एनटीए को हर परीक्षा संबंधी समस्याओं का समाधान समझा गया, पर अब इसकी आलोचना हो रही
एनटीए को हर परीक्षा संबंधी समस्याओं का समाधान समझा गया, पर अब इसकी आलोचना हो रही
नयी दिल्ली, 23 अगस्त (भाषा) रिद्धिमा बंसल तीन मई को तपती दोपहर में नीट-यूजी परीक्षा केंद्र से खुशी-खुशी बाहर निकली थीं। उन्हें पूरा भरोसा था कि महीनों की कड़ी तैयारी के बाद वह मेडिकल प्रवेश परीक्षा पास कर लेंगी।
हालांकि कुछ दिन बाद उन्हें बताया गया कि पेपर लीक होने के कारण परीक्षा रद्द कर दी गई है और उन्हें दोबारा परीक्षा देनी होगी।
इस खबर से दुखी हुईं रिद्धिमा अकेली नहीं थीं। 20 लाख से अधिक छात्रों ने राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा-स्नातक(नीट-यूजी) 2026 दी थी, जिनमें से कई को रिद्धिमा की तरह परीक्षा पास करने का पूरा भरोसा था।
कुछ छात्र मानसिक आघात को सहन नहीं कर सके और आत्महत्या कर ली; जबकि कई अन्य छात्र दोबारा उतनी मेहनत से पढ़ाई नहीं कर सके और मेडिकल पाठ्यक्रम में दाखिले की दौड़ में सफल नहीं हो पाए।
परीक्षा कराने वाली राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी (एनटीए) पर स्पष्ट कारणों से काफी सवाल उठे। सरकार की भी कड़ी आलोचना हुई।
परीक्षा रद्द होने के खिलाफ कॉकरोच जनता पार्टी (कॉजपा) के नेतृत्व में जंतर-मंतर पर आंदोलन शुरू हुआ, जिसके बाद देशभर में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हुए।
इसके कारण आखिरकार शिक्षा मंत्री ने इस्तीफा दिया, सार्वजनिक परीक्षाओं में गड़बड़ी रोकने के लिए एक कानून में संशोधन किया गया और व्यवस्था को सुधारने के लिए एक उच्चस्तरीय कार्यबल गठित किया गया।
यह मुद्दा अभी गर्म ही था कि एनटीए एक नए विवाद में फंस गया। इस बार पीएचडी और अन्य शोध संबंधी पाठ्यक्रम के लिए होने वाली यूजीसी-नेट परीक्षा को लेकर एनटीए की आलोचना हो रही है।
कुछ विषयों के टेस्ट पेपर बुनियादी समझ के स्तर पर भी खरे नहीं उतरे। इनमें कई व्याकरण संबंधी, तथ्यात्मक और वर्तनी की गलतियां थीं। कुछ अपुष्ट खबरों के अनुसार ये टेस्ट पेपर कृत्रिम बुद्धिमत्ता की मदद से तैयार किए गए थे।
एक बार फिर परीक्षाएं रद्द कर दी गईं और अगले महीने पुन: परीक्षा कराने का फैसला किया गया। इससे छात्रों को फिर उसी पूरी प्रक्रिया से गुजरना पड़ेगा।
देश में उच्च शिक्षा के लिए दाखिला संबंधी सभी परीक्षाएं कराने वाली एक केंद्रीय एजेंसी के रूप में नवंबर 2017 में जब एनटीए की परिकल्पना की गई थी, तब इसे दशकों से परीक्षा व्यवस्था में चली आ रही सभी समस्याओं के समाधान के रूप में देखा गया था।
उस समय सरकार ने कहा था कि इससे डॉक्टर, इंजीनियर, शोधार्थी आदि बनने की इच्छा रखने वाले करीब 40 लाख छात्रों को लाभ होगा और परीक्षा व्यवस्था में “विश्वसनीयता” आएगी।
एक दशक से भी कम समय बाद एनटीए को शिक्षा क्षेत्र में सबसे बड़ा खलनायक माना जा रहा है।
मेडिकल और इंजीनियरिंग प्रवेश परीक्षाओं से लेकर विश्वविद्यालयों में दाखिले तक एनटीए भारत की परीक्षा व्यवस्था का एक केंद्रीय हिस्सा बन गया है। लेकिन इसकी क्षमता, सुरक्षा व्यवस्था और केंद्रीकृत ढांचे को लेकर उठे सवालों ने वह जिम्मेदारी निभाने की इसकी क्षमता पर सवाल खड़े कर दिए हैं, जो इसे सौंपी गई थी।
यह सवाल भी उठाया जा रहा है कि क्या एक ही केंद्रीय संस्था अलग-अलग और जटिल प्रकृति की परीक्षाओं को प्रभावी ढंग से करा सकती है, जिन पर लाखों परीक्षार्थियों का भविष्य निर्भर करता है।
सरकार की ओर से कहा गया है कि भविष्य की परीक्षाओं को गलती और पेपर लीक से मुक्त बनाने के लिए पहले ही कई कदम उठाए जा चुके हैं।
एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि कई कदम उठाए गए हैं और नंदन नीलेकणि की अध्यक्षता में गठित छह सदस्यीय कार्यबल की सिफारिशों के आधार पर आगे भी कई कदम उठाए जाएंगे।
विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के पूर्व अध्यक्ष एम. जगदीश कुमार ने माना कि एनटीए के कामकाज को लेकर चिंताएं सही हैं।
