बचाव के लिए एक मौका काफी नहीं, चेक बाउंस मामले में महिला को दूसरा मौका : अदालत
बचाव के लिए एक मौका काफी नहीं, चेक बाउंस मामले में महिला को दूसरा मौका : अदालत
नयी दिल्ली, 28 जुलाई (भाषा) दिल्ली की एक अदालत ने व्यवस्था दी है कि कानून के तहत ‘‘एक मौके को पर्याप्त नहीं माना जा सकता’’ और इसी आधार पर मजिस्ट्रेट के उस आदेश को रद्द कर दिया है, जिसमें चेक बाउंस के एक मामले में महिला के बचाव में सबूत पेश करने का अधिकार खत्म कर दिया गया था।
अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश शेफाली बरनाला टंडन ने यह भी कहा कि संविधान निष्पक्ष सुनवाई की गारंटी देता है, जिसमें आरोपी को अपना बचाव करने का उचित मौका मिलना भी शामिल है।
अदालत ने 22 जुलाई के अपने आदेश में कहा, ‘‘यह अच्छी तरह से स्थापित है कि निष्पक्ष सुनवाई ही न्याय का आधार है और आरोपी को अपना बचाव पेश करने का मौका दिए बिना, सुनवाई न्यायिक प्रक्रिया के बजाय महज औपचारिकता बनकर रह जाती है।’’
अदालत ने रेखांकित किया कि यह पुनरीक्षण याचिका मजिस्ट्रेट अदालत के अगस्त 2025 के उस आदेश के खिलाफ दायर की गई थी, जिसमें सुनीता देवी द्वारा ‘‘परक्राम्य लिखत’’ अधिनियम के प्रावधानों के तहत दर्ज कराई गई शिकायत में आरोपी या पुनरीक्षण याचिकाकर्ता मंजू देवी को बचाव पक्ष के सबूत पेश करने का मौका देने से इनकार कर दिया था।
पुनरीक्षण याचिकाकर्ता के मुताबिक शिकायतकर्ता के सबूत मार्च 2025 में पूरे हो गए थे और मामले को 30 जुलाई तक के लिए टाल दिया गया था, ताकि वह गवाहों की सूची और खुद से पूछताछ के लिए एक अर्जी दाखिल कर सके।
हालांकि, उस तारीख को मजिस्ट्रेट ने इस तथ्य को संज्ञान में लिया कि आरोपी की ओर से कोई कदम नहीं उठाया गया था और तुरंत ही बचाव के लिए सबूत पेश करने के उसके अधिकार को खत्म कर दिया।
आदेश को रद्द करते हुए सत्र न्यायालय ने कहा कि यह स्पष्ट है कि पुनरीक्षण याचिकाकर्ता को अपना बचाव करने के मौलिक अधिकार से वंचित किया गया था।
इसमें कहा गया, ‘‘संविधान का अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का संरक्षण) निष्पक्ष सुनवाई की गारंटी देता है, जिसमें आरोपी को अपना बचाव करने का उचित मौका मिलना शामिल है। कानून के तहत सिर्फ एक मौका मिलना ‘पर्याप्त मौका’ नहीं माना जाता है।’’
अदालत ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) की धारा 346 का भी ज़िक्र किया, जो पहले की दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 309 के बराबर है और ‘कार्यवाही को टालने या स्थगित करने की शक्ति’ से संबंधित है।
फैसले में कहा गया, ‘‘ धारा 346(2) के अनुसार, किसी पक्ष के अनुरोध पर दो से ज़्यादा बार सुनवाई स्थगित नहीं की जा सकती, सिवाय उन मामलों के जहां हालात उस पक्ष के नियंत्रण से बाहर हों। ऐसा करने से पहले दूसरे पक्ष की आपत्तियां सुनी जाएंगी और स्थगन के कारण लिखित रूप में दर्ज किए जाएंगे। इस तरह, विधायिका ने सुनवाई स्थगित करने की मंजूर संख्या को दो तक सीमित कर दिया है।’’
अदालत ने रेखांकित किया कि इस मामले में मजिस्ट्रेट ने नियमों का पालन न करने की सिर्फ एक घटना के बाद ही बचाव पक्ष को अपनी बात रखने का अधिकार खत्म कर दिया था।
अदालत ने याचिका स्वीकार करते हुए मंजू देवी को सबूत पेश करने का ‘एक आखिरी मौका’ दिया।
भाषा धीरज अविनाश
अविनाश

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