की सबसे बड़ी समानता यह है कि इनके नायक स्वयं को व्यवस्था द्वारा असहाय महसूस करते हैं। जब संस्थाओं पर विश्वास कमजोर पड़ता है, तब प्रतिशोध उन्हें न्याय का विकल्प दिखाई देने लगता है।
यही कारण है कि दर्शक कई बार पात्रों के क्रोध को समझ तो लेता है, भले ही उनके तरीकों से सहमत न हो।
सिनेमा का कार्य केवल समाधान देना नहीं, बल्कि कठिन प्रश्नों को समाज के सामने रखना भी है। ‘धुरंधर’ और ‘Citizen Vigilante’ यही करती हैं। वे दर्शकों को यह सोचने के लिए विवश करती हैं कि न्याय केवल अदालतों का विषय नहीं, बल्कि समाज के नैतिक विश्वास का भी आधार है। निष्कर्षत: प्रतिशोध की कहानियाँ सदैव आकर्षित करती रही हैं, क्योंकि वे मनुष्य की सबसे तीव्र भावनाओं—दर्द, अपमान, क्रोध और न्याय की आकांक्षा—को एक साथ सामने लाती हैं। किंतु वास्तविक जीवन में न्याय और प्रतिशोध के बीच का अंतर बनाए रखना ही किसी सभ्य समाज की पहचान है।
इसीलिए ऐसी फिल्मों को केवल एक्शन या हिंसा के चश्मे से नहीं, बल्कि उस सामाजिक मनोविज्ञान के दस्तावेज़ के रूप में भी देखा जाना चाहिए, जो व्यवस्था से निराश लोगों के मन में उठ रहे प्रश्नों और आक्रोश को अभिव्यक्ति देता है।
—कैलाश चन्द्र
( लेखक वरिष्ठ स्तंभकार एवं सामाजिक कार्यकर्ता हैं)
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