उन्होंने कहा कि सरकार और एनटीए ने सुधार के लिए कई कदम उठाएं हैं। दीर्घकालिक समाधान लगातार जोखिम का आकलन करना, गोपनीय सामग्री की देखरेख करने वाले लोगों की संख्या कम करना, डिजिटल तरीके से हर गतिविधि का रिकॉर्ड रखना और हर चरण में स्वतंत्र जांच करना है।
कुमार ने कहा कि इन कदमों से धीरे-धीरे गड़बड़ियां करना बहुत मुश्किल बनाया जा सकता है और छात्रों का भरोसा कायम रखा जा सकता है।
उन्होंने माना कि एनटीए पर काम का बोझ बहुत ज्यादा है।
हालांकि कुमार ने कहा कि वह केवल दिखाई देने वाले काम के बोझ को कम करने के लिए परीक्षाओं को कई एजेंसियों के बीच बांटने की सलाह नहीं देंगे।
उन्होंने कहा कि एनटीए को ढांचे के स्तर पर मजबूत करने की जरूरत है, लेकिन इसे खत्म कर देना शायद सबसे उपयोगी समाधान नहीं होगा।
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) के अर्थशास्त्र के प्रोफेसर सूरजित मजूमदार ने इससे अलग राय दी।
उन्होंने कहा कि एक ही एजेंसी के तहत कई परीक्षाएं होने से पेपर लीक में शामिल लोगों का हौसला बढ़ता है।
उन्होंने यह भी कहा कि सभी परीक्षाएं एनटीए कराता है तो काम का बोझ बहुत बढ़ जाता है, खासकर तब जब प्रशासनिक क्षमता सीमित हो।
उन्होंने कहा, “पहले जो संस्थाएं प्रवेश परीक्षाएं कराती थीं, उनके पास दशकों का अनुभव था। एनटीए का ऐसा कोई इतिहास नहीं है। आप सरकार से कुछ लोगों को इस संस्था में नियुक्त करते हैं और उन्हें इतने बड़े स्तर पर परीक्षाएं कराने की कोशिश करनी पड़ती है, जबकि प्रशासनिक व्यवस्था बहुत कमजोर है।”
उन्होंने कहा, “इसलिए ढांचागत रूप से यह कमजोर है, जिसका मतलब है कि आपको बहुत सारी गतिविधियां आउटसोर्स करनी पड़ती हैं। आउटसोर्सिंग से पेपर लीक का जोखिम बढ़ जाता है।”
मजूमदार ने यह भी कहा कि हर चीज का केंद्रीकरण करना उचित नहीं है, क्योंकि भारत एक बहुत बड़ा और विविधतापूर्ण देश है।
जंतर-मंतर पर हुए विरोध प्रदर्शन का प्रमुख चेहरा बनीं छात्र नेता और एआईएसए अध्यक्ष नेहा बोरा ने कहा कि एनटीए का घोषित उद्देश्य और उसकी मौजूदा संरचना एक-दूसरे से स्पष्ट रूप से विरोधाभासी हैं।
उन्होंने कहा, “एक ओर एनटीए का घोषित मिशन अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुसार कुशलतापूर्वक, पारदर्शी व निष्पक्ष मूल्यांकन सुनिश्चित करना है, लेकिन दूसरी ओर पूरे साल करीब 30 राष्ट्रीय स्तर की परीक्षाएं कराने के लिए एनटीए में 25 कर्मचारी भी नहीं हैं।”
उन्होंने माना कि यह काम आसान नहीं है, लेकिन उनका कहना था कि जिन एजेंसियों ने पहले ये परीक्षाएं कराई थीं, उन्हें नियंत्रण और संतुलन वाली व्यवस्था के तहत जवाबदेह बनाया जा सकता था।
उन्होंने कहा, “इसके अलावा, परीक्षाओं के केंद्रीकरण से सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़े वर्गों के कई छात्रों को सबसे ज्यादा नुकसान होता है, क्योंकि एनटीए ग्रामीण छात्रों की परेशानियों और उनकी कमी को दूर करने में सक्षम नहीं है।”
बोरा ने कहा कि एनटीए की व्यवस्था में सबसे बड़ी कमी यह लगती है कि लगभग सभी काम आउटसोर्स किए जाते हैं।
उन्होंने एनटीए को खत्म करने और उसकी जगह सरकारी एजेंसियों के जरिए परीक्षा कराने की एक विकेंद्रीकृत संघीय व्यवस्था लागू करने की मांग की, जो जनता के प्रति जवाबदेह और वास्तव में पारदर्शी हो।
मजूमदार ने भी कहा कि एनटीए को पूरी तरह खत्म कर देना चाहिए।
हालांकि, छात्रों और उनके माता-पिता के सवाल का अभी जवाब नहीं मिला है।
‘दिल्ली पैरेंट्स एसोसिएशन’ की अध्यक्ष अपराजिता गौतम ने कहा कि सोशल मीडिया के कारण भी छात्रों की निराशा बढ़ रही है, क्योंकि वे एक के बाद एक समस्याएं देख रहे हैं।
उन्होंने कहा, “बड़ों के लिए यह कहना आसान है कि ‘दोबारा परीक्षा दे दो’, लेकिन छात्रों पर इसका मनोवैज्ञानिक असर कहीं ज्यादा गहरा होता है।”
भाषा जोहेब संतोष
संतोष

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