इतिहास के पन्ने हटाए नहीं जा सकते, चाहे उनका रंग कुछ भी हो : संस्कृति मंत्री शेखावत
इतिहास के पन्ने हटाए नहीं जा सकते, चाहे उनका रंग कुछ भी हो : संस्कृति मंत्री शेखावत
(तस्वीरों के साथ)
(कुणाल दत्त)
नयी दिल्ली, 28 मई (भाषा) केंद्रीय संस्कृति मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत ने भारत की सांस्कृतिक विविधता को स्वीकार करते हुए कहा कि भारतीय सभ्यता विभिन्न आस्थाओं का ‘‘समागम’’ है और इतिहास के पन्नों को हटाया नहीं जा सकता, ‘‘चाहे उनका रंग कुछ भी हो’’।
शेखावत ने बुधवार को ‘पीटीआई-वीडियो’ को दिए एक विशेष साक्षात्कार में यह टिप्पणी ऐसे समय में की है जब कई दक्षिणपंथी संगठन 12वीं शताब्दी के आसपास इस्लामी शासन शुरू होने से पहले की ‘‘हिंदू सभ्यतागत पहचान’’ पर जोर दे रहे हैं।
शेखावत ने कहा, ‘‘हमारे लिए विरासत मतलब विरासत है और वह समान रूप से मूल्यवान है।’’ उन्होंने देश में मौजूद ऐतिहासिक स्थलों का उल्लेख करते हुए कहा कि एलोरा के 8वीं शताब्दी के कैलाश मंदिर, 10वीं शताब्दी के खजुराहो मंदिरों से लेकर बाद के दौर की इस्लामी स्थापत्य कला की अद्भुत धरोहर ताजमहल तक सभी ऐतिहासिक स्थल भारत की सभ्यता के लिए समान महत्व रखते हैं।
शेखावत पर्यटन मंत्री भी हैं। उन्होंने कहा, ‘‘भारत की सभ्यता का इतिहास 10 हजार वर्षों से अधिक की निरंतरता का इतिहास है। उस इतिहास के पन्नों को, चाहे उनका रंग कुछ भी हो, हटाया नहीं जा सकता। वे हमारे इतिहास का हिस्सा हैं। वे हमारे लिए उतनी ही महत्वपूर्ण विरासत हैं जितनी वैदिक काल की धरोहर या राखीगढ़ी और सनौली जैसे प्रमुख विरासत स्थल।’’
उनकी ये टिप्पणियां ऐसे समय में आई हैं जब समाज का एक वर्ग कई विवादित ऐतिहासिक स्थलों को ‘‘पुनः प्राप्त’’ करने की मांग कर रहा है। उनका दावा है कि ये स्थल मूल रूप से हिंदू मंदिर थे, जिन्हें बाद में विभिन्न इस्लामी शासकों के शासनकाल में मस्जिदों में बदल दिया गया।
हाल का मामला मध्यप्रदेश स्थित भोजशाला मंदिर-कमाल मौला मस्जिद परिसर का है, जिसे 15 मई को मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय की इंदौर पीठ ने हिंदू स्थल घोषित किया है।
जब उनसे पूछा गया कि देश के कई हिस्सों में ऐसे स्थलों को लेकर हिंदू और मुस्लिम समुदायों के बीच विवाद देखने पर संस्कृति और पर्यटन मंत्री के तौर पर उन्हें कैसा महसूस होता है, तो शेखावत ने कहा कि इस पर टिप्पणी करना उचित नहीं होगा, क्योंकि इनमें से कई मामले अदालतों में लंबित हैं।
हालांकि उन्होंने कहा कि यदि यह साबित हो जाए कि तलवार के बल पर चीजें बदली गई थीं, तो केवल हिंदुओं ही नहीं बल्कि अन्य समुदायों से भी अपेक्षा है कि वे इतिहास को समझें और आस्था का सम्मान करते हुए निर्णय लें।
भोजशाला मामले का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) ने वैज्ञानिक अध्ययन किया। एएसआई उनके मंत्रालय के अधीन आता है।
उन्होंने कहा, ‘‘वैज्ञानिक अध्ययन में कई प्रमाण मिले कि भोजशाला पहले संस्कृत अध्ययन और शोध केंद्र था तथा वहां वाग्देवी (सरस्वती) का मंदिर भी था।’’
उन्होंने कहा कि अदालत के फैसले के बाद दोनों पक्षों को एक-दूसरे को समायोजित करते हुए आगे बढ़ने का रास्ता निकालना चाहिए।
शेखावत ने यह सुझाव भी खारिज किया कि विवादित धार्मिक स्थलों को पर्यटन स्थल बना दिया जाए ताकि समाज के हर वर्ग के लोग वहां जा सके।
उन्होंने पूछा, ‘‘क्या आप काशी विश्वनाथ मंदिर के पास मौजूद ढांचे को पर्यटन स्थल बना सकते हैं? आप और हम सभी जानते हैं कि जन्मभूमि, मथुरा मंदिर के पास किस तरह का ढांचा खड़ा है। पूरा देश जानता है कि वह क्यों बनाया गया, कब बनाया गया और किन परिस्थितियों में बनाया गया। क्या उसे पर्यटन स्थल बनाया जा सकता है?’’
इन विवादों के बावजूद उन्होंने भारत की सांस्कृतिक बहुलता को संरक्षित रखने की वकालत की।
उन्होंने कहा, ‘‘भारत की एक पहचान है। भारत की पहचान उसकी विविधता और समावेशिता है। भारत की पहचान उसकी सांस्कृतिक पहचान है। यह विभिन्न संस्कृतियों, विभिन्न आस्थाओं, विभिन्न मान्यताओं, विभिन्न सांस्कृतिक परंपराओं, प्रकृति के अलग-अलग रूपों और विविध संस्कृतियों का समागम है; तभी यह एक भारत बनता है।’’
प्राचीन काशी विश्वनाथ मंदिर वाराणसी में गंगा नदी के तट पर स्थित है। इसके पास स्थित ज्ञानवापी मंदिर का ढांचा हिंदू और मुस्लिम समुदायों के बीच विवाद का विषय रहा है।
उत्तर प्रदेश के मथुरा में कृष्ण जन्मभूमि और शाही ईदगाह मस्जिद को लेकर विवाद भी दोनों समुदायों के बीच तनाव का एक अन्य कारण है। हिंदुओं का एक वर्ग दावा करता है कि यह मुगलकालीन मस्जिद भगवान कृष्ण के जन्मस्थान पर स्थित मंदिर को तोड़कर बनाई गई थी।
भाषा गोला मनीषा
मनीषा

